चुनावी बांड के क्रेताओं की पहचान ज्ञात नहीं तो काले धन पर रोक लगाने का प्रयास निरर्थक: न्यायालय

Samachar Jagat | Friday, 12 Apr 2019 12:05:33 PM
 identity of the buyers of electoral bonds is not known if it is not worth effort to ban black money: court

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगर पारदर्शी राजनीतिक चंदा के लिए शुरू किए गए चुनावी बांड के क्रेताओं की पहचान ज्ञात नहीं है तो चुनावों में कालाधन पर अंकुश लगाने का सरकार का प्रयास निरर्थक होगा। शीर्ष अदालत ने एक एनजीओ की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया जिसने इस योजना की वैधता को चुनौती दी है और मांग की है कि या तो चुनावी बांड जारी किये जाने पर रोक लगा दी जाए या चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक किए जाएं।

केंद्र ने यह कहते हुए योजना का पुरजोर समर्थन किया कि इसके पीछे का उद्देश्य चुनावों में कालाधन के इस्तेमाल को खत्म करना है और न्यायालय से इस मौके पर हस्तक्षेप नहीं करने को कहा। केंद्र ने न्यायालय से कहा कि वह चुनाव के बाद इस बात पर विचार करे कि इसने काम किया या नहीं। केंद्र ने प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ से कहा कि जहां तक चुनावी बांड योजना का सवाल है तो यह सरकार का नीतिगत फैसला है और नीतिगत फैसला लेने के लिये किसी भी सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता है।

पीठ ने सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल से पूछा कि क्या बैंक को चुनावी बांड जारी करने के समय क्रेताओं की पहचान का पता होता है। इस पर वेणुगोपाल ने सकारात्मक जवाब दिया और तब कहा कि बैंक केवाईसी का पता लगाने के बाद बांड जारी करते हैं, जो बैंक खातों को खोलने पर लागू होते हैं। पीठ ने कहा कि जब बैंक चुनावी बांड जारी करते हैं तो क्या बैंक के पास ब्योरा होता है कि किसे एक्स बांड जारी किया गया और किसे वाई बांड जारी किया गया।

नकारात्मक जवाब मिलने पर पीठ ने कहा कि अगर बांड के क्रेताओं की पहचान ज्ञात नहीं है तो आयकर कानून पर इसका बड़ा प्रभाव होगा और कालाधन पर अंकुश लगाने के आपके सारे प्रयास निरर्थक होंगे। वेणुगोपाल ने बांड सफ़ेद धन का इस्तेमाल और चेक, डिमांड ड्राफ्ट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिये करके उचित बैंक चैनल के माध्यम से खरीदे जाते हैं और बांड खरीदने के लिये किसी तीसरे पक्ष के चेक की अनुमति नहीं दी जाती है।

पीठ ने तब मुखौटा कंपनियों द्बारा दिये जाने वाले चंदे के बारे में पूछा और कहा कि अगर चंदा देने वालों की पहचान का पता नहीं है तो ऐसी कंपनियां 'काला धन को सफ़ेद में तब्दील कर लेंगी। इसके अलावा केवाईसी सिर्फ धन के स्रोत के प्रमाणन के लिये है। शीर्ष विधि अधिकारी ने कहा कि मुखौटा कंपनियों का अस्तित्व और काला को सफ़ेद में तब्दील किया जाना हमेशा होता रहेगा। हम और क्या कर सकते हैं। हम कुछ ऐसा करने का प्रयास कर रहे हैं, जो सिर्फ इसलिये खराब नहीं हो सकता कि मुखौटा कंपनियां मौजूद हैं। वेणुगोपाल ने कहा कि बैंक ग्राहक को जानती है, लेकिन इस बात को नहीं जानती कि कौन सा बांड किस पार्टी को जारी किया गया।

उन्होंने कहा कि चुनावी बांड के क्रेताओं की पहचान को जाहिर विभिन्न कारणों से नहीं किया जाना चाहिये यथा किसी फर्म या व्यक्ति के दूसरे राजनीतिक दल या समूह के जीतने पर परिणाम भुगतने का डर नहीं हो। उन्होंने कहा कि मतदाताओं को वैसे लोगों के बारे में जानने का अधिकार है कि किसने उनके उम्मीदवारों को धन मुहैया कराया है। उन्होंने कहा कि मतदाताओं का सरोकार इस बात को जानने को लेकर नहीं है कि कहां से धन आया।

पारदर्शिता को मंत्र के तौर पर नहीं देखा जा सकता। देश की हकीकत क्या है। यह एक योजना है जो चुनावों से काला धन को खत्म कर देगी। उन्होंने कहा कि चंदा देने वालों का भी निजता का अधिकार है और शीर्ष अदालत का फैसला राजनीतिक संबद्धता के अधिकार को मान्यता देता है और न्यायालय से योजना को बरकरार रखने की अपील की।

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से उपस्थित अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि इस योजना का काला धन पर रोक लगाने के प्रयासों से कोई लेना-देना नहीं है और यह नाम जाहिर नहीं करके चंदा देने के बैंकिग माध्यम को भी खोलता है। उन्होंने कहा कि इससे पहले आप पार्टी को नकद चंदा दे सकते थे। अब आप बैंक के जरिए भी चंदा दे सकते हैं।

शुरुआत में वेणुगोपाल ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से चुनावों में काला धन का इस्तेमाल होता रहा है। यह सुधारात्मक कदम है। इस योजना का चुनाव के बाद परीक्षण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि रोजाना आधार पर नकदी जब्त हो रही है। शराब और 'बिरयानी’ बांटे जा रहे हैं। यह हकीकत है और सवाल यह है कि क्या हमें इस पर रोक लगाने के प्रयास करने चाहिये या नहीं।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव के लिये एक करोड़ और लोकसभा चुनाव के लिये दो करोड़ रुपये खर्च करने की सीमा तय की है, लेकिन उम्मीदवार 20 से 30 करोड़ रुपए खर्च करते हैं। शीर्ष अदालत ने चुनावी बांड योजना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी करते हुये कहा कि इस पर शुक्रवार को आदेश सुनाया जाएगा।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि चुनावी बांड योजना की वैधानिकता को चुनौती देने वाले गैर सरकारी संगठन ऐसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की याचिका पर शुक्रवार को फैसला सुनाया जायेगा। इस मामले में बुधवार को केन्द्र और निर्वाचन आयोग ने चुनावी बांड के लिये चंदा देने वालों के मामले में गोपनीयता बनाये रखने के बारे में परस्पर विरोधी दृष्टिकोण अपनाया था।

सरकार चंदा देने वालों के नाम गोपनीय रखना चाहती है जबकि निर्वाचन आयोग पादर्शितता के लिये इनके नामों का उजागर करने के पक्ष में है। सरकार ने चुनावी बांड योजना लाने से पहले आयकर कानून, जनप्रितिनिधित्व कानून, वित्त कानून और कंपनी कानून सहित अनेक कानूनों में संशोधन किया था। गैर सरकारी संगठन की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस योजना की खामियों की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया था और कहा था कि यह स्वतंत्र तथा पारदर्शी तरीके से चुनाव कराने की अवधारणा के खिलाफ है।



 

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