बेसहारा मानसिक रोगियों की दशा में सुधार लाने के लिए एक जन आंदोलन की जरूरत: वटवानी

Samachar Jagat | Monday, 30 Jul 2018 02:28:13 PM
Need a mass movement to improve the condition of destitute mental patients Vatwani

मुंबई। रेमन मैग्सायसाय पुरस्कार विजेता डॉ भरत वटवानी ने कहा कि सड़कों पर भटकने वाले बेसहारा मानसिक रोगियों की दशा में सुधार लाने के लिए एक जन आंदोलन की जरूरत है। वटवानी ने कहा, ''वह आशा करते हैं कि यह पुरस्कार हमारी सड़कों पर भटकने वाले मानसिक रोगियों की ओर ध्यान आकृष्ट करने में मदद करेगा।" इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुने जाने पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए मुंबई निवासी मनोचिकित्सक ने कहा कि उनके कार्य के लिए यह एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय मान्यता है। इस साल के रेमन मैग्सायसाय पुरस्कार के लिए भारत से चुने गए दो लोगों में वटवानी भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि असहाय मानसिक रोगियों की मदद के लिए एक आंदोलन की जरूरत है। उन्होंने बताया कि एक बार जब वह अपनी मनोचिकित्सक पत्नी स्मिता के साथ एक रेस्तरां में बैठे हुए थे , तभी एक घटना को देखने के बाद उनका यह सफर शुरू हुआ। उन्होंने बताया, ''हमने एक व्यक्ति को देखा, जिसके व्यवहार और तौर तरीके ने हमारे मन में कोई संदेह नहीं छोड़ा कि वह ' स्किट्सफ्रीनीआ' (मानसिक रोग) से ग्रसित है। उसने सड़क से एक खाली नारियल उठाया और पीने के लिए उसमें भर कर नाली से कुछ पानी निकाला।"

वे दोनों लोग उसके पास गए और उससे पूछा कि क्या वह उनके साथ जाएगा, ताकि वे उसकी मदद कर सकें। उस व्यक्ति ने ऐसा किया और कुछ महीनों बाद उसे आंध्रप्रदेश में रहने वाले उसके परिवार से मिला दिया गया। यह पता चला कि वह विज्ञान में स्नातक था और उसने पैथोलॉजी का पाठ्यक्रम पूरा किया था। उत्तर मुंबई उपनगर बोरीवली के रहने वाले वटवानी (60) ने अपने श्रद्धा पुनर्वास फाउंडेशन का 1991 में पंजीकरण कराया था।

वर्ष 2007 में उन्होंने मुंबई के एक अस्पताल में काम करने वाली अपनी पत्नी के साथ रायगढ़ जिले से लगे करजाट में श्रद्धा पुनर्वास गृह खोला। वटवानी ने कहा, '' मैं बहुत खुशी महसूस कर रहा हूं कि मेरे काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। मैं आशा करता हूं कि एशिया का नोबेल कहा जाने वाला यह पुरस्कार बेसहारा मानसिक रोगियों की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट करेगा ताकि ' स्किट्सफ्रीनीआ के रोगियों के इलाज में मदद मिल सके।"

उन्होंने बताया कि एक समय में उनके करजाट स्थित आश्रय गृह में इलाज के लिए इस रोग से ग्रसित 120 लोग थे। उन्होंने कहा कि यदि एक स्किट्सफ्रेनिक रोगी का उपयुक्त इलाज किया जाता है तो उसे ठीक होने में दो महीने का वक्त लगता है। हमने पिछले तीन दशक में अब तक इस तरह के करीब 7,000 रोगियों को उनके परिवार से मिलाया है।

वटवानी ने बताया, '' इस साल हमने अपने फाउंडेशन के जरिए ऐसे 485 लोगों को इलाज के बाद उनके परिवार से मिलाया है।" सामाजिक कार्यकर्ता बाबा आम्टे के प्रशंसक वटवानी ने कहा कि सरकार और समाज को इस रोग के इलाज के लिए एकजुट होकर काम करने की जरूरत है। वक्त की दरकार है कि शुरूआती स्तर में ही इस रोग का पता लगाया जाए। गौरतलब है कि कोलकाता में जन्में वटवानी पांच साल की उम्र में मुंबई आए थे। उन्होंने सरकारी जेजे हास्पिटल से एमबीबीएस और केईएम अस्पताल से एमडी का पाठ्यक्रम किया था। वटवानी दंपती की एक जैविक संतान ( बेटी) है। उन्होंने दो लड़कों और एक लड़की को गोद भी लिया है।- एजेंसी

 



 

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