तीन साल की मासूम बच्ची से घिनौना काम करने के बाद कर दी थी हत्या और अब...

Samachar Jagat | Friday, 14 Dec 2018 12:21:18 PM
Court convicts three year old rapist murderers to death penalty turned into age imprisonment

नई दिल्ली। जहां एक और प्रशासन और न्याय व्यवस्था मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध करने वाले आरोपियों को सख्त से सख्त सजा देने के प्रावधान ला रही है। जिससे इस तरह के अपराधों में कमी आ सके। लेकिन फिर भी इन घिनौने अपराधों में कोई कमी नहीं आ रही है। हालांकि कोर्ट इस तरह के अपराधों को अंजाम देने वाले दरिंदों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाते हुए उन्हे उम्र कैद और फासी की सजा दे रही है। लेकिन क्या इस तरह के अपराधों में किसी को मौत की सजा देना और फिर उसे उम्र कैद में बदल देने से क्या इस तरह के अपराधों में कमी आएगी, ये एक मुद्दा बना हुआ है।

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कुछ ऐसा ही मामला आया है राजधानी दिल्ली में जहां उच्चतम न्यायालय में मासूम बच्ची से दुष्कर्म के मामले में आरोपी को उम्र कैद की सजा दी है। मीडिया रिपोट्र्स से प्राप्त जानकारी के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने 2007 में तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म कर उसकी हत्या करने वाले आरोपी की मौत की सजा को बुधवार को उम्र कैद में तब्दील कर दिया। साथ ही निर्देश भी दिया कि उसे उसके सामान्य जीवन काल के दौरान जेल से रिहा नहीं किया जाएगा। न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने आरोपी राजेन्द्र प्रहलादराव वासनिक की मौत की सजा उम्र कैद में तब्दील करते हुए कहा कि बंबई उच्च न्यायालय और शीर्ष अदालत ने मौत की सजा सुनाते वक्त दोषी के सुधरने और समाज में उसके पुनर्वास की संभावनाओं पर विचार नहीं किया।

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राजेन्द्र प्रहलादराव वासनिक को दो-तीन मार्च, 2007 की रात तीन वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म और उसकी हत्या करने के जुर्म में अमरावती की अदालत ने सितंबर, 2008 में मौत की सजा सुनाई थी। बंबई उच्च न्यायालय ने मार्च 2009 में निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा था। इसके बाद मुजरिम ने शीर्ष अदालत में अपील दायर की थी। शीर्ष अदालत ने फरवरी, 2012 में उसकी अपील खारिज कर दी थी। बाद में इस फैसले पर पुनर्विचार की उसकी याचिका भी न्यायालय ने मार्च 2013 में खारिज कर दी थी। हालांकि, इसके बाद संविधान पीठ की एक व्यवस्था के बाद मार्च 2015 में उसकी पुनर्विचार याचिका बहाल की गई थी। संविधान पीठ ने अपनी व्यवस्था में कहा था कि मौत की सजा के मामलों में लंबित अपील की सुनवाई सिर्फ तीन न्यायाधीशों की पीठ ही करेगी।

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पीठ ने दोषी की मौत की सजा उम्र कैद में तब्दील करते हुए अपने फैसले में कहा कि अभियोन ने उपलब्ध डीएनए साक्ष्य पेश नहीं किया और महत्वपूर्ण सबूत पेश करने में विफलता अभियोजन के प्रति विपरीत अनुमान की ओर ले जाती है जबकि यह सजा के संदर्भ में अपीलकर्ता के पक्ष में जाता है। पीठ ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि इन्हीं वजह से उसकी राय है कि अपीलकर्ता द्वारा किए गए अपराध और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री को देखते हुए उसकी मौत की सजा कम करना, लेकिन उसे जीवन पर्यन्त तक हिरासत में ही रखने की सजा देना अधिक उपयुक्त होगा।



 

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