धन की देवी लक्ष्मी की सवारी उल्लू पर मंडराते संकट पर चंबल में अलर्ट

Samachar Jagat | Friday, 02 Nov 2018 02:08:25 PM
Goddess Lakshmi riding owl of wealth

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इटावा। उत्तर प्रदेश में इटावा स्थित चंबल सेंचुरी में पाए जाने वाले दुर्लभ उल्लुओं की जान पर दीपावली के करीब आते ही मुश्किले आना शुरू हो जाती है क्योकि तंत्र साधना से जुड़े लोग दीपावली पर इसकी बलि चढ़ाने की दिशा में सक्रिय हो जाते है।


इस संबंध में चंबल सेंचुरी के कर्मियों को सतर्क कर दिया गया है ताकि कोई भी शिकारी बलि चढ़ाने के लिहाज से उल्लुओं को पकड़ने मे कामयाब नहीं हो। यह विडंबना ही है कि अधिक संपन्न होने के फेर मे कुछ लोग दुर्लभ प्रजाति के संरक्षित वन्यजीव उल्लुओं की बलि चढ़ाने की तैयारी मे जुट गए हैं।

यह बलि सिर्फ दीपावली की रात को ही पूजा अर्चना के दौरान दी जाती है। इन लोगों का मानना है कि उल्लू की बलि देने वाले को बेहिसाब धन मिलता है। चंबल सेंचुरी के इटावा स्थित वनक्षेत्राधिकारी सर्वेश सिह भदौरिया ने बताया कि उनके संज्ञान मे विभागीय स्तर पर लाया है कि दीपावली पर्व के मद्देनजर चंबल इलाके से दुर्लभ प्रजाति के उल्लुओ की तस्करी की जाती है।

इसको लेकर विभागीय कर्मचारियों को सतर्क कर दिया गया है। गुप्तचरों के जरिए उन तस्करों पर निगरानी तो रखी ही जाएगी बल्कि उनको पकड़ने की भी कवायद भी तेज कर दी गई हैं। उन्होंने बताया कि चंबल सेंचुरी के कर्मियो के अलावा मुखबिरो को भी सर्तक किया गया है जिनसे निजी तौर पर संपर्क करके रखा गया है। चंबल सेंचुरी मे 17 बीट है जिनमें 32 बीट प्रभारी है सभी को सर्तक कर दिया गया।

उन्होंने बताया कि चंबल सेंचुरी मे पर्थरा गांव के पास महुआ सूडा नामक स्थान के अलावा गढायता गांव के पास चंबल नदी के किनारे देखे गये है। भदौरिया ने बताया कि उल्लू भारतीय वन्य जीव अधिनियम,1972 की अनुसूची-1 के तहत संरक्षित है, यह विलुप्त प्राय: जीवों की श्रेणी में दर्ज है।

इनके शिकार या तस्करी करने वालों को कम से कम 3 वर्ष या उससे अधिक सजा का प्रावधान है। चंबल सेंचुरी क्षेत्र में यूरेशियन आउल अथवा ग्रेट होंड आउल और ब्राउन फिश आउल का शिकार प्रतिबंधित हैं,इसके अलावा भी कुछ ऐसी प्रजातियाँ हैं जिन पर प्रतिबंध है।

सेंचुरी क्षेत्र में इनकी खासी संख्या हैं क्योंकि इस प्रजाति के उल्लू चंबल के किनारे करारों में घोंसला बनाकर रहते हैं इस प्रकार के करारों की सेचुंरी क्षेत्र में कमी नहीं है। उन्होंनेे बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चंबल के उल्लुओं की कई दुर्लभ प्रजातियों की ज़बरदस्त मांग है।

यही वजह है कि चंबल के बीहड़ी इलाकों में उल्लू तस्करों का निशाना बन रहे हैं और इन्हें तस्करी कर दिल्ली, मुंबई से लेकर जापान,अरब और यूरोपीय देशों में भेजे जाने की बाते कही जाती है। दीपावली पर्व से काफी पहले से ही तस्कर उल्लुओं की तलाश में चंबल का चक्कर लगा रहे हैं।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 635 वर्ग किलो मीटर दायरे में फैली केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी परियोजना उल्लुओं के लिए कब्रगाह साबित हुई है। भदौरिया ने बताया कि आमतौर पर आर्थिक रूप से सु­ढ़ लोग ही पूजा में उल्लुओं का प्रयोग करते हैं।

क्योंकि इस प्रजाति के उल्लू आसानी से सुलभ न होने के कारण इसकी कीमत लाखों रुपए होती है, जानकारों की मानें तो दिल्ली एवं मुंबई जैसे महानगरों में बैठे बड़े-बड़े कारोबारी इन तस्करों के जरिए संरक्षित जीव की तस्करी में जुट गए हैं इतना ही नहीं तंत्रविद्या से जुडे लोगों की माने तो इस पक्षी के जरिए तमाम बड़े-बड़े काम कराने का माद्दा तांत्रिक प्रकिया से जुड़े लोग करने में सक्षम रहें हैं।

अगर बंगाल का ही हम जिक्र करें तो वहां पर बिना उल्लू के किसी भी तंत्र क्रिया नहीं की जाती है, इसके अलावा काला जादू में भी उल्लुओं का व्यापक प्रयोग किया जाता है। वन्य जीवों के संरक्षण के लिए काम कर रही पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर के सचिव संजीव चौहान ने बताया कि चंबल घाटी से लगातार उल्लुओं की तस्करी के मामले उजागर हो रहे है, इसको लेकर सभी सतर्क हैं, वे बताते हैं कि तंत्रविद्या के अलावा इनका असल इस्तेमाल आयुर्वेदिक पद्धति में भी किया जाना बताया जाता है।

यह वाइल्ड लाइफ अधिनियम के तहत प्रतिबंधित जीव है और इसका शिकार करना अथवा पकड़ना कानूनन अपराध है। उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में उल्लू की लगभग 225 प्रजातियां हैं। हालांकि कई संस्कृतियों के लोकाचार में उल्लू को अशुभ माना जाता है, लेकिन साथ ही संपन्नता और बुद्धि का प्रतीक भी। यूनानी मान्यताओं में उल्लू का संबंध कला और कौशल की देवी एथेना से माना गया है और जापान में भी इसे देवताओं का संदेशवाहक समझा जाता है।

चौहान ने बताया कि हिदू मान्यताओं के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी उल्लू पर विराजती हैं और भारत में यही मान्यता इस पक्षी की जान की दुश्मन बन गई है। यही वजह है कि दीपावली के ठीक पहले के कुछ महीनों में उल्लू की तस्करी काफी बढ़ जाती है। हर साल भारत के विभिन्न हिस्सों में दीपावली की पूर्व संध्या पर उल्लू की बलि चढ़ाने के सैंकड़ों मामले सामने आते हैं।

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