जब तक एक आदमी के बराबर खून न गिर जाए तब तक चलता रहता है यह खेल

Samachar Jagat | Monday, 27 Aug 2018 11:25:23 AM
Playing Bagwal on the occasion of Rakshabandhan

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नैनीताल। देश रविवार को जहां भाई बहन के अटूट बंधन में बंधा रहा वहीं उत्तराखंड का एक हिस्सा इससे दूर पत्थरमार युद्ध बग्वाल खेलने में जुटा रहा। राज्य के कुमाऊं के चंपावत में होने वाले इस अछ्वुत खेल के हजारों लोग साक्षी बने जिनमें कुछ विदेशी मेहमान भी शामिल थे। देवीधुरा के असाड़ी कौतिक में बरसात के बावजूद खूब भीड़ थी। बग्वाल को देखने के लिए उत्तराखंड और अन्य राज्यों के श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचे थे। ऐतिहासिक खोलीखांण दूबाचैड़ मैदान में सुबह से भीड़ जुटनी शुरू हो गयी थी। बग्वाल दोपहर बाद 2.38 मिनट पर शुरू हुई और लगभग 2.46 मिनट पर बंद हो गयी। इस बार ऐतिहासिक बग्वाल मात्र आठ मिनट ही खेली गई। 

बग्वाल शुरू होते ही चारों खामों लमगड़िया, बालिग, गहड़वाल और चमियाल खामों के रणबांकुरों ने सबसे पहले मंदिर तथा मैदान की परिक्रमा की। इसके बाद शुरू हुआ असाड़ी कौतिक का सबसे लोकप्रिय खेल बग्वाल। दोनों ओर से पहले पहल फलों की बरसात हुई। धीरे - धीरे बग्वाल जब अपने चरम पर पहुंची तो पत्थर हवा में तैरने लगे। दोनों ओर से जमकर बग्वाल खेली गई। 

दोनों पक्षों ने आपस में जमकर फल और पत्थर चलाए। मैदान में डटे कुछ रणबांकुरे इस दौरान साथ लाए छतरों से अपने को बचाते दिखे। इस दौरान कई दर्जन रणबांकुरे घायल हो गए। जिनका पास ही लगाए गए मेडिकल कैंम्पों में इलाज किया गया। बग्वाल के इस ऐतिहासिक क्षण पर केन्द्रीय कपड़ा राज्यमंत्री अजय टम्टा तथा राज्य के राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार डा. धन सिह रावत भी मौजूद थे। 

 stone war is played here on the occasion of Rakshabandhan

इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने आराध्य देवी बाराही के दर्शन किए। गुरुवार को शुरू हुए असाड़ी कौतिक का शोभायात्रा के बाद समापन हो जाएगा। पौराणिक मान्यता है कि मां काली के गणों को खुश करने के लिए यहां नर बलि की प्रथा थी। बाद में परंपरा बदली और आराध्या देवी को खुश करने के लिए बग्वाल खेली जाने लगी। ऐसी मान्यता है कि जब तक एक आदमी के बराबर खून न गिर जाए तब तक बग्वाल खेली जाती है। -एजेंसी 

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