आइए, बचाएं युवाओं को, घातक तम्बाकू से..

Samachar Jagat | Thursday, 01 Dec 2016 05:07:20 PM
आइए, बचाएं युवाओं को, घातक तम्बाकू से..

सन् 2009 में भारत में हुए वैश्विक युवा तम्बाकू सर्वेक्षण से कुछ तथ्यों का पहली बार पता लगा. यह तो पिछले प्रकाशन में बताया था कि इनमें ~14% तम्बाकू खाने-पीने वाले हैं- ~19% लड़के और ~8% लडकियाँ; और इनमें गैर-धूम्रपायी तम्बाकू (अधिकांशतः चबाने वाली तम्बाकू) का उपभोग सिगरेट के धूम्रपान से अधिक है. साथ ही यह भी कि जहाँ हर वर्ष पूरे भारत में 20 लाख से अधिक बच्चे तम्बाकू उपभोगी हो जाते हैं, .

क्यों बढ़ रही यह समस्या तो एक सबसे प्रमुख कारण जान पड़ता है, तम्बाकू पदार्थों की आसान व सर्वत्र उपलब्धता और इनकी अत्यंत कम खुदरा दरें..!! जो तम्बाकू कुछ वर्षों पहले मात्र पान की दुकानों पर ही मिलता था और जहाँ यदि गलती से कोई बच्चा चला जाता था तो वहां खड़े खरीददार ही नहीं दुकान-मालिक भी उसे भगा देता था, पिछले दशक में यह गली-मोहल्लों की थड़ीयों-किरणा दुकानों पर भी बिकने लगा है. कीमत देखो तो इतनी कम कि कोई गाँव या झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाला गरीब बच्चा भी अपने जेब-खर्च या छोटा-मोटा घंटे-दो घंटे का काम कर इन्हें खरीद सकता है.

बजट 2016 में तम्बाकू पर टैक्स-वृद्धि: क्या यह पर्याप्त है?

अतः यह आवश्यक है कि: (1) हर तम्बाकू विक्रेता लाइसेंसधारी हो जैसाकि पंजाब में लागू किया गया है; (2) हाल ही में जारी स्वास्थ्य मंत्रालय की तम्बाकू टैक्स रिपोर्ट में इन्हें कई आवश्यक खाद्य पदार्थों से भी सस्ता बताया है. अतः (2अ) बीड़ी और चबाने वाली तम्बाकू पर टैक्स हर वर्ष उतने औसत में ही बढ़े जितना कि सिगरेटों पर बढ़ता है; इसे यदि मूल्य-सूचकांक वृद्धि से जोड़ दिया जाये तो तम्बाकू उध्योग के दबाव में साल-दर-साल की गयी असामान वार्षिक विषमता से भी बचा जा सकता है; (2ब) इन्हें वर्तमान में मिल रही कर-रियायत को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए और इनके उत्पादकों द्वारा हो रही हो कर-चोरी को पूरी तरह से रोका जाना चाहिए; उनके द्वारा इन सुझाये गए प्रावधानों के उल्लंघन पर प्रभावी दण्डों के प्रावधानों के सहित; साथ ही, (2स) इनकी पैकेजिंग कागजों के बजाये कम-से-कम 50 रुपयों वाले टिन के बड़े डब्बों में ही बेचा जाये ताकि इनको गरीब ग्रामीण और बच्चे तो बिल्कुल ना खरीद सके.

एक और समस्या है बच्चों के तम्बाकू पदार्थों के लुभावने विज्ञापनों से प्रभावित होने की. यह तो अच्छा है कि कोटपा के नियम 5 के अंतर्गत इनका सीधा विज्ञापन रुक गया है. परन्तु, बच्चे जब इन्हें आते-जाते तम्बाकू के (पान)विक्रेताओं के यहाँ देखते हैं या इनके पानमसाले वाले छद्म रुप से पत्रिकाओं, अख़बारों और टेलीविज़न में विज्ञापित देखते हैं तो ये उनके अपरिपक्व मानसपटल पर इन्हें कभी तो, प्रयोगात्मक स्तर पर ही सही, काम मंर लेने की इच्छा जगा देते हैं. बस, यह ही तम्बाकू कंपनियां चाहती है.

बजट 2016 में तम्बाकू पर टैक्स-वृद्धि: क्या यह पर्याप्त है?

इसके लिए आवश्यक है कि: (क) जहाँ तम्बाकू पदार्थ बिकतें हैं उन स्थान को बच्चों की दृष्टि से दूर रखा जाये; इस हेतु ही कोटपा नियम 6 (अ और ब) बनाये गए हैं; आवश्यकता है तो इनके प्रभावी प्रवर्तन की; साथ ही, (ख) अपरोक्ष या छद्म विज्ञापनों पर भी प्रभावी रोक लगे; सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा, महज व्यावसायिक कारणों से स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों की अनदेखी किया जाना युवा पीढ़ी के हानिकारक हो रहा है.

चलते-चलते यह अत्यंत अवश्य है कि तम्बाकू उध्योग की युवाओं से मेलजोल बढाने के सभी प्रयासों पर पूरी तरह रोक लगे, उनके शिक्षण परिसरों में मुफ्त तम्बाकू पदार्थों बाँट से लगा उनके द्वारा सांस्कृतिक अथवा खेलकूद के कार्यक्रमों को प्रायोजित करने के साथ उनके द्वारा काम में ली जाने वाली शिक्षण सामग्रियों को अपने विज्ञापनों के साथ रियायती दामों में बेच कर.        
इन उपायों से ही साकार होगा हमारी युवा पीढ़ी को तम्बाकू-मुक्त रखने का लक्ष्य.              
 

लेखन-

डॉ. राकेश गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान कैंसर फाउंडेशन और वैश्विक परामर्शदाता, गैर-संक्रामक रोग नियंत्रण (कैंसर और तम्बाकू).

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