शरण आए असहाय की मदद से बहुत कुछ मिलता है

Samachar Jagat | Monday, 06 Aug 2018 10:36:11 AM
A lot of help with the help of helpless refuge

किसी समय शिवि नामक एक बहुत बड़े धार्मिक एवं दयालु राजा थे। वे अपना अधिकतर समय प्रजा की भलाई मेें व्ययतीत करते थे। ऐसे अच्छे कार्यो से उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। उनके अच्छे कार्यो और यश से देवराज इन्द्र इष्र्या करने लगे और शिवि को बदनाम करने की सोची और एक सौ यज्ञ करने का संकल्प लिया। यज्ञ पूरे होने से पहले इन्द्र ने शिवि को बदनाम करने के लिए अपने मित्र अग्नि देव को शामिल किया। 

इन्द्र ने अग्नि देव से कहा कि मैं बाज बनता हूं और तुम कबूतर बन जाओ। तुम राजा शिवि की गोद में जा गिरना और मैं खाने के बहाने तुम्हारा पीछा करूंगा। अब अग्नि कबूतर के रूप में राजा शिवि की गोद में जा गिरा। राजा ने उसे बड़े स्नेह से सहलाया, लेकिन उसी समय बाज रूप में इन्द्र वहां पहुंचा और राजा शिवि से बोला-‘हे राजन! मुझे जोरों की भूख लगी है, यह कबूतर मेरा आहार है, इसे मुझे सौंपो।’ राजा ने कहा- शरणागत की रक्षा और सहायता करना मेरा धर्म है, मैं तुम्हें इसे नहीं सौंप सकता हूं।

बाज कहने लगा मैं कबूतर के सिवाय कोई दूसरा मांस नहीं खाता हूं और अगर आपने यदि इस कबूतर को मुझे नहीं सौंपा तो मैं तो मरूंगा ही भूखे मरते मेरा परिवार भी मर जाएगा भूख से और यदि आप ऐसा करते हैं तो आप अपयश और अधर्म के भागीदार बनेंगे क्योंकि आप एक की जान बचाएंगे और बहुतों को मरने के लिए मजबूर कर देंगे। राजा शिव ने कहा कि तुम्हारे बोलने का ढंग तो बहुत अच्छा है, तुम बोल तो धर्म की बात ही रहे हो लेकिन मैं इसे तुम्हें नहीं सौंप सकता हूं, हां इसके बदले में मैं स्वयं अपना मांस दे सकता हूं। इससे बाज बहुत खुश हुआ और इस बात से सहमत हो गया। 

एक पलड़े में कबूतर और एक पलड़े में राजा ने अपना मांस रखा, लेकिन कबूतर का पलड़ा नहीं उठा, अब राजा स्वयं ही पलड़े में बैठे गए बाज का आहार बनने के लिए ऐसा होते हुए देवराज इन्द्र और अग्नि देव स्वयं प्रकट हो गए। इन्द्र देव ने राजा से कहा कि आपके यश से मेरे मन में ईष्र्या पैदा हो गई थी और इसी के चलते यह सब हुआ है। आप सच्चे हैं और आपका धर्म सच्चा है। आपके इस महान काम का प्रकाश युगों-युगों तक लोगों के अंधेरों को प्रकाशित करता रहेगा और आपकी यश गाथा गाई जाती रहेगी।

प्रिय मित्रो, व्यक्ति चला जाता है लेकिन उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य, उसके यश-अपयश इस संसार में अमर रहते हैं वे कभी नहीं मरते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी मरे हुए का जिक्र कर देता है तो उसी समय बहुत से लोग उसके बारे टिप्पणियां करने लग जाते हैं। इसलिए किसी शरणागत की सहायता क्षमता के अनुसार जरूर ही करें। अगर कोई धन से सक्षम नहीं है तो उसे तन से मन से और वाणी से तो अवश्य ही करनी चाहिए। याद रखें, यही मदद आपको आगे तक ले जाएगी।

प्रेरणा बिन्दु:- 
मौत मोहलत दे न दे
कि जिंदगी आगे बढ़े यह
सींच जहां को प्रेम से
जिंदगी जब तक डटे यह।



 

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