कार्य ऐसा करो कि दुनिया याद करें : मुनिश्री

Samachar Jagat | Wednesday, 01 Aug 2018 12:47:44 PM
Do the work, remember the world: Munishri

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देवली। उपखण्ड के श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र ‘सुदर्शनोदय’ तीर्थ आंवा मे चल रहे चातुर्मास में आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य मुनि पुंगव 108 श्री सुधा सागर जी महाराज, मुनि श्री 108 महासागर जी, मुनि श्री 108 निष्कम्प सागर, क्षुल्लक श्री 105 गंभीर सागर, क्षुल्लक श्री 105 धैर्य सागर जी महाराज ससंग ने मंगलवार सुबह अपने मंगल प्रवचनों में कहा कि जो इंसान वयस्क होने पर भी अपने माता-पिता से जूठे बर्तन मजवाता है नहाने, धोने एवं पीने के लिए पानी भरवाता है वो पाप का भागी होता है उसे कभी भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। दिगंबर जैन मुनि सुधासागर महाराज ने कहा कि कृत्य ऐसा करना चाहिए जिससे माता-पिता, परिवार, समाज और देश का नाम हो। बैर, पाप और अभिमान को छोडऩा चाहिए। संपत्ति के लिए भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है।

 अहिंसा धर्म के पालन के लिए जैन साधु वर्षायोग करते हैं। इसका मकसद श्रद्धालुओं में आध्यात्मिक जागरण व श्रद्धा को लाना है। श्रावक 4 माह अहंकार, दुराग्रह को छोड़ सरलता धारण करें। यह विचार संत श्री सुधा सागर जी ने मंगल प्रवचनों में व्यक्त किए। अध्यक्ष नेमिचन्द जैन ओमप्रकाश जैन पवन जैन आशीष जैन श्रवण कोठारी ने बताया कि रोजाना धर्मसभा में देवली, जयपुर, कोटा टोंक, मालपुरा, अजमेर, ब्यावर, किशनगढ़, निवाई सवाई माधोपुर से सैकड़ों जैन समाज के लोग प्रवचन में भाग लेकर धार्मिक पुण्य कमा रहे हैं। मुनिश्री ने मंगलवार को बताया कि मां-बाप की सेवा करना वह धर्म है। वह तो चाहे कैसे भी हिसाब हो, पर यह सेवा करना हमारा धर्म है और जितना हमारे धर्म का पालन करेंगे, उतना सुख हमें उत्पन्न होगा। बुजुर्गों की सेवा तो होती है, साथ-साथ सुख भी उत्पन्न होता है।

 मां-बाप को सुख दें, तो हमें सुख उत्पन्न होता है। मां-बाप को सुखी करें, वे लोग कभी भी दुखी होते ही नहीं है। व्यवहार आदर्श होना चाहिए। जो व्यवहार खुद के धर्म का तिरस्कार करे, मां-बाप के संबंध का तिरस्कार करे, उसे धर्म कैसे कहा जाए?

जैसा बोता है, वैसी ही फसल काटता है। यही मूलमंत्र है। संत श्री ने ‘सुदर्शनोदय’ तीर्थ आंवा में धर्मसभा में अपने प्रवचन में कहा कि गुरु या देवी-देवता भी किसी व्यक्ति की पूजा-उपासना तभी स्वीकार करते हैं, जब वह अपने घर में मौजूद देवी-देवता यानी मां-बाप की सेवा करता है। मां-बाप की उपेक्षा करने वालों के लिए तीर्थस्थलों की खाक छानने का कोई अर्थ नहीं है। दुर्भाग्य से आज यही हो रहा है। लोग यह भूल जा रहे हैं कि मां-बाप कितने कष्ट उठाकर बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। अपने बच्चे की क्षुधा शांत किए बिना मां भोजन नहीं करती। बच्चे को जरा-सा कष्ट हुआ नहीं कि माता की नींद उड़ जाती है।

बच्चे का भविष्य बनाने के लिए मां-बाप अपना सर्वस्व झोंक देते हैं। मगर जैसे ही बच्चा बड़ा होता है, अपने पैरों पर खड़ा होता है, उसकी शादी हो जाती है, उसके बाल-बच्चे हो जाते हैं, तो वह एकदम से अपने मां-बाप को बिसार देता है। बहाना है जेनरेशन-गैप मां-बाप की सेवा नहीं करने वाले लोग तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। कभी कहते हैं कि समस्या तो जनरेशन-गैप की है। कभी कहते हैं कि मामला तो सास-बहू की अनबन का है, हम क्यों बीच में पड़ें। कभी कहते हैं कि मां-बाप दूसरे शहर के माहौल में एडजस्ट नहीं कर पाते हैं, आदि-आदि। लोग मां-बाप को गांव में छोडक़र शहर में अपना स्टैंडर्ड मेंटेन करने में लग जाते हैं।

 मां-बाप के निवाले की फिक्र किए बिना, उनकी तकलीफों की चिंता किए बिना वे शानो-शौकत की अपनी दुनिया में खो जाते हैं। वे भूल जाते है कि उनके भी बच्चे एक दिन बड़े होंगे और वे भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव कर सकते हैं। इस तरह एक गलत परंपरा और रूढ़ होती जाएगी, जिसके बड़े दुष्परिणाम सामने आते हैं। आशीर्वाद से कष्ट-निवारण मां-बाप के सम्मान की रक्षा और उनकी सेवा-सुश्रुषा से ही स्वस्थ परिवार और समाज का निर्माण संभव है। जो सैकड़ों लोग अपनी तकलीफों की फेहरिस्त लेकर संत-महात्माओं के पास जाते हैं, ऐसे लोगों के दोषों की गिनती करने और समस्या की गहन पड़ताल करने से 70 फीसदी मामलों में यही साबित होता है कि उन्होंने अपने मां-बाप की उपेक्षा की है।

उन्हें सताया है। उनसे जायदाद तो हथिया ली, लेकिन उनकी सेवा नहीं की है। ऐसे लोगों को सच्चे साधक यही सलाह देते हैं कि वे अपने मां-बाप के चरणों की धूल को सिर-माथे से लगाएं। अपनी गलतियों के लिए उनसे माफी मांगे और उनकी पूरी श्रद्धा से सेवा करें। यदि मां-बाप का आशीर्वाद मिल गया तो कष्ट अपने आप दूर होने लगेंगे। और शायद तब किसी ज्योतिषी-महात्मा के पास जाने की जरूरत ही न पड़े और न ही तीर्थों की खाक छाननी पड़े। जैसा बोएंगे, वैसा काटेंगे। 

मां-बाप अच्छे-बुरे नहीं होते हैं। वे तो बस मां-बाप होते हैं। उनकी निष्कलुष मन से सेवा कीजिए। अगर वे साथ रहते हैं, तो उनकी खुद अपने हाथों से सेवा कीजिए। यदि किन्हीं कारणों से दूर रहते हैं, तो उनके भोजन, वस्त्र, चिकित्सा, दान-पुण्य, तीर्थाटन आदि जरूरतों का ध्यान रखें। इस संबंध में पर्या? धन का प्रबंध समय पर करें। याद रखें कि व्यक्ति जैसा बोता है, वैसी ही फसल काटता है। यही मूलमंत्र है।

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