धरती पर गर्मी बढ़ने से पंद्रह करोड़ लोगों पर असर

Samachar Jagat | Thursday, 06 Dec 2018 11:56:22 AM
15 million people affected by heat on Earth

जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ता जा रहा है। लांसेट जर्नल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 से 2017 के बीच विश्व में करीब 15.70 करोड़ अतिरिक्त लोग भयंकर गर्मी के कारण जोखिम के दायरे में आ गए। यह आंकड़ा 2016 की तुलना में 1.8 करोड़ ज्यादा है। बढ़ती गर्मी से इन लोगों के स्वास्थ्य रहन-सहन एवं कामकाज के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत समेत पूरी दुनिया में बढ़ते तापमान से तमाम किस्म के दुष्प्रभाव अब सामने आने लगे हैं। यूरोप, पूर्वी भूमध्य सागरीय इलाके में खासतौर से गर्मी के जोखिम के मुहाने पर है।

वहां 65 से अधिक उम्र के 42 फीसदी लोग गर्मी से होने वाले नुकसानों का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट में पहली बार वायु प्रदूषण के कारण मौतों को उनके प्रदूषण के स्त्रोत के हिसाब से भी देखा गया है। इसके अनुसार दुनिया में करीब 16 फीसदी मौतें कोयला जनित प्रदूषण के कारण हो रही है। गर्मी से शहरी इलाकों में वायु प्रदूषण की तीव्रता और बढ़ जाती है। खासकर तब जब निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों के 97 फीसदी शहरों में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी वायु की गुणवता संबंधी निर्देश का पालन नहीं किया जा रहा है। वहीं रिपोर्ट के अनुसार वेक्टर बार्न जनित बीमारियों में बढ़ोतरी हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 30 देशों में कृषि उत्पादन में वृद्धि के रुख के ठीक विपरीत है।

 मौसम की चरम स्थितियों के साथ-साथ अधिक तीव्र होने के कारण दुनिया के हर क्षेत्र में कृषि उत्पादन में गिरावट आने का अनुमान है। ज्यादातर विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रति सफलापूर्वक अनुकूलन के लिए आर्थिक एवं प्रौद्योगिकीय स्त्रोतों का अभाव है। यह स्थिति इन देशों में उस भौतिक अवसंरचना के निर्माण की क्षमता में बाधा प्रतीत होती है, जो बाढ़, खराब मौसम का सामना करने और खेती-बाड़ी की नई तकनीक अपनाने के लिए जरूरी है। विभिन्न तौर-तरीकों से जलवायु परिवर्तन के खतरों को नियंत्रित किया जा सकता है। इनमें ऊर्जा प्रयोग की उन्नत क्षमता वनों को काटने पर नियंत्रण और जीवाश्म ईंधन का कम से कम इस्तेमाल जैसे कारक प्रमुख है।

 यह सर्वविदित है कि औधोगिक देशों द्वारा ज्यादा मात्रा में जीवाश्म ईंधन प्रयोग करने के कारण वातावरण मेें ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी अधिक हो रहा है। ये देश अपेक्षाकृत सस्ते जीवाश्म ईंधन का लाभ उठाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए अपना जीवन स्तर ऊपर उठा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत मेें पिछले चार सालों के दौरान प्रभावित होने वालों की संख्या में 200 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। लांसेट की रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्मी बढ़ने और तबाही की अन्य घटनाओं के कारण यह असर पड़ा है। रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए दिल्ली की संस्था ‘क्लाईमेट ट्रेंड’ ने कहा है कि यह चिंताजनक है कि जलवायु परिवर्तन की मार सबसे ज्यादा कम आय वाले देशों पर पड़ रही है। भारत इससे सर्वाधिक ज्यादा प्रभावित हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के खतरों से होने वाली मौतें देश में उच्च आय वाले देशों की तुलना में सात गुना ज्यादा है। जबकि घायल होने और विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या छह गुनी ज्यादा है।

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2012 से 2016 के बीच में गर्मी से प्रभावित होने वालों की संख्या में करीब 200 फीसदी ज्यादा है। हाल में आई विभिन्न रिपोर्टों में कहा गया है कि 2030 तक वैश्विक तापमान में एक डिग्री की बढ़ोतरी होगी, जबकि 2040 तक यह बढ़ोतरी 1.5 डिग्री और 2065 तक दो डिग्री तक हो सकती है। यदि उत्सर्जन में कुछ उपाय से इसमें कुछ कमी आने की संभावना है। आईपीसीसी ने हाल में अपनी रिपोर्ट में इसे 1.5 डिग्री तक सीमित रखने पर जोर दिया है। लेकिन चिंता यह है कि यदि रोकथाम के उपाय नहीं हुए तो 2100 तक यह 4 डिग्री तक बढ़ सकता है। क्लाईमेट ट्रेंड के अनुसार 2017 में बाढ़ और सूखे के कारण 18 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक की क्षति हुई। 2018 में केरल में आई बाढ़ के कारण अकेले केरल में 20 हजार करोड़ रुपए की क्षति होने का अनुमान है।
 



 

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