लाल मुंह के बंदरों के आतंक से बचाएंगे काले मुंह के बंदर...जानिए पूरा मांजरा!

Samachar Jagat | Thursday, 04 Jul 2019 01:09:25 PM
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जयपुर। लाल मुंह के बंदरों के उत्पात से देश भर में आतंक का माहौल बना हुआ है। इनकी पकड़-धकड़ के लिए उच्च स्तर पर विचार- विमर्श चल रहा है। ताज्जुब की बात तो यह है कि उन बंदरों का उत्पात वीआईपी इलाकों में अधिक है। ऐसे में वहां विशेष टीम का गठन कि या गया है, जिसमें मदारियों की सेवाएं ली जा रही है। टीम के सदस्यों का मानना है कि लाल मुंह के बंदर, काले मुंह के बंदरों से डरते हैं।

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इस प्रवृति पीछे यह कारण बताया जाता है कि काले मुंह के बंदर लाल मुंह के वानरों पर खार खाते हैं। दोनों के बीच पुस्तैनी दुश्मनी है। इस पर काले मुंह के लंगूरों के दल के आते ही लाल मुंह के उत्पाती बंदर जगह छोड़ कर भाग छूटते हैं। शोध में यह भी पाया गया है कि बंदरों के बढते उत्पात को लेकर देश भर में अनेक प्रयोग किए गए हैं।

जिनके निष्कर्ष बताते हैं के लाल मुंह के बंदरों के उत्पात पर लगाम लगाने के लिए शहरी सरकार के पास जो संसाधन मौजूद है, वे असर कारक नहीं है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के चलते बंदरों को यातनाएं या इन्हें नहीं मारा जा सकता है। इसके लिए जो स्टेटजी अब तक उपयोगी साबित हुई है, उसमें काले मुंह के बंदरों को ही इस कार्य के लिए ट्रेण्ड किया जाए। 

जयपुर नगर निगम करेगा इस योजना पर विचार
नई स्कीम को लेकर जयपुर नगर निगम स्तर पर भी विचार - विमर्श चल रहा है। समस्या इस बात को लेकर है कि लाल बंदरों के खिलाफ काले बंदरों को आखिर कहां पाला जाए और उन्हें किस तरह ट्रेण्ड किया जाए। इस बारे में कोई फैसला नहीं हो सका है। बताया जाता है कि लाल बंदरों के उत्पात से केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में भय का वातावरण है।

बंदरों के ये दल दफ्तरों के कमरों और अफसरों के चैम्बर तक में घुस जाते हैं और वहां रखे रिकॉर्ड और फाइलों को या तो फाड़ देते हैं अथवा उसे लेकर भाग जाते हैं। दिल्ली की तरह जयपुर के हालात भी चिंताजनक है। इसके बाद भी शहर प्रशासन कोई निर्णय नहीं ले सका है। 

बंदर भगाने के विशेषज्ञ का कहना है कि बंदरों के ये दल आक्रामक होते हैं। सामने आने वाले सख्त पर एकाएक हमला करके उन्हें घायल कर देते हैं। केन्द्र सरकार की महत्वपूर्ण इमारतों के अलावा जयपुर शहर भर में इन वानरों का आतंक फैल चुका है। आबादी इलाकों में इनकी दादागिरी चल रही है। अस्पतालों के भवन भी इसकी चपेट में आ चुके है।

वहां उपचारित इनडोर और आउटडोर रोगियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। हालत इस कदर खराब हो गए हैं कि चिकित्सकोे की हालत बंदरों ने खराब की हुई है। उनके द्बारा भी प्रशासन के समक्ष सुरक्षा की मांग करनी पड़ी है।

प्रशासनिक सूत्र बताते हैं कि बंदरों का हुड़दंग खत्म करने के लिए उनके स्तर पर कई प्रकार के उपाय किए गए थे, मगर वे कोई कारगर साबित नहीं हो पाए हैं। अब हार कर बंदर नचाने वाले कलाकार मदारियों को बुलाया गया है और उन्हें बंदरों को पकड़ने या भगाने के लिए प्रति बंदर पर सात हजार रुपए की राशि का ठेका दिया गया है। 

लंगूरोें को दी जा रही है, बंदरों को भगाने की ट्रेनिंग
मदारियों के दलों के उस्ताद काले मुंह के प्रशिक्षित लंगूरों को बाकायदा ट्रेनिंग देते हैं। योजनाबद्ध रूप से कार्य करने के लिए बाकायदा कार्य योजना तैयार की गई है। लंगूरों को इस बात के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है कि लाल मुंह के बंदरोें को किस दिशा में भगाना है।

कालू लंगूर हाथ में डंडा लेकर बंदरों के पीछे पड़ जाता है। मदारी परिवारों का कहना है कि इस योजना से वे खुश हैं। क्यों कि अब उन्हें घूम- घूम कर बंदरों को नचाने का खेल दिखाने की आवश्यकता नहीं होती है। इस कार्य के लिए उन्हें जो राशि दी जाती है, उससे उनके परिवार का अच्छे से पालन पोषण हो जाता है। उनके जीवन स्तर में भी सुधार हो रहा है। 

जयपुर की समस्या
कहा जाता है कि छोटी कांशी जयपुर, मंदिरों की नगरी होने पर वहां बंदरों का जमघट काफी ज्यादा है। शहर के लगभग सभी क्षेत्रों में लाल मुंह के बंदर पाए जाते हैं। शहरवासियों की धार्मिक पृवर्ति होने पर वे बंदरों को गुड- चना के अलावा फल खिलाते हैं। गलता तीर्थ की पहाड़ियों में बंदरोें का मंदिर भी है, जहां लोग इनकी पूजा अर्चना के लिए जाते हैं।

यह सब धार्मिक विचारोें के तहत हो रहा है। जब भी कभी जयपुर नगर निगम का दल जब वहां पहुंचता है, स्थानीय नागरिक इन्हें पकड़ने में हिंसक तरीकों को अपनाएं जाने का विरोध करते हैं। शहर की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि बंदरोें के हमलों में घायल लोगों की संख्या में काफी इजाफा हो चुका है। बंदरोें के काटे जाने पर हाइड्रोफोबिया रोग के अलवा अन्य घातक बीमारियोें के फैलने का खतरा बना रहता है। 
 



 

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