दोनों दलों में पार्टी से निकाले नेताओं को गले लगाने की होड़

Samachar Jagat | Monday, 22 Apr 2019 10:14:14 AM
Lok Sabha Elections 2019

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जयपुर। राजस्थान में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (लोकसभा) चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए जिताऊ नेताओं का सहारा लेने के लिए अपनी विचारधारा और उनका पिछला इतिहास भी भूलने के लिए तैयार है। दोनों दल किसी भी तरह लोकसभा चुनाव में बाजी मारने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं, लिहाजा पार्टी को नुकसान पहुंचाने और बगावत करने की वजह से निकाले गए नेताओं को न केवल गले लगा रहे हैं, बल्कि उन्हें चुनाव प्रबंधन की जिम्मेवारियां भी दे रहे हैं।

बीजेपी को पिछली बार गुर्जरों के वोट नहीं मिलने के कारण विधानसभा चुनाव में काफी खामियाजा उठाना पड़ा था, लिहाजा गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को पार्टी में शामिल किया गया। इसी तरह गुर्जर नेता एवं पूर्व मंत्री हेमसिंह भड़ाना को भी पार्टी में वापस ले लिया गया है। भड़ाना पार्टी से बगावत करके पिछला विधानसभा चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़े थे।

बीजेपी ने जाटों को और करीब लाने के लिए राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के नेता हनुमान बेनीवाल से हाथ मिलाया तथा एक सीट भी उन्हें सौंप दी। बेनीवाल ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को खासा नुकसान पहुंचाया था। कांग्रेस भी भाजपा छोड़ने वाले कई उन कद्दावर नेताओं को पार्टी में शामिल करके चुनाव में मदद ले रही है, जिनको लेकर पार्टी ने भाजपा को कटघरे में खड़ा किया था।

भाजपा सरकार में मंत्री रहे राजकुमार रिणवा खान घोटाले में फंसे हुए थे। कांग्रेस उनके इस्तीफे की लगातार मांग करती रही। भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो वे विद्रोह करक निर्दलीय लड़े। चुरु जिले में जाट मुस्लिम और ब्राम्हण का गठजोड़ बनाने के लिए कांग्रेस रिणवा को अपने साथ लेने से नहीं चूकी।

चुरु में ही कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी से बगावत करने वाले चंद्रशेखर वैद को भी साथ ले लिया। दौसा में डॉ किरोड़ीलाल मीणा के भाजपा में शामिल होने के बावजूद उनकी खास मदद नहीं मिलने से भाजपा गुर्जरों पर ज्यादा भरोसा कर रही है, वहीं छोटे मोटे मीणा नेताओं को भी मनाया जा रहा है।

जयपुर समेत कई स्थानों पर जातीय समीकरण साधने के लिये पार्षद एवं सरपंचों को भी एक दूसरे की पार्टी छुड़ाई जा रही है। बाड़मेर के सांसद कर्नल सोनाराम ही ऐसे नेता दिखाई दे रहे हैं, जिनकी दोनों दलों में पूछ नहीं है।

भाजपा का टिकट नहीं मिलने से कर्नल ने दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय के कई चक्कर काटे, लेकिन उन्हें कोई भाव नहीं मिला। भाजपा को इस बात से जरूर राहत मिल गई कि कांग्रेस के मंच से कर्नल पार्टी उम्मीदवार को नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे। 



 

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