छोटी-सी बीड़ी में कितना है दम..?

Samachar Jagat | Wednesday, 30 Nov 2016 03:55:55 PM
छोटी-सी बीड़ी में कितना है दम..?

धूम्रपान कैसा भी हो, होता नुक्सानकारी ही है..

बीडी के धूम्रपान के प्रति आम धारणा यह ही है कि यह सिगरेट से छोटी है और सस्ती भी तो इसे पीने से हानि भी कम ही होती होगी. आईये, जान लें इस सस्ती-छोटी बीडी के बड़े भयावह राज.

समूचे विश्व में भारत विशिष्ट है बीडी के धूम्रपान के कारण- ~11 करोड़ धूम्रपायियों में बीडी पीने वालों की अधिकता के चलते- 14% व्यसक धूम्रपायी भारतीयों में से 9% बीडी पीते हैं. वर्तमान में राजस्थान में 18.8% व्यस्क धूम्रपायी हैं (31.5% व्यसक राजस्थानी पुरुष और 5.3% व्यस्क राजस्थानी महिलाएं).

तम्बाकू जनित हृदय रोग.....

इनमें मात्र बीडी के धूम्रपान करने वाले पौने छः गुना हैं याने कुल 16% व्यस्क राजस्थानी. पुरुष और महिला धूम्रपायियों में बीडी पीने वालों का प्रतिशत लगभग समान ही है (1:1.02). अतः, बढती आयु और घटते शिक्षा स्तर के साथ ग्रामीण धूम्रपायियों में से 84% से अधिक राजस्थानी बीडी ही फूंकतें हैं. विदेशों में युवाओं में इसके सुगन्धित प्रकारों का चलन वहां के जन-स्वास्थ्यकर्ताओं के लिए एक भारी चुनौती है.  

सन् 2011 में नवी मुंबई स्थित हेअलिस सेकसरिया जनस्वास्थ्य संस्थान द्वारा भारतवर्ष के अब तक के बीडी धूम्रपान पर हुए मुंबई के 87 हजार से अधिक पुरुष बीडी धूम्रपायियों के इस पाँच वर्षों से अधिक समय तक के दूरगामी अध्ययन से यह पता लगा कि इनमें, सिगरेट पीने वालों के अपेक्षा, जहाँ मुँह के केन्सर की दर 42% अधिक थी, फेंफड़े और स्वरयंत्र में यह दर क्रमशः 35% और 112% अधिक थी.

परन्तु, बीडी से मात्र कैंसर ही नहीं होते. यह ह्रदय-, रक्त वाहिनियों- व श्वसन तंत्र (सांस)- के रोगों के अलावा अन्य गैर संक्रामक रोग, टी.बी. और अधेड़ावस्था की महिलाओं में कुल्हे की हड्डी के फ्रैक्चर का भी एक प्रमुख कारक है. इस सबसे बड़े अध्ययन से, जिसने सन् 2010 में दिल्ली के पटेल वक्ष रोग संस्थान में बीडी धूम्रपयियों से प्राप्त जानकारियों को भी समर्थित किया, यह भी पता लगा कि क्योंकि सिगरेट की अपेक्षा बीडी के शीघ्रता से स्वतः बुझने की संभावना अधिक होती है, इसके पीने वालों को इसे अधिक बार और हर बार गहरा फूंकना होता है- एक औसत बीडी धूम्रपायी एक सिगरते को जहाँ 9 बार फूंकता है, बीडी को वह 28 बार फूंकता है.

तम्बाकू और स्वास्थ्यकर्ता.....    

अतः लम्बाई में छोटी, तम्बाकू की कम मात्र वाली बीडी पीने वाले, सिगरेट पीने वालों की तुलना में, तम्बाकू की हानियों से अधिक प्रभावित तो होते ही हैं, इसमें फिल्टर की अनुपस्थती और इसके आवरण की विशिष्टता (सरंध्रता/छिद्र्ता- Porosity) के चलते ये निकोटीन के अतिरिक्त तम्बाकू के जहरीले रसायनों जैसे फिनॉल, हाइड्रोजन साइनाइड, हाइड्रोकार्बंस, अमोनिया और कार्बन-मोनो-ऑक्साइड के साथ-साथ वातावरण के प्रदूषणकरी कणों को भी अधिकता से ग्रहण करते हैं. और, यह भी एक स्थापित तथ्य है कि जितनी अधिकता से इसे पिया जाता है- प्रतिदिन मात्रा- और समयावधि- के अनुसार, इससे होने वाली हानियाँ भी उतनी ही अधिक होती है.

तेंदू पत्ते में लिपटे इस तम्बाकू पदार्थ की कहानी, कर्ज के बोझ से दबे तम्बाकू की खेती करने वाले किसानों-, तेंदू पत्तों को सुबह-से-संध्या तक जंगलों में भटक एकत्रित करने वाले अनभिज्ञ आदिवासियों- और हर दिन एक तम्बाकू-दूषित वातावरण में घंटो इसे लपेटने के बावजूद ठेकेदारी प्रथा से पीड़ित महिला-बच्चों- के शोषण और बीड़ी व्यवसायियों और राजनीतज्ञों के सांठ-गाँठ की एक दु:खद गाथा है. फिर भी क्यों है इसकी लोकप्रियता? इस प्रश्न का उत्तर इसके उत्पादन और व्यवसाय को भलीभांति जानने वालों के लिए कठिन बिलकुल नहीं है.

बजट 2016 में तम्बाकू पर टैक्स-वृद्धि: क्या यह पर्याप्त है?

महिला-बच्चों के हाथों से लिपटी गई-, घरों से उत्पादित-, अत्यधिक सरकारी वित्तीय छूट प्राप्त- और लगभग कर-मुक्त अनियंत्रित व्यवसाय के फलस्वरूप बनी- बीडी का अत्यधिक सस्तापन इसे लोकप्रिय बनाये हुए है. जहाँ भारत में एक सिगरेट पीने वाला, बीडी पीने वाले की अपेक्षा, हर माह ~4 गुना अधिक पैसा खर्चता है (औसतन ~400 रु. तक जबकि एक बीडी धूम्रपायी का औसत मासिक खर्च ~94 रु. है), प्रदेश में यह अनुपात ढाई गुने से भी कम है. इसका कारण राजस्थान में बीडी पर किया गया औसत मासिक खर्च है जोकि समूचे देश में सबसे अधिक है (~148 रु. तक; राष्ट्रीय औसत का ~158%) जबकि प्रदेश में एक सिगरेट धूम्रपायी औसतन प्रति माह ~341 रु. ही खर्चता है (राष्ट्रीय औसत का ~85%).  

अतः, यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रादेशिक- और केन्द्रीय- सरकारें समूचे बीड़ी व्यवसाय को नीतिगत तरीके से और शीघ्रातिशीघ्र पूर्णतः नियंत्रित औद्योगिक व्यवसाय के रूप में स्थापित करे, इस पर दी जाने वाली आर्थिक छूट और तेंदू पत्ते के व्यवसाय को पूरी तरह से समाप्त करे, इस पर सिगरेट के समतुल्य कर लगाये और महिला, बच्चों व आदिवासियों को इस व्यवसाय से हो रहे शोषण से सम्पूर्ण व प्रभावी मुक्ति दिलाये. साथ ही, इसे बजाये तेंदू पत्ते में लपेटे जाने के, इसे सिगरेट बनाने में प्रयुक्त कागज में लपेट फिल्टर के सहित बनाने और, बजाये बंडल के, एक 85% सचित्र चेतावनी वाली प्लेन पैकेजिंग में ही बेचने की बाध्यता निर्धारित की जाये. तब ही हम बचा सकेंगे अपने कम-शिक्षित ग्रामीण भारतीयों और राजस्थानियों को बीडी की हानियों से.                      
 

लेखन-

डॉ. राकेश गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान कैंसर फाउंडेशन और वैश्विक परामर्शदाता, गैर-संक्रामक रोग नियंत्रण (कैंसर और तम्बाकू).

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