जीवन में परमार्थ के लिए अंतरंग वैभव जरूरी : मुनिश्री

Samachar Jagat | Friday, 12 Oct 2018 04:14:23 PM
Intimate glory is essential for Pararth in life: Munishri

Rajasthan Tourism App - Welcomes to the land of Sun, Sand and adventures

आवां। संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि संसार का नाम है संगठन और परमार्थ का नाम है विघटन। मुनिश्री ने उक्त विचार गुरुवार को सुदर्शनोदय तीर्थ आवां में धर्मसभा में व्यक्त किए।  उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यदि परमार्थ की तरफ बढऩा है विघटन को प्राप्त करना है, यानि सबसे अलग हो जाना।


सबसे अलग हुए बिना व्यक्ति कभी भी परमार्थ की सिद्धि नहीं कर सकता, क्योंकि परमार्थ जब होता है वो अपने अंतरंग वैभव को इतना विशाल बना देता है, जहां दूसरे की तरफ देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती। वहीं व्यक्ति दूसरे की तरफ देखता है, जिसमें कुछ कमी होती है। अपने हाथ की स्थितियां जो बनती है, वो सोचता है, कुछ तो है जो मेरे पास नहीं है, लेकिन परमार्थी तो इतना सब कुछ अपने में पा जाता है तो उसको दूसरे की तरफ पाने का भाव ही नहीं आता। 

जब-जब तुम्हें ऐसा लगे चाहे वो व्यवहार परमार्थ हो चाहे निशया परमार्थ हो, जब-जब तुमको ऐसा लगे मैं आत्मपूर्ण है समझ लेना आप परमार्थ की तरफ बढ़ रहे हैं। किसी भी अपेक्षा लगे आप अपने परिवार की अपेक्षा से लगे कि मैं अपने परिवार में पूर्ण हूं, समझ लेना कि आपका परिवार परमार्थ का बीजारोपण कर दिया। जब आपको धन की तरफ से लगे कि अब मैं पूर्ण हूं तो आप परमार्थ की तरफ बढ़ रहे हो। जब आपको ज्ञान की तरफ से लगे कि ज्ञानरूपी पूर्ण आत्मा हूं अब मुझे ज्ञान की जरूरत नहीं है, समझ लेना तुम्हें वेद विज्ञान हो गया और वो परमानंद तुम्हें प्राप्त हो गया। 

तुम्हें अपनी आंखों की तरफ से लगे कि आंखें पूर्ण है, मुझे मेरी आंखें जितना देखना है, उतना दिखाती है, इनसे मैं संतुष्ट हूं समझ लेना आपकी आंख परमार्थ रूप धर्म रूप है। कान भी ऐसे ही है जितना मुझे सुनना है मेरे कान उतना मुझे सुना रहे है, मैं मेरे कानों से संतुष्ट हूं, मैं अपनी आवाज से संतुष्ट हूं, जितना मुझे बोलना है गला मेरा साथ देता है, आपका गला परमार्थ रूपी हो गया। आप अपने शरीर से संतुष्ट है तो आपका शरीर परमार्थ रूपी हो गया। 

अर्थात जो भी तुम्हारे पास या तुम्हें ऐसा लग जाए कि मै हूं, अपने में स्वयंपूर्ण, मुझमें कुछ भी गंध नहीं मैं अपने आप में पूर्ण हूं मुझे किसी की भी वस्तु की जरूरत नहीं, मैं अपने आप में इतना सुंदर हूं कि मुझे दूसरे के सौन्दर्य को देखने का कभी मन भी नहीं करता तो समझ लेना आपको परम सौन्दर्य का परमार्थ मिल गया।

देश के कोने-कोने से आ रहे हैं श्रद्धालु 
अध्यक्ष नेमीचन्द जैन, आशीष जैन, श्रवण कोठारी ने बताया कि प्रतिदिन प्रात: 7:30 बजे से अभिषेक एवं शांतिधारा, 9 बजे मुनिश्री के प्रवचन, 10:30 बजे मुनिश्री की आहारचर्या, 12 बजे सामायिक व सायं 5:30 बजे महाआरती एवं जिज्ञासा समाधान का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। समिति के ओमप्रकाश जैन, धर्मचंद जैन ने बताया कि मुनिश्री के दर्शनार्थ राजस्थान के भीलवाड़ा, अजमेर, किशनगढ़, ब्यावर, बांसवाड़ा, कोटा, बूंदी, टोंक, स्वाइमाधोपुर, जयपुर के साथ साथ मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महारास्ट्र, नोएडा, से भी श्रद्धालु मुनिश्री का आशीर्वाद लेने पहुंच रहे हैं।

Rajasthan Tourism App - Welcomes to the land of Sun, Sand and adventures



 


Copyright @ 2018 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.