अभिमान का नशा सब कुछ भूला देता है

Samachar Jagat | Wednesday, 01 Aug 2018 11:32:27 AM
Abdominal intoxication forgets everything

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अनेकों प्रकार के नशों का शौक पाले रखता है आदमी। ये नशे वह इसलिए करता है ताकि अपनी नजर में वह औरों से स्मार्ट लगे, ऊंचा लगे, एक्टिव लगे और टेन्शन फ्री लगे। बीड़ी-सिगरेट के नशे के लिए वह तर्क देता है कि ऐसा करने से कुछ समय के लिए शरीर में चुस्ती आ जाती है और पेट में गैस नहीं बनती है। इसी प्रकार जर्दा-गुटका के लिए वह कहता है- मैं तो बहुत कम ही सेवन करता हूं, ऐसा करना मेरी आदत हो गई है, यह मेरी मजबूरी है, इससे मुझे राहत मिलती है और मेरी जिंदगी चलती है और शराब तो वह टेंशन भगाने के लिए यूज करता है। लेकिन ये सभी नशे तो बाहरी है ये छूट सकते हैं, लेकिन अहंकार का नशा तो भीतर का नशा है जो जमीन से आता है, जायदाद से आता है, पद से आता है, भौतिक सम्पत्ति से आता है, ज्ञान से आता है और भी बहुत सारी चीजों से आता है और इसके साथ एक बात और भी खास बात है कि यह एक बार आने के बाद फिर वापस जाता ही नहीं है।

एक बार गुरु रामदास छत्रपति शिवाजी के दुर्ग में पहुंचे। गुरुजी को देखकर शिवाजी की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा। उन्होंने गुरुजी के चरणों में झुककर आशीर्वाद लिया और महल में चलने का अनुरोध किया, गुरुजी ने कहा, मैं तो भिक्षा लेने आया हूं, मुझे महल में क्या करना है? गुरुजी से ऐसा सुनते ही शिवाजी महाराज ने एक पर्ची अपने भिक्षा पात्र में डाल दी। जब गुरुजी ने उस पर्ची को खोलकर पढ़ा तो बहुत क्रोधित हो गए क्योंकि पर्ची पर लिखा था, मैं मेरा साम्राज्य गुरुजी रामदास जी के चरणों में अर्पित करता हूं। ऐसा पढ़ते ही गुरु रामदास जी शिवाजी की तरफ मुड़ते हुए कहा, ‘यह राज्य तुम्हारा कैसे हो सकता है? यह सब कुछ तो प्रजा का है, तुम तो केवल इसके रक्षक हो।

जो वस्तु तुम्हारी है ही नहीं तो तुम उसे दूसरों को दान में कैसे दे सकते हो?’  जब अपने गुरुजी से ऐसा सुना तो शिवाजी महाराज के होश उड़ गए, उन्होंने गुरुजी से क्षमा मांगते हुए कहा कि, ‘‘गुरुजी आज आपने मेरे अहंकार को खत्म कर दिया है, मैंने तो इस साम्राज्य का बहुत बड़ा नशा पाल रखा था और अपने आपको बहुत बड़ा समझता था और खुद को शासक मान बैठा था। आज के बाद से मैं राज-काज शासक की भावना से नहीं एक सेवक की भावना से चलाऊंगा। गुरुजी ऐसा सुनकर बहुत प्रसन्न हुए।

व्यक्ति को यदि कोई चीज गिराती है, स्थायी रूप से गिराती है तो वह है केवल अहंकार। अहंकार एक ऐसा नशा है जिसके सेवन से जिसके ग्रहण करने से व्यक्ति वहां तक गिर सकता है जहां से फिर से उठना बहुत मुश्किल हो जाता है। क्योंकि अहंकार तोड़ता है रिश्तों को, ठेस पहुंचाता है प्रेम को, आहत करता है अपनों को, खा जाता है आत्मियता को और भर देता है गले तक स्वार्थ को, नफरत को और प्रतिशोध को। जिन चीजों से अहंकार आता है, वे ऐसी चीजें है, जो क्षण भंगुर है, नाशवान है, जो यहीं रहने वाली हैं जो कभी साथ देने वाली नहीं है और न साथ जाने वाली है फिर इन चीजों का कैसा नशा? कैसा अहंकार और मानवपन पर यह दाग कैसा?

प्रेरणा बिन्दु:- 
किया अहंकार तो फिर
प्यार नहीं पाएगा
सार वाले जीवन को
निस्सार तू कर जाएगा।

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