मामले की खुद से पैरवी करने के अधिकार से नलिनी को वंचित नहीं किया जा सकता : मद्रास उच्च न्यायालय

Samachar Jagat | Wednesday, 12 Jun 2019 02:26:36 PM
Nalini can not be deprived of the right to lobby with the matter herself: Madras High Court

चेन्नई। मद्रास उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि अदालत में उपस्थित होकर अपनी याचिका की पैरवी करने के अधिकार से नलिनी श्रीहरण को वंचित नहीं किया जा सकता है।

नलिनी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड में छह अन्य दोषियों के साथ उम्रकैद की सजा काट रही हैं। नलिनी ने अपनी बेटी की शादी की तैयारियों के लिए छह महीने की सामान्य छुट्टी मांगी है और इसी से जुड़ी याचिका की पैरवी वह स्वयं अदालत में करना चाहती हैं।

इस संबंध में जब अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश वकील से पूछा कि नलिनी के व्यक्तिगत रूप से पेश होने में क्या दिक्कत है। वकील ने नलिनी को अदालत में पेश करने के लिए जरुरी सुरक्षा व्यवस्था के संबंध में सरकार से निर्देश लेने के लिए कुछ वक्त मांगा।

न्यायमूर्ति एम. एम. सुन्दरेश और न्यायमूर्ति एम. निर्मल कुमार की पीठ ने मौखिक आदेश में कहा कि अपना पक्ष रखने के लिए पेश होने के अधिकार से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख 18 जून तय की है।

पिछले 27 साल से जेल में बंद नलिनी ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह वेल्लोर स्थित विशेष महिला कारागार के पुलिस अधीक्षक को उसे पीठ के समक्ष पेश करने का निर्देश दे, ताकि वह खुद अपने मामले की पैरवी कर सके।

नलिनी का कहना है कि उम्रकैद की सजा पाने वाले किसी भी कैदी को दो साल में एक महीने का अवकाश लेने का अधिकार है, लेकिन उसने 27 साल तक जेल में बंद रहने के बावजूद इस सुविधा का कभी लाभ नहीं लिया। उसने 25 फरवरी, 2019 को बेटी की शादी की तैयारियों के लिए छह महीने की छुट्टी मांगी।

नलिनी को राजीव गांधी हत्याकांड में मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में तमिलनाडु सरकार ने 24 अप्रैल, 2000 को इसे उम्रकैद की सजा में बदल दिया। उसका दावा है कि मौत की सजा उम्रकैद में बदलने के बाद से 10 साल या उससे कम समय की सजा काट चुके करीब 3,700 कैदियों को राज्य सरकार रिहा कर चुकी है।

नलिनी ने अपनी अपील में कहा है कि उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों की समय पूर्व रिहाई की 1994 की योजना के तहत समय पूर्व रिहाई के उसके अनुरोध को राज्य मंत्रिपरिषद ने मंजूरी दे दी थी और नौ सितंबर, 2018 को तमिलनाडु मंत्रिपरिषद ने राज्यपाल को उसे और मामले के छह अन्य दोषियों को रिहा करने की सलाह दी थी, लेकिन अभी तक उसका पालन नहीं हुआ है। -(एजेंसी)



 

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