श्रावक करे दान, योगी धरे ध्यान : विश्रांत सागर जी

Samachar Jagat | Friday, 10 Aug 2018 11:41:12 AM
Disciples do charity, Yogi meditation: Vishant Sagar ji

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सीकर। मुनिश्री विश्रांत सागर जी महाराज ने कहा कि योगी की शोभा ध्यान से होती है। साधु ध्यान नहीं करता है तो योगी कहलाने का पात्र नहीं है। योगी का मतलब ध्यान में लीन रहना, संयम की शोभा तप से है। मुनिश्री ने उक्त विचार गुरुवार को दंग की नसियां में धर्मसभा में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि श्रावक की शोभा दान से है, अगर कोई राजा असत्य वचन बोलता है तो वह राज गद्दी बैठने का अधिकारी नहीं है। जीवन में वचन का बहुत बड़ा महत्व है। एक वचन के कारण ही राम को वनवास, भरत को राज तिलक हुआ था। वर्तमान समय के बारे में बताते हुए कहा कि पिता दशरथ, पुत्र राम,पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण, भक्त हनुमान,मित्र सुदामा की तरह होना चाहिए। जिससे देश का कल्याण हो सके।

आज देश में मंथरा और नारद जैसे लोग होने के कारण हर घर में रामायण महाभारत होती है, अगर देश में से स्त्रियों में मंथरा और पुरुषों में नारद, जयचन्द जैसे लोग समाप्त हो जाए तो आज भी देश सोने की चिडिय़ा हो जाएगा। मुनिश्री ने कहा कि चातुर्मास करना तभी सार्थक है जब मनुष्य में मानवता आ जाए।

 उद्देश्य यह होना चाहिए कि पेट न भरे पर भूख जरुर मिट जाए। इसी प्रकार गीता भागवत रामायण जिनवाणी सुनने का उद्देश्य यही होना चाहिए कि हमारे परिणाम निर्मल, जीवन में सकारात्मकता,विचारों में परिवर्तन आये। गीता, भागवत, रामायण जिनवाणी कभी भी टाइम पास के लिए नहीं सुनना, यह समय को सुधारती है। उन्होंने कहा कि आपस की लड़ाई में व्यक्ति धर्म को छोड़ देता है, उपवास कर लेना सरल है, एकांत रहना सरल है लेकिन दूसरों की बात को सुन लेना उपवास से बढक़र समता है।
 

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