दूसरों के घर आंगन चमकाने वालों का जीवन बदरंग

Samachar Jagat | Monday, 05 Nov 2018 12:45:37 PM
The life of those who decorate the courtyard of others

अयोध्या। दीपावली के मौके पर वैभव की देवी लक्ष्मी और उनके भाई विघ्नहर्ता गणेश के आगमन से पहले घर द्वार की साज सफाई और रंगरोगन कराने की तमन्ना हर एक दिल में होना लाजिमी है मगर इस शुभ अवसर पर रंग रोगन कर दूसरों के घरों और मंदिरों को चमकाने वालों की खुद की जिंदगी में कोई रौनक नहीं है। त्यौहारों पर घरों एवं मंदिरों पर रंगाई-पुताई कर चमक-दमक लाने वाले इन मजदूरों को बमुश्किल इतनी मजदूरी मिल पाती है कि उनके घरों का खर्चा चल सके। रंगाई पुताई में लगे मजदूरों और मिस्त्रियों को दीपावली के त्यौहार पर काम तो खूब मिल रहा है लेकिन सफाई करने से उड़ती धूल कई बीमारियों को जन्म दे रही है। हाथों में पुताई के ब्रुश लेकर इन दिनों गली-मोहल्लों में घूमने वाले इन मजदूरों को कोई बीमारी या हादसा होने पर सारा खर्च खुद ही भुगतना पड़ता है। 

रंगाई पुताई करने वाले मोहम्मद तुफैल ने बताया कि बहुत से मजदूर क्षय तथा स्वांस की बीमारियों से पीड़ित हो जाते हैं। रंगाई, पुताई तथा सफाई करने के कारण सर्दी एवं सांस की बीमारी से ज्यादा प्रभावित होते हैं। इन मजदूरों के उपचार के लिए कोई योजना नहीं है। बहुत से मजदूर पैसे के अभाव में अपना इलाज नहीं करा पाते। ठेकेदारी प्रथा के कारण भी मजदूरों को शोषण का शिकार होना पड़ता है। तुफैल ने बताया कि ज्यादातर मजदूर स्वतंत्र रूप से काम नहीं तलाश पाते और मजबूरी में उन्हें ठेकेदारों की शरण लेनी पड़ती है।  इसी काम में लगे एक अन्य श्रमिक राम रोशन ने बताया कि दूसरों के घरों को रंग-रोगन से चमकाते हुए कभी-कभी मन में खुद के टूटे-फूटे घरों का भी ख्याल आता है जिसकी रंगाई भी नहीं हो पाती। राम रोशन ने इसे किस्मत का खेल मान लिया है। लेकिन स्वास्थ्य, सुविधा व काम की सुरक्षा के बारे में वह भी सरकार का संरक्षण जरूरी मानता है। 

अयोध्या मणिराम छावनी के निवासी रामबाबू दास ने बताया कि वह लगभग चालीस साल से इस काम में लगा है। अयोध्या के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी तथा कनक भवन जैसे काफी ऊंचाई वाले मंदिरों पर जान पर खेलकर रंगाई-पुताई का काम कर चुके रामबाबू ने बताया कि वह करीब अस्सी फुट ऊंचाई के मंदिरों के नक्काशीदार पेंटिंग करने का जोखिम भरा काम भी करता है। उन्होंने बताया कि रोशनी और पटाखों पर हजारों रुपए पानी की तरह बहाने वाले जब उनको तीन-चार सौ रुपए मजदूरी को लेकर सौदाबाजी करते हैं या मजदूरी देने से मना करते हैं तो बहुत अफसोस होता है। राम कुबेर नामक एक मजदूर का कहना है कि बड़े-बड़े मकानों का काम अब ठेकेदार हथिया लेते हैं। ठेकेदारों से मजदूरों को बहुत कम मेहनताना मिलता है।

विवादित श्रीरामजन्मभूमि के पीछे रहने वाले शिवराम ने कहा कि इस आधुनिक युग में रंगाई-पुताई भी मशीनों से होती है। इसके बावजूद भी बिना मजदूरों के सहयोग से घरों की साज-सज्जा ढंग से नहीं हो सकती है। उसने कहा हम लोग यही काम करते चले आ रहे हैं और मुझे लगता है कि मैं अपनी जिंदगी में इस काम को करता रहूंगा परन्तु मेरे बच्चे शायद इसको पसंद न करें। -एजेंसी



 

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