कर्म-फल अकाट्य है : मुनिश्री

Samachar Jagat | Tuesday, 13 Mar 2018 09:10:17 AM
Action is unrealistic: Munishri

मदनगंज-किशनगढ़। मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि जो धर्म चेतना में विद्यमान होता है वह आत्मा में लगे कर्म को नष्ट करके आत्मा को परमात्मा बना देता है। जो धर्म आत्मा से किया जाता है वह आत्मा को प्रतिष्ठा दिलाता है और जो धर्म सिर्फ तन, वचन व मन से किया जाता है वह सिर्फ तन, मन, वचन को ही प्रतिष्ठा दिलाता है। संसार में दूसरे को सुख देना स्वयं को सुरक्षित रखने का उपाय नहीं बल्कि कर्म बंध का कारण है। संसार में प्रत्येक प्राणी को अपने किए ही फल प्राप्त करता है।

 मुनिश्री ने उक्त विचार सोमवार को महाअतिशयकारी ज्ञानोदय तीर्थ क्षेत्र नारेली में धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि धर्म करने से सुख और पाप करने से दुख ही मिलता है। अहिंसा ही परम धर्म है। हिंसा करना, निरीह पशुओं को सताना कभी भी धर्म नहीं हो सकता। दिगम्बर संतों की चरण रज ही सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। जहांं पर आकर प्राणियों के समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे। संत-साधु के दर्शन पुण्य से होते हैं और पुण्यार्जन के लिए होते हैं। इनकी संगति में आकर संसार में भटके प्राणी कुमार्गों से हटकर सन्मार्ग को प्राप्त कर लेता है। छोटे-छोटे संकल्प एक दिन बहुत बड़ा रूप धारण कर लेते हैं। गुरु की छत्र छाया में रहकर संकल्प के बीज मिष्ठ फल युक्त महान वृक्ष का रूप धारण कर लेते हैं।

 वह संसार में सबसे बड़ा पुण्यात्मा है, जिसके सिर पर गुरु का मंगलकारी बरदहस्त होता है जो गुरु के चरणों में सर्वस्व समर्पण कर देता है वह तीनों लोकों के प्राणियों के द्वारा सम्माननीय व पूज्यनीय होता है। प्रचार-प्रसार संयोजक विनीत कुमार जैन ने बताया मंगलवार प्रात: 8:15 बजे मुनि सुव्रतनाथ भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा होगी। इसके बाद 9:30 बजे मुनिश्री के प्रवचन, 10:30 बजे मुनिश्री की आहारचर्या, 12 बजे सामायिक व सायं 5:30 बजे महाआरती एवं जिज्ञासा समाधान का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।



 

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