कंपनियों के खिलाफ दिवालिया कानून के तहत कार्रवाई

Samachar Jagat | Friday, 31 Aug 2018 10:55:54 AM
Action against companies against bankruptcies

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रिजर्व बैंक के नए निर्देशों के मुताबिक 70 कंपनियों को अपना कर्ज चुकाने की व्यवस्था करने के लिए 180 दिनों की मोहलत दी गई थी, वह इस सप्ताह के शुरू में सोमवार 27 अगस्त को खत्म हो गई। कुछ कंपनियों ने इस दौरान अपने खरीदार भी खोजे, लेकिन जिन कंपनियों के यहां तक बात चल रही है, वे इस अवधि में ऐसा कुछ नहीं कर सकी, जिससे लगे कि वे कर्ज चुकाने की स्थिति में आ गई है।

 आखिरी उपाय के तौर पर कर्जदाता बैंकों ने और इंडस्ट्री ने रिजर्व बैंक से मोहलत बढ़ाने की गुजारिश की, लेकिन उसने इनकार कर दिया है। अब आलम यह है कि 2000 करोड़ रुपए या इससे अधिक कर्ज लिए बैठी इन कंपनियों की सूची राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण यानी नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) के पास भेजी जाएगी। जहां इनके खिलाफ दिवालिएपन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा। इन कंपनियों पर कुल 3 लाख 80 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बकाया है। इन कंपनियों में से करीब दर्जन भर कंपनियों के द्वारा बैंकों का कर्ज न चुकाने के मामले में 32 डूबत कर्ज (एनपीए) खातों में से 20 को दिवालियापन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए एनसीएलटी के पास भेजा जाएगा।

 बाकी के 12 खातों के बारे में कर्जदाता बैंक बाद में फैसला लेंगे कि कर्ज अदायगी की मोहलत बढ़ाई जाए या इन कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की जाए। एनसीएलटी को भेजे जाने वाले मामलों में ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियां एस्सार पावर, कोरबा वेस्ट पावर, जिंदल थर्मल, सार्वेंट एनर्जी शामिल है। धातु कारोबार से जुड़ी बीएमएम इस्पात, आईएसएमटी, बीआरजी आयरन एंड स्टील, स्पेलेंडिड मेटल प्रोडक्ट शामिल है। इस बारे में मिली जानकारी के अनुसार कर्जदाताओं ने प्रयागराज पावर जेनरेशन कंपनी को टाटा समूह को बेचने का फैसला किया है। रिसर्जेंट पावर वेंचर्स और एसकेएल पावर जेनरेशन (छत्तीसगढ़) लि. को सिंगापुर की कंपनी एग्रीटेंड रिसोर्सेज को बेचा जाएगा। जैसा कि पूर्व में कहा गया है 70 एनपीए खातों (फंसे कर्ज) की देनदारी निपटाने के लिए 12 फरवरी को भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से 180 दिन का समय दिया गया था। तय मियाद में कर्ज अदा न करने पर दिवालियापन कानून के तहत इन कंपनियों के खिलाफ एनसीएलटी यानी राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण में मामला दायर किया जाना था। यह मियाद 27 अगस्त को पूरी हो चुकी है।

 इन सब स्थितियों के मद्देनजर समझा जा सकता है कि हमारी बैंकिंग व्यवस्था के लिए यह कितना बड़ा संकट है। ये सभी देश की बड़ी कंपनियां है। इनमें कितने लोग काम करते हैं और एक बार इनके दिवालिएपन की प्रक्रिया में जाने के बाद इनका नियमित संचालन किस तरह प्रभावित होगा, इन कर्मचारियों की रोजी-रोटी का क्या होगा। इनसे जुड़े परिवारों का भविष्य क्या होगा? ऐसे तमाम जरूरी सवालों का जवाब देने की स्थिति में फिलहाल कोई नहीं है। यहां यह बता दें कि ये कंपनियां दो हजार करोड़ रुपए से ज्यादा कर्ज वाली है। एक हजार करोड़ रुपए या इससे ज्यादा कर्जवाली कंपनियों की बारी बाद में आनी है। इन कंपनियों में उत्पादन बाधित होने से बाजार पर और इनकी सहायक कंपनियों पर पड़ने वाले प्रभावों और इससे पूरी अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान को फिलहाल छोड़ दें तो भी यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि क्या यह प्रक्रिया बैंकों को उनका पैसा वापस लौटाने की गारंटी दे पाएंगे। 

अगर 5 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा कर्जवाली 12 कंपनियों के साथ जुड़े अनुभव पर गौर करें तो जवाब ना में ही मिलता है। इनमें से 11 कंपनियों एनसीएलटी की अलग-अलग अवस्थाओं में है और बैंकों को उनसे अपने पूरे कर्ज की आधी से कुछ ज्यादा रकम ही वापस मिलने की उम्मीद है। जून के अंत तक इन्सॉल्वेंसी एंड बैक्रप्सी कोड (आईबीसी) के तहत जो 32 मामले सुलझाए जा सके थे, उनमें भी रिकवरी कुल दावे की करीब 55 फीसदी ही रही। ऐसे में सवाल यह बनता है कि आईबीसी की यह प्रक्रिया क्या सचमुच हमारी बैंकिंग व्यवस्था की बीमारी दूर कर सकती है? अगर नहीं तो क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वसूली में सख्ती के नाम पर अर्थव्यवस्था को और ज्यादा झटके देने के बजाए हम अपना ध्यान बीमारी का कोई बेहतर इलाज खोजने पर केंद्रित करें।

 यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कर्जदाता बैंक एनपीए खातों यानी फंसे कर्ज के खातों का समाधान इसीलिए एनसीएलटी से बाहर करना चाहते हैं क्योंकि दिवालिया कानून के तहत समाधान के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में समाधान के लिए जाने पर उन्हें अंत में इस राशि के एक बड़े हिस्से के साथ समझौता करना पड़ सकता है। इसीलिए बैंक इन खातों के लिए समाधान योजना पेश करने की कोशिशें कर रहे हैं ताकि इन्हें एनसीएलटी में जाने से रोका जा सके क्योंकि एनसीएलटी में जाने के बाद इसके समाधान में नए खरीददारों के साथ समझौते में बकाया कर्ज का एक बड़ा हिस्सा छोड़ना पड़ सकता है। बैंकरों ने कहा है कि कुछ संकटग्रस्ट खातों के लिए कुछ बैंक समाधान योजनाओं को अंतिम रूप दे चुके हैं। एक सरकारी बैंक के कार्यकारी निदेशक ने नाम नहीं बताते हुए कहा कि कुछ बैंक कुछ मामलों में समाधान योजनाओं को मंजूरी दे चुके हैं और अन्य मामलों में योजना को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है।

 एक ओर जहां फंसे कर्ज का समाधान निकालने के लिए योजनाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है, वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए 70 विदेशी शाखाओं को बंद करने या तर्कसंगत बनाने की योजना है। सूत्रों के अनुसार अव्यवहारिक विदेशी परिचालनों को बंद किया जा रहा है जबकि कार्य कुशलता हासिल करने के लिए एक ही शहर या आसपास के स्थानों में कई शाखाओं को तर्कसंगत बनाने का काम चल रहा है। इसी क्रम मेें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की चालू वित्त वर्ष में 70 विदेशी शाखाओं को बंद करने या तर्कसंगत बनाने की योजना है। पिछले साल सरकारी बैंकों ने 35 विदेशी शाखाएं बंद की थी। आंकड़ों के मुताबिक सार्वजनिक बैंकों की विदेशों में 159 शाखाएं चल रही है, जिसमेें से 41 शाखाएं 2016-17 में घाटे में थी। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की 9 विदेशी शाखाएं घाटे में है, जबकि बैंक ऑफ इंडिया की 8 और बैंक ऑफ बड़ौदा की 7 शाखाएं घाटे में है।

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