पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

Samachar Jagat | Monday, 12 Mar 2018 02:13:15 PM
papmochani ekadashi vrat katha

धर्म डेस्क। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और भक्त की हर मनोकामना पूरी करते हैं। ये व्रत कैसे शुरू हुआ और इसके पीछे की कथा क्या है आइए आपको बताते हैं इसके बारे में  .....................

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा :-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में मुनिवर मेघावी महर्षि चैत्ररथ वन में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । मंजुघोषा नामक अप्सरा मुनिवर को मोहित करने के लिए गई । लेकिन वह मुनि के भय से आश्रम से एक कोस दूर ही ठहर गयी और सुन्दर ढंग से वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी ।

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मुनिश्रेष्ठ मेघावी घूमते हुए उधर से निकले और उस सुन्दर अप्सरा को इस प्रकार गान करते देख बरबस ही मोह के वशीभूत हो गए। मुनि की ऐसी अवस्था देख मंजुघोषा उनके समीप आयी और वीणा नीचे रखकर उनका आलिंगन करने लगी। मेघावी भी उसके साथ रमण करने लगे। रात और दिन का भी उन्हें भान न रहा। इस प्रकार उन्हें बहुत दिन व्यतीत हो गए । मंजुघोषा देवलोक में जाने को तैयार हुई। जाते समय उसने मुनिश्रेष्ठ मेघावी से कहाः 'ब्रह्मन् ! अब मुझे अपने देश जाने की आज्ञा दीजिए।'

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मेघावी बोलेः देवी ! जब तक सवेरे की संध्या न हो जाय तब तक मेरे ही पास ठहरो । अप्सरा ने कहाः विप्रवर ! अब तक न जाने कितनी ही संध्याएं चली गई। मुझ पर कृपा करके बीते हुए समय का विचार तो कीजिए। अप्सरा की बात सुनकर मेघावी चकित हो उठे । उस समय उन्होंने बीते हुए समय का हिसाब लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते हुए उन्हें सत्तावन वर्ष हो गए। उसे अपनी तपस्या का विनाश करने वाली जानकर मुनि को उस पर बड़ा क्रोध आया । उन्होंने शाप देते हुए कहाः 'पापिनी ! तू पिशाची हो जा ।'

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मुनि के शाप से दग्ध होकर वह विनय से नतमस्तक हो बोली : 'विप्रवर ! मेरे शाप का उद्धार कीजिए । सात वाक्य बोलने या सात पद साथ- साथ चलने मात्र से ही सत्पुरुषों के साथ मैत्री हो जाती है । ब्रह्मन् ! मैंने तो आपके साथ अनेक वर्ष व्यतीत किए हैं, अतः स्वामी ! मुझ पर कृपा कीजिए ।'

मुनि बोलेः भद्रे ! क्या करुँ ? तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली है । फिर भी सुनो , चैत्र कृष्णपक्ष में जो एकादशी आती है उसका नाम है 'पापमोचनी।' वह शाप से उद्धार करने वाली तथा सब पापों का क्षय करने वाली है । सुन्दरी ! उसी का व्रत करने पर तुम्हारी पिशाचता दूर होगी। ऐसा कहकर मेघावी अपने पिता मुनिवर च्यवन के आश्रम पर गए। उन्हें आया देख च्यवन ने पूछा : 'बेटा ! यह क्या किया ? तुमने तो अपने पुण्य का नाश कर डाला !'

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मेघावी बोलेः पिताजी ! मैंने अप्सरा के साथ रमण करने का पातक किया है । अब आप ही कोई ऐसा प्रायश्चित बताइए, जिससे पातक का नाश हो जाए । च्यवन ने कहाः बेटा ! चैत्र कृष्णपक्ष में जो 'पापमोचनी एकादशी' आती है, उसका व्रत करने पर पाप राशि का विनाश हो जाएगा ।



पिता का यह कथन सुनकर मेघावी ने उस व्रत का अनुष्ठान किया । इससे उनका पाप नष्ट हो गया और वे पुनः तपस्या से परिपूर्ण हो गये । इसी प्रकार मंजुघोषा ने भी इस उत्तम व्रत का पालन किया । 'पापमोचनी' का व्रत करने के कारण वह पिशाचयोनि से मुक्त हुई और दिव्य रुपधारिणी श्रेष्ठ अप्सरा होकर स्वर्गलोक में चली गई ।

जो श्रेष्ठ मनुष्य 'पापमोचनी एकादशी' का व्रत करते हैं उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है । ब्रह्महत्या, सुवर्ण की चोरी, सुरापान और गुरु पत्नी गमन करने वाले महापातकी भी इस व्रत को करने से पापमुक्त हो जाते हैं । यह व्रत बहुत पुण्यमय है ।

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(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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