गौशाला बन रही है श्वेत क्रांति की नजीर

Samachar Jagat | Sunday, 14 Jan 2018 09:24:00 AM
Gaushala is the image of the white revolution

कुशीनगर। उत्तर प्रदेश में कुशीनगर के पडरौना कस्बे में पिंजरापोल गौशाला सहकारिता और श्वेत क्रांति की नजीर बनती जा रही है। वर्ष 1893 में एक गाय से शुरू इस गौशाला में इस समय 450 गायें हैं। लगभग चार एकड़ क्षेत्र में फैली यह गौशाला हरियाणा नस्ल की विलुप्त हो रही गायों के साथ ही साहीवाल व मैनी नस्ल की दो सौ से अधिक गायों को सहेजे हुए है। अब अपने पैर पर खड़ा होने की जद्दोजहद में इस गौशाला से प्रतिदिन दो सौ लीटर दूध की बिक्री खास तरीके से हो रहा है।

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एडवांस में उपलब्धता के आधार पर दूध की पर्चियां कटती हैं। साथ ही प्रतिदिन 30 लीटर के करीब दूध बचाकर गौशाला के नाम से शुद्ध पेड़ा बनाकर ब्रांडिंग की जा रही है और इस पेड़े की डिमांड कोलकाता, मुंबई व दिल्ली सरीखे शहरों में होती जा रही है। गौरतलब है कि वर्ष 1893 में स्वामी हरिदास नाम के साधु पडरौना आए और एक गाय से इस गौशाला की शुरुआत की। उनके प्रयासों को उनके शिष्य रघुवीर दास त्यागी ने बखूबी आगे बढ़ाया और उनके समय में दो एकड़ क्षेत्रफल में फैल चुकी गौशाला में गायों की संख्या 20 हो गई।

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बाद के दिनों में 1971 के आसपास पडरौना के व्यवसायी नंदलाल चहाडिय़ा उर्फ भगत जी ने दो एकड़ जमीन खरीद गौशाला के नाम रजिस्ट्री कर दी और फिर मारवाड़ी समाज के लोगों ने एक कमेटी बनाकर गौशाला का प्रबंधन देखना शुरू कर दिया। इस दौरान शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायिक घराने खेतान परिवार, टिबड़ेवाल परिवार व लोहिया परिवार के लोग इस प्रबंधन से जुडऩे लगे और गौशाला समृद्ध होती गई।-एजेंसी 



 

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