जितना धर्म करोगे उतना ही सुख मिलेगा : मुनिश्री

Samachar Jagat | Wednesday, 08 Aug 2018 02:01:28 PM
The more religion you get, the more happiness you will enjoy: Munishri

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देवली। संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्या सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि जो मनुष्य अपने मां-बाप की सेवा नहीं करते वे इस जन्म में सुखी नहीं होते हैं, जो मनुष्य मां-बाप का दोष देखे, उनमें कभी बरकत ही नहीं आती। पैसे वाला बने शायद, पर उसकी आध्यात्मिक उन्नति कभी नहीं होती। मां-बाप का दोष देखने नहीं चाहिए।

मुनिश्री ने उक्त विचार मंगलवार को श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र ‘सुदर्शनोदय’ तीर्थ आवां में धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मां-बाप की सेवा करना धर्म है। वह तो चाहे कैसे भी हिसाब हो, पर यह सेवा करना हमारा धर्म है और जितना हमारे धर्म का पालन करेंगे, उतना सुख हमें उत्पन होगा। बुजुर्गों की सेवा तो होती है, साथ-साथ सुख भी उत्पन्न होता है। मां-बाप को सुख दें, तो हमें सुख उत्पन्न होता है। मां-बाप को सुखी करें, वे लोग सदैव, कभी भी दुखी होते ही नहीं है।

सदैव माता-पिता का आदर करो
हिंदू धर्म के ऐसे कई पुराणव ग्रंथ हैं जिनमें मानव के हित के लिए कई बातें बताई गई हैं। इन पुराणों में से एक गरुड़ पुराण है। जिस के द्वारा मानव को यह बताया गया है कि संसार में माता-पिता के समान श्रेष्ठ अन्य कोई देवता नहीं है। अत: सदैव सभी प्रकार से अपने माता-पिता की पूजा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हितकारी उपदेश देने वाला होने से पिता प्रत्यक्ष देवता है।

 संसार में जो अन्य देवता हैं, वे शरीरधारी नहीं हैं। इन प्रत्यक्ष देवताओं की सदैव पूजा करना अर्थात सेवा करना और सुखी रखना ही हमारा सर्वोपरि धर्म है। श्री वाल्मीकि रामायण में भी माता-पिता और गुरु को प्रत्यक्ष देवता मानकर सेवा और सम्मान करने का उपदेश दिया गया है। मुनिश्री ने श्री राम का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान श्री राम सीता जी से कहते हैं कि हे सीते! माता-पिता और गुरु ये तीन प्रत्यक्ष देवता हैं, इनकी अवहेलना करके अप्रत्यक्ष देवता की आराधना करना कैसे ठीक हो सकता है? जिनकी सेवा से अर्थ, धर्म और काम तीनों की प्रा?ि होती है, जिनकी आराधना से तीनों लोकों की आराधना हो जाती है, उन माता-पिता के समान पवित्र इस संसार में दूसरा कोई भी नहीं है। इसलिए लोग इन प्रत्यक्ष देवता (माता-पिता, गुरु) की आराधना करते हैं।

धर्म मुक्त करता है जबकि कर्म बंधन पैदा
मुनिश्री ने कहा कि कर्म बहुत जरुरी है। यहां तक कि अगर आप चाहें तो भी कर्म करने से खुद को रोक नहीं सकते। कर्म से मतलब सिर्फ शारीरिक क्रिया से ही नहीं है। आप शरीर से कर्म करते हैं, मन से कर्म करते हैं, अपनी भावना से कर्म करते हैं, यहां तक की आप अपनी ऊर्जा के स्तर पर भी कर्म करते हैं। हर वक्त आप शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक क्रियाएं करते रहते हैं।

क्या आपको लगता है कि आपके भीतर कर्म न करने की क्षमता है? चाहे कर्म करने की आपकी इच्छा हो या न हो, आप किसी न किसी रूप में कर्म कर ही रहे होते हैं। लेकिन होता यह है कि लोग पूरे दिन जो भी काम करते हैं, उनमें से ज्यादातर कर्म फल की इच्छा द्वारा संचालित होते हैं। आम तौर पर लोगों के मन में बड़े पैमाने पर यही चल रहा होता है कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, उससे उन्हें क्या मिलेगा। दूसरी तरफ यदि आप अपने लाभ के बारे में सोचे बिना कोई काम कर रहे हैं यानी आप उसे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उसे किए जाने की जरूरत है, तो ऐसी स्थिति में वही क्रियाकलाप धर्म बन जाता है। 

यहां धर्म का मतलब कर्तव्य समझा जाता है, हालांकि यह पूरी तरह से कर्तव्य नहीं है। क्योंकि कर्तव्य शब्द अपने आप में बहुत सीमित है, जबकि धर्म, कर्तव्य से कहीं ज्यादा व्यापक अर्थ रखता है। धर्म और कर्म में केवल एक ही अंतर है। धर्म मुक्त करता है, जबकि कर्म बंधन पैदा करता है। तो कर्म तो अनिवार्य है। किसी भी हालत में कर्म तो आपको करना ही है, चाहे आप आराम ही क्यों न कर रहे हों। आराम के दौरान भी आप अपने मन या भावना में कुछ न कुछ कर ही रहे होते हैं। अब यह आपको देखना है कि आप अपने आपको उलझाने के लिए कर्म कर रहे हैं या मुक्त करने के लिए?

जैन धर्म में चातुर्मास की महत्ता
मुनिश्री ने चातुर्मास की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में विभिन्न धर्मों के संत महात्माओं की अपनी-अपनी मान्यताओं और धार्मिक विधानों के अनुसार साधना पद्धतियां, अनुष्ठान और निष्ठाएं परिपक्व हुईं हैं। इन पद्धतियों में चातुर्मास की परम्परा बड़ी महत्वपूर्ण है। वैदिक परम्परा के संतों में भी चातुर्मास की परम्परा चली आ रही है लेकिन जैन धर्म में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों में उल्लेख है कि संघ पर संकट आने अथवा किसी स्थविर या वृद्ध साधु की सेवा के लिए साधु चातुर्मास में दूसरे स्थान पर जा सकता है अन्यथा उसे चातुर्मास में एक स्थान पर रुकने का शास्त्रीय आदेश है। 

जैन धर्म में चातुर्मास की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। स्वयं श्रमण भगवान महावीर ने अपने जीवन में विभिन्न क्षेत्रों में चातुर्मास किए। उन्होंने अपना अंतिम 42वां चातुर्मास पावापुरी में किया था। यहां उन्होंने अपना अंतिम उपदेश तथा देशनाएं दी थीं जो जैनों के प्रसिद्ध आगम ‘उत्तराहयमन सूत्र’ में संकलित हैं। अपने इस अंतिम चातुर्मास में भगवान महावीर ने अपने प्रधान शिष्य गौतम स्वामी को प्रतिबोध देते हुए कहा था-‘समयं गोयम मा पमाए’ अर्थात ‘‘हे गौतम! संयम साधना के लिए एक क्षण भी आलस्य मत करो।’’ भगवान महावीर का यह संदेश केवल गौतम स्वामी के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक साधक के लिए था। जैन धर्म में सामाजिक तथा धार्मिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यक्ति और समाज में परपस्पर सम्बद्ध हैं। एक-दूसरे का विकास परस्पर सहयोग से होता है।

 हमारे साधु-साध्वियां वर्षाकाल में लोगों को समाज में परस्पर भाईचारे, सद्भावना और आत्मीयता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में व्यक्ति और समाज की परिस्थितियां बदल गई हैं। जीवन में कुंठाएं, धन लोलुपता और पक्ष राग बढ़ गया है तथा धर्म राग कम हो गया है। फिर भी साधु-साध्वी इसमें संतुलन रखने और मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं जिससे समाज में एकसुरता बनी रहती है। धार्मिक दृष्टि से तप, जप, स्वाध्याय, दान, उपकार और सेवा आदि प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना उनका ध्येय भी है और कर्तव्य भी, क्योंकि साधु-साध्वियां समाज के अधिक निकट होते हैं और वे समाज में पनप रही रूढ़ीवाद और मिथ्या धारणाओं का निराकरण करने का प्रय? करते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में चातुर्मास की यही विशेषता है।

भगवान महावीर ने चातुर्मास में इसकी गवेषणा इसलिए की थी कि व्यक्ति समाज में रहते अनेक प्रकार के मन-मुटावों का शिकार हो सकता है अत: महापर्व सम्वत्सरी में इनका सुधार कर लिया जाए। अध्यक्ष नेमीचन्द जैन, समिति के ओमप्रकाश जैन, धर्मचंद जैन, आशीष जैन, श्रवण कोठारी ने बताया कि मुनिश्री के दर्शनार्थ श्रद्धालु राजस्थान के भीलवाड़़ा, अजमेर, किशनगढ़, ब्यावर, बांसवाड़ा, कोटा, बूंदी, टोंक, स्वाइमाधोपुर, जयपुर के साथ साथ मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, नोएडा से भी आशीर्वाद लेने पहुंच रहे हैं।

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