आज भी कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल को नहीं मिली पहचान हिंदी साहित्य में छोड़ी थी अमिट छाप

Samachar Jagat | Wednesday, 13 Sep 2017 03:32:33 PM
आज भी कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल को नहीं मिली पहचान हिंदी साहित्य में छोड़ी थी अमिट छाप

कोटद्वार। जीवन के मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में ही हिंदी साहित्य पर अमिट छाप छोडऩे वाले गढ़वाल के कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल की न तो कर्मभूमि और न ही जन्मस्थली की सुध आज तक किसी ने ली।

स्वर्गीय चंद्रकुंवर का पुश्तैनी मकान आज जीर्ण शीर्ण हालात में है। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल की रचनाओं से उनके जिले के ही अधिकतर लोग आज भी अनभिज्ञ हैं। किसी ने भी उनकी रचनाओं के प्रचार- प्रसार में कोई रुचि नहीं ली।

कोटद्वार के राजकीय महाविद्यालय के हिन्दी विभागध्यक्ष डॉ. नंद किशोर धौंडियाल का कहना है, चन्द्रकुंवर छायावादी कवि थे। उनकी कविताओं में प्रयोगधर्मिता दिखाई देती है। उनके अनुसार चन्द्रकुंवर की कविताएं अंग्रेजी के कवि विलियम वर्ड वर्थ तथा संस्कृत के कवि महाकवि कालिदास की रचनाओं के समकक्ष हैं। उन्होंने प्रकृति को बहुत निकट से देखा है, इसलिए उनकी कविताओं में प्रकृति का चित्रण, अन्य कवियों से उच्च कोटि का है।

चंद्रकुंवर की शिक्षा पौड़ी, देहरादून, इलाहाबाद और लखनऊ में हुई थी। इलाहाबाद से स्नातक करने के बाद वह स्नातकोत्तर करने लखनऊ चले गए। वहां उनकी भेंट सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से हुई। बाद में लखनऊ जाने पर उनका स्वास्थ्य खराब होने लगा जिसके चलते वह वापस अपनी कर्मस्थली पंवालिया गांव लौट आये। उन्होंने यहाँ अपनी लेखनी को विराम नहीं दिया। 

इस दौरान उन्होंने कई रचनाएं लिखीं। हिंदी के साथ-साथ वह गढ़वाली में भी रचनाएं लिखते थे। अंग्रेजी के कवि जॉन कीट्स 26 साल की अल्प आयु में ही दुनिया से अलविदा होकर विश्व विख्यात हो गए, और इसी प्रकार युवा कवि चन्द्रकुंवर साधन हीनता और बीमारी से जूझते हुए मात्र 28 साल की अल्प आयु में इस दुनिया से विदा हो गए।

कहते हैं 14 सितंबर 1997 की सुबह, उन्होंने अपनी माँ से कहा, मां मेरी कलम, हाथ से छूट गयी है। यही उनके आखरी शब्द थे और उनकी बाणी और कलम सदा के लिए शान्त हो गया। रुद्रप्रयाग जिले के मालकोटी के मूल निवासी चन्द्रकुंवर बर्त्वाल ने भीरी के निकट पंवालिया को अपने साहित्य साधना का केंद्र बनाया था। अपने अल्पकाल जीवन में ही उन्होंने सात सौ से अधिक कविताओं के साथ कई कहानियाँ, नाटक और निबन्ध लिखे । मात्र 28 वर्ष की आयु में ही 14 सितंबर 1947 को यह महान कवि हमसे दूर हो गया।

सबसे दुखद पहलू आज यह है कि प्रकृति के चितेरे इस कवि की रचनाओं को उत्तराखंड की सरकार ने अभी तक स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया है। संयोग देखें कि जिस दिन इस कवि की वाणी और कलम सदा के लिए शांत हो गयी उसी दिन हम हिंदी दिवस मनाते हैं।

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