तम्बाकू और गरीबी..

Samachar Jagat | Tuesday, 22 Nov 2016 02:37:44 PM
तम्बाकू और गरीबी..

एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें यह प्रयास कर रही हैं कि जनमानस गरीबी से राहत पा सके और दूसरी ओर तम्बाकू उध्योग को बढावा देने के साथ इस तथ्य की भी अनदेखी कर रही हैं कि गरीबों के इतने बड़े भाग- लगभग डेढ़ करोड़ परिवार देश में मात्र तम्बाकू उपभोग के कारण गरीबी रेखा के नीचे हैं. प्रदेश में देश की पाँच प्रतिशत जनसँख्या के साथ यह अनुमानित किया जा सकता है कि लगभग साढ़े सात लाख परिवार तम्बाकू उपभोग के कारण गरीबी रेखा की नीचे हैं.

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यह तथ्य सर्वप्रथम मिला सन् 2011 में भारतवर्ष में हुए एक अध्ययन से जिसमें यह जानने का प्रयास किया गया कि तम्बाकू उपभोग और उससे हुए रोगों के प्रबंध पर हुए खर्चे का गरीबी से क्या सम्बन्ध है. इसे ज्ञात करने के लिए परिवार में हुए मासिक खपत के खर्चों में से तम्बाकू उपभोग और उससे हुए रोगों के प्रबंध पर हुए खर्चे को घटाया गया. गरीबी को आंकने हेतु सन् 2004 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मापदण्ड को काम में लिया गया. परिणामों से जानकारी मिली कि देश के ग्रामीण इलाकों के लगभग 118 लाख परिवार और शहरों में लगभग 23 लाख परिवार तम्बाकू पर हुए परोक्ष रूप से खर्च के कारण गरीब हैं. इसमें यदि उनके द्वारा रोगों पर किये खर्च को भी जोड़ दें तो गाँवों के लगभग 7 लाख- और शहरों के लगभग ढाई लाख- अतिरिक्त परिवार तम्बाकू उपभोग से गरीब हो जाते हैं.

इस अध्ययन के पहले हुए एक और अध्ययन और स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सन् 2010 में जारी रिपोर्ट को खंगालें तो यह भी पता लगता है कि तम्बाकू का उपभोग भी अधिकतम गरीब, पिछड़े, ग्रामीणों और अनपढ़ों द्वारा हो होता है. अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि तम्बाकू और गरीबी का सम्बन्ध सीधा-सीधा है. इसकी पुन: पुष्टि पिछले वर्ष जारी इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के अध्ययन से भी की गयी जिसने यह बताया कि भारत में राज्यों के स्तर पर भी आर्थिक-सामाजिक विषमता का जुड़ाव तम्बाकू उपभोग से है. राज्यों की उन्नत होती आर्थिक स्थिति के साथ उनमें तम्बाकू उपभोग भी कम होता देखा गया है.     

तो, प्रश्न यह उठता है कि गरीब और कम पढ़े-लिखे सामाजिक वर्ग तम्बाकू अधिक क्यों खाते-पीते हैं? सन् 2003 में तब तक के हुए सबसे वृहद् अध्ययन से, जिसमें अधिक तम्बाकू उपभोग की संभावनाओं का आकलन किया गया, यह पता लगा कि परिवार में शिक्षा का स्तर उसके आर्थिक स्तर से कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक है. ऐसा इसलिए माना गया क्योंकि गरीब और अनपढ़ तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों अपेक्षाकृत अनजान होते हैं. जिस वातावरण में वे पल-रह होते हैं वहाँ की परिस्थितियाँ उन्हें तम्बाकू के उपभोग के प्रारंभ की ओर छोटी आयु से आकर्षित करती रहती हैं. साथ ही, इस वर्ग में अधिकांशतः व्याप्त एक निराशाजनक भाग्यवादी- और किसी भी खतरे के प्रति लापरवाही- वाला रवैया भी इन्हें तम्बाकू उपभोग की ओर ढकेलता है.

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निम्न सरकारी उपाय कारगर हो सकते हैं:

  1. यह नितान्त आवश्यक है कि निचले आर्थिक-सामाजिक वर्ग के अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखों को निरन्तरता से तम्बाकू के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने के प्रावधान स्थापित हों. एक तरीका इसका स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग के अधिनस्त राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम का सूचना, शिक्षा और प्रचार (आई.ई.सी.) का बजट प्राथमिकता से इस अभियान पर ही केन्द्रित हो.
  2. साथ ही मात्र स्कूलों में ही नहीं, सभी शिक्षा-प्रशिक्षण केन्द्रों और चिकित्सा इकाइयों को तम्बाकू-मुक्त शीघ्रातिशीघ्र किन्तु नीतिगत तरीके से किया जाये, विशेषकर ग्रामीण- और झुग्गी-झोंपड़ी- इलाकों में चल रहे सरकारी प्रतिष्ठानों में ताकि उनमें शिक्षारत विद्यार्थी अपने घरों तक तम्बाकू-मुक्त जीवन के लाभ परिवारजनों तक पंहुचा उन्हें लाभान्वित कर पायें.
  3. तम्बाकू नियंत्रण कानून (कोटपा) के प्रावधानों का प्रवर्तन सततता और मजबूती से हो, विशेषकर इसके नियम 6 के भाग (अ) और (ब) की पालना जो कि अवयस्कों को तम्बाकू पदार्थों के विक्रय पर रोक और शिक्षण संस्थानों के 100 गज की परिधि में इनकी बिक्री ना होने से सम्बंधित हैं.
  4. प्रादेशिक सरकार को चाहिए कि तम्बाकू पदार्थों का विक्रय सर्वत्र होने से रोके- थडियों-ठेलों, किराण दूकानों, इत्यादि पर तो मजबूती से पूरी रोक लगे. इस हेतु शराब की दूकानों के समान तम्बाकू पदार्थों का विक्रय लाइसेंसधारीयों द्वारा कराये जाने हेतु नीति ही नहीं बने उसकी पालना भी हो.
  5. सभी खुदरा तम्बाकू पदार्थों पर अन्तराष्ट्रीय मानकों के समान टैक्स लगाना सबसे कारगर विकल्प है- जितने महंगे होते तम्बाकू पदार्थ, उतनी ही दूर होगी, गरीब-अनपढ़ उससे पहुँच! सरकारी वित-विभाग भयमुक्त हो टैक्स वृद्धि करें, मात्र सिगरेट पर ही नहीं, अपितु बीड़ी और चबाने वाली तम्बाकू पर भी- सिगरेट के सामान. यह विश्वसनीयता से कहा जा सकता है कि राज्य को राजस्व-हानि तो आने वाले कई दशकों तक भी नहीं होगी.

सरकार चाहे तो क्या नहीं कर सकती है. तम्बाकू उध्योग के हित की बात त्याग देने में ही भलाई है, उसकी भी और गरीबों की भी.      

लेखन-

डॉ. राकेश गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान केन्सर फाउंडेशन और वैश्विक परामर्शदाता, गैर-संक्रामक रोग नियंत्रण (केन्सर और तम्बाकू).

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