तम्बाकू का नशा..छूट सकता है...

Samachar Jagat | Saturday, 26 Nov 2016 01:43:09 PM
तम्बाकू का नशा..छूट सकता है...

परन्तु, समाज और स्वास्थ्य तंत्र को बदलना होगा..!! हर तम्बाकू खाने-पीने वाला जनता है इस नशे से मुक्ति आसान नहीं. कई असफल इसे बारम्बार छोड़ने के प्रयासों से इतना निराश हो जाते हैं कि वे मान बैठते हैं कि इस जीवन में तो इससे से मुक्ति असंभव है. नशामुक्ति विशेषज्ञ यह मानते हैं कि तम्बाकू का नशा, अन्य नशीले पदार्थों से, जैसे हेरोइन, कोकेन, इत्यादि, से जल्दी होता है और कठिनता से छूटता है. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है हमारे देश-प्रदेश में तम्बाकू को सफलता से छोड़ पाने की दर जो कि व्यस्क जनसँख्या के आधार पर ~2% मात्र है. सफलता का इतनी कम दर 60% से अधिक ऊँची व्यसनशीलता भी है.

तम्बाकू और स्वास्थ्यकर्ता.....

अधिकतर तम्बाकू उपभोगी इस भ्रान्ति के साथ जीते हैं कि इसे एक मजबूत इच्छाशक्ति से छोड़ा जा सकता है और मैं जब भी चाहूँगा ऐसा कर पाऊँगा. और, कई सामाजिक संस्थान जो कि नशामुक्ति हेतु प्रयासरत हैं, वे इस धारणा को और मजबूती देते हैं कि हमने कईओं (सौ से हजारों तक) को शपथ दिला इसे छुड़ा दिया. जबकि सच यह है कि राजस्थान में सभी तम्बाकू उपभोगियों की तुलना में, वर्तमान धूम्रपायियों में यह मात्र ~11% और चबाने वाली तम्बाकू उपभोगियों में यह मात्र ~8% है, जब कि विश्व में जहाँ तम्बाकू-मुक्ति की विधा विकसित है वहाँ धूम्रपान छोड़ पाने की दर 30%- 50% तक है, याने 3 से पाँच गुना अधिक.

आइये जाने, तम्बाकू सफलता से छोड़ पाने की ऊँची दरों को प्राप्त कर पाने के कारक कौन से हैं:

(अ)    सबसे महत्वपूर्ण तम्बाकू उपभोगियों का यह जानना कि (1) जहाँ तम्बाकू निरंतर खाते-पीते रहना इसकी हानियों में वृद्धि करता है, इसे शीघ्रातिशीघ्र छोड़ना और तत्पश्चात छोड़े रहना इससे हुए लाभों को इतना बड़ा देता है कि ~15 वर्षों बाद उस तम्बाकू उपभोगी के जीवन के खतरे एक गैर-तम्बाकू उपभोगी के समान हो जाते हैं, यदि उसमें पहले से ही कोई तम्बाकूजनित रोग पनपा ना हो; (2) तम्बाकू किसी भी आयु में छोड़ें, ऐसा करना लाभकारी ही होता है; (3) विशिष्टता से दिया गया परामर्श-दवाओं का मिलाजुला उपचार ही इस हेतु उपयोगी होता, मात्र इच्छाशक्ति नहीं.

(आ)    चिकित्सकीय तंत्र और समाज द्वारा तम्बाकू उपभोग को एक रोग और तम्बाकू उपभोगी को एक रोगी के रूप में जानना और मानना. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तम्बाकू उपभोग और निकोटीन व्यसन रोगों की तरह वर्गीकृत वर्गीकृत किये हुए हैं.

(इ)    चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों में इसे छुड़ा पाने हेतु शिक्षा अथवा प्रशिक्षण और निरंतरता से उनकी इस पारंगतता और सफलता का पारदर्शिता; और उनके द्वारा उपचारित तम्बाकू-उपभोगी रोगियों का पुनः परिक्षण/फ़ोन से साक्षात्कार द्वारा मूल्यांकन;

(ई)    अस्पतालों/स्वास्थ्य केन्द्रों पर इसे छोड़ने हेतु तम्बाकू उपभोगियों को सततता से इस हेतु प्रेरित और उपचारित किया जाना, उनके परिसरों में प्रवेश के साथ से जब तक वे जिस अन्य रोग को ले उपस्थित हुए हैं उसके उपचार तक. कई बार तो रोग तम्बाकूजनित ही होता है. ऐसे में यदि रोग के कारण को ही नहीं उपचारित किया जाये तो क्या रोगी ठीक हो सकेगा? उसका वर्तमान का रोग अस्थाई रूप से ठीक हो भी जाये, जैसा कि कई बार टी.बी., हार्ट-अटैक, लकवे, अस्थमा, इत्यादि के रोगीयों में देखने मिलते है. परन्तु ऐसे रोगी पुनः उसी रोग या उसकी बड़ी हुई अवस्था के साथ अथवा किसी अन्य तम्बाकूजनित रोग, केन्सर, इत्यादि, के साथ अस्पताल में रिपोर्ट करते हैं.

तम्बाकू और होंठ-मुंह-गले के कैंसर

(उ)    सरकार/ स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इस हेतु उपचार पर आये खर्च की पूरी-पूरी अदायगी चाहे उसे बाह्य- अथवा अंतर- रोगी की तरह परामर्श और दवाओं के मिलेजुले तरीके से उपचारित किया जाये.

अतः प्रदेश में भी तम्बाकू उपचार की सफलता की दर बढ़ायी जा सकती है यदि: (1) इस सामाजिक धारणा को स्थापित किया जा सके कि तम्बाकू को खाना-पीना एक रोग है; (2) जनसाधारण को व्यापकता से इससे उपचारित हो लाभान्वित हो पाने की विशिष्ट और सम्पूर्ण जानकारी आसानी से मिल पाए- सरकारी आई.ई.सी. के साथ-साथ प्रादेशिक और स्थानीय मीडिया का भरपूर उपयोग हो; (3) प्रत्येक नशामुक्ति केंद्र और मानसिक रोग विभागोंके अलावा हर सरकारी/प्राइवेट स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्साकर्मी इसके उपभोगीयों को विशिष्टता से प्रत्ये क उपस्थिति पर उपचारित कर पायें; और, (4) रोगियों को इस पर किये खर्चे की पूरी अदायगी उसके द्वारा ली गयी बीमा सुरक्षा योजना द्वारा हो अथवा गरीबी सीमा से निचे रोगियों को पूरा उपचार नि:शुल्क मिल पाये.
(क्रमश:..दूसरा भाग रविवार 29 मई को)

लेखन-

डॉ. राकेश गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान कैंसर फाउंडेशन और वैश्विक परामर्शदाता, गैर-संक्रामक रोग नियंत्रण (कैंसर और तम्बाकू).    

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