तम्बाकू पदार्थों पर सचित्र चेतावनियाँ

Samachar Jagat | Monday, 28 Nov 2016 01:06:58 PM
तम्बाकू पदार्थों पर सचित्र चेतावनियाँ

जीताएँ गरीबों, अनपढ़ों और ग्रामीणों को बजाए तम्बाकू उध्योग और राजनीति के संपर्क क्षेत्र में एक सजीव चित्र की प्रस्तुती को एक हज़ार शब्द कहने के समान माना जाता है- लगभग एक-सा सन्देश जाता है हर किसी को बिना कुछ कहे. यही सोच आधार बनी सन् 2003 में हुए एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते (फ्रेमवर्क कन्वेंशन फॉर टोबेको कण्ट्रोल- ऍफ़.सी.टी.सी.) के अनुच्छेद चार और ग्यारह की. इनके अंतर्गत सदस्य राष्ट्रों से प्रत्येक व्यक्ति को तम्बाकू उपभोग और इसके धुएँ की हानियों और इन्हें व्यसनी व घातक सूचित करने के लिए सभी तम्बाकू पदार्थों की पैकेजिंग पर सचित्र चेतावनियों को लागू करने हेतु निर्देशित किया गया ताकि जनमानस को कम खर्च में सचेत किया जा सके.   

तम्बाकू और स्वास्थ्यकर्ता.....

कैसे सचित्र चेतावनियों स्वास्थ्य के खतरों को सूचित करते हुए तम्बाकू उपभोगियों को भावनात्मक तरीके से प्रोत्साहित कर इसके उपभोग में एक प्रभावी कमी ला सके? इस हेतु निर्धारित हुआ कि ये चेतावनियाँ रंगीन और बढ़ी हों, स्पष्ट होने के साथ एक सार्थक सन्देश दें- चक्रियता के साथ. इन्हें तम्बाकू पदार्थों की पैकेजिंग के आगे-पीछे (या सभी सतहों पर) प्रमुखता से इस तरह प्रिंट किया जाये कि ये स्पष्टता से दिखें और पैकेजिंग खोलने से ये नष्ट या अस्पष्ट न हों.  

हमारे देश के कानून- सिगरेट और तम्बाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 ने इन सभी मापदंडों को स्वीकारते हुए नियम 7 के अंतर्गत सभी रिटेल तम्बाकू पदार्थों पर इन्हें लागू करने का निर्देश दिया. तम्बाकू इंडस्ट्री के केन्द्रीय सरकार पर परोक्ष-अपरोक्ष दबिश और जनहित याचिकाओं पर लम्बी क़ानूनी लड़ाईयों के चलते सभी रिटेल तम्बाकू पदार्थों पर चित्रित चेतावनियाँ सन् 2008 से तीन चक्रों में आ तो सकी, परन्तु इनकी अस्पष्टतायें, तम्बाकू-विक्रेताओं का इन्हें गैर-क़ानूनी रूप से छुपाना और कमजोर सरकारी प्रवर्तन इन्हें नितान्त अप्रभावी कर रही है.

आज देश फिर उसी मोड़ पर खड़ा है- अक्टूबर 2014 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री द्वारा चेतावनियों के चौथे राउंड में तम्बाकू पदार्थों की आगे-पीछे की सतहों के 85% भाग पर इन्हें लाने के लंबित निर्णय के अंतर्गत (60% चित्र और 25% सन्देश हेतु).
इसका कारण केन्द्रीय सरकार की सबोर्डिनेट लेजिस्लेटिव कमेटी की अनुशंसा तम्बाकू नियंत्रण की भावना से सर्वथा विपरीत जनहित-विरोधी और तम्बाकू इंडस्ट्री को लाभान्वित करने वाली अनुशंसा- इसके अनुसार चेतावनियों का 50% से अधिक आकार तम्बाकू उध्योग को निरुत्साहित करेगा और इनकी कालाबाजारी को बढावा देगा.

अपनी बात को बल देने के लिए कमेटी ने कुतर्क दिया कि तम्बाकू और कैंसर में कोई सम्बन्ध नहीं है जबकि सन् 2004 में ही राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री प्रोजेक्ट यह स्थापित कर चुका है कि भारतवर्ष में पुरुषों के ~50% और महिलाओं के ~17% कैंसर तम्बाकू-जनित हैं. इस ने इस तथ्य को भी अनदेखा कर दिया कि देश प्रतिदिन ~3,300 तम्बाकूजनित मृत्युओं का भार झेल रहा है- 35% व्यस्क और 15% युवा भारतीय उपभोगियों का; और, 50% तम्बाकू उपभोगियों की मृत्यु कम आयु में तम्बाकू-जनित रोगों से ही होती है, जीवन के 8-10 वर्ष लीलने के साथ.

अब 1 अप्रैल 2016 की उत्सुकता से प्रतीक्षा है. इस आशा के साथ कि स्वास्थ्य मंत्रालय, केन्द्रीय सरकार की इस तम्बाकू-उध्योग-पक्षपाती सबोर्डिनेट लेजिस्लेटिव कमेटी की अनुशंसा दरकिनार करते हुए, व्यापक जनहित में अपने पूर्वनिर्धारित निर्णय पर स्थिर रहेगी- गरीबों, अनपढ़ों और ग्रामीणों के हित में. निश्चित ही ऐसा हो पाये- राजस्थान के सांसदो और विधायकों सहित, ये हम सभी का दायित्व भी है और एक चुनौती भी कि जनमानस और जनस्वास्थ्य जीते ना कि तम्बाकू उध्योग..!!
साथ ही अगर ऐसा नहीं होता है तो भारत ना केवल अपने छोटे-छोटे पडोसी राष्ट्रों- नेपाल (90%), थाईलैंड (85%), पाकिस्तान (85%), श्रीलंका (80%), म्यांमार (75%), इत्यादि,  से भी पिछड़ा माना जायेगा, वैश्विक जनस्वास्थ्य- और तम्बाकू नियंत्रण- के क्षेत्रों में अपनी नेतृत्व वाली भूमिका भी खो देगा.  

तम्बाकू और होंठ-मुंह-गले के कैंसर      

लेखन-

डॉ. राकेश गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान कैंसर फाउंडेशन और वैश्विक परामर्शदाता, गैर-संक्रामक रोग नियंत्रण (कैंसर और तम्बाकू).      

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