सीबीएसई के कामकाज पर ‘कैग’ ने सवाल खड़े किए

Samachar Jagat | Saturday, 14 Apr 2018 09:30:50 AM
'CAG' questioned the functioning of CBSE

कैग’ यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने स्कूलों के संबद्धता संबंधी आवेदनों पर कार्रवाई करने की प्रक्रिया में विलंब के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की खिंचाई करते हुए कहा है कि इस वजह से बोर्ड की मंजूरी के बगैर स्कूल संचालित होते हैं, जिससे छात्रों की सेहत, साफ-सफाई और सुरक्षा के साथ समझौता होता है। कैग की इस रिपोर्ट से पता चला था कि बोर्ड ने पिछले वर्ष स्कूलों के संबद्धता संबंधी आवेदनों की प्रक्रिया में विलंब किया था। जिसके कारण स्कूलों ने मंजूरी के बगैर ही कक्षाएं लगानी शुरू कर दी थी। नियमों के मुताबिक हर साल 30 जून या उससे पहले बोर्ड को मिलने वाले सभी आवेदनों पर छह महीने के भीतर कार्रवाई होनी चाहिए।

 कैग की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि लेखा परीक्षा में पता चला है कि 203 मामलों में से 140 में बोर्ड ने स्कूलों को संबद्धता प्रदान की। हालांकि इन 140 में से केवल 19 यानी 14 फीसदी को ही छह महीने के भीतर संबद्धता मिली। बाकी 121 मामलों में बोर्ड ने स्कूलों को संबद्धता देने और इस बारे में सूचित करने में सात महीने से लेकर तीन वर्ष से अधिक का समय लिया। संसद में पिछले सप्ताह रखी गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 203 मामलों में से 58 में माध्यमिक स्कूलों ने उच्चतम माध्यमिक संबद्धता के लिए आवेदन किया था। लेकिन उन्हें यह सत्र प्रारंभ होने के बाद दी गई, जो कि सीबीएसई के नियमों का उल्लंघन है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक स्कूलों को बोर्ड की संबद्धता देने के मामले में सीबीएसई जिस तरह काम कर रहा है, वह चिंताजनक है। कैग ने इस बात पर खिन्नता जाहिर की कि लंबे समय तक स्कूलों के आवेदन बोर्ड के पास पड़े रहते हैं और उन पर फैसले नहीं किए जाते।

 कैग की इस तरह की टिप्पणियां बोर्ड के कामकाज के तरीके पर सवाल खड़े करती है। यह इसलिए भी चिंताजनक है कि सीबीएसई सरकारी निकाय है जिसे बेहतर शिक्षा के लिए काम करना है। कैग ने जो खुलासा किया है, वह चौंकाने वाला है। कई स्कूलों को तो बिना निरीक्षक समिति बनाए ही मान्यता दे दी गई। ऐसे में जो स्कूल बिना नियमों में खरा उतरे जोड़-तोड़ कर मान्यता हासिल करते हैं, वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे दे पाएंगे? ऐसे स्कूल छात्रों की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा का खयाल नहीं रखते और उनका एक मात्र मकसद पैसा कमाना होता है। ऐसे स्कूल बोर्ड के तय मानकों का पालन कैसे और क्यों करेंगे। यह सोचने वाली बात है।

 सीबीएसई मानव संसाधन मंत्रालय के तहत आने वाला संगठन है। यहां यह बता दें कि स्कूलों को मान्यता देने से लेकर बोर्ड की परीक्षाएं और प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करने जैसी अहम जिम्मेदारी बोर्ड की ही है। सीबीएसई से सम्बद्ध स्कूलों में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा तैयार पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। यानी जो भी स्कूल सीबीएसई से सम्बद्ध होगा, उसे बोर्ड के तय मानकों का पूरा पालन करना होगा। ऐसे में सबसे ज्यादा मार बच्चों के अभिभावकों पर पड़ती है। स्कूल मोटी फीस वसूल करते हैं। वर्दी, किताबें, अन्य स्टेशनरी आदि अपने यहां से खरीदने को बाध्य करते हैं, जो बाजार की तुलना में काफी महंगी बेची जाती है।

 यहां यह उल्लेखनीय है कि ज्यादातर स्कूलों के पास मानकों के अनुरूप न्यूनतम बुनियादी ढांचा भी नहीं होता। कैग ने अपनी जांच में कई स्कूलों में साफ-सफाई का घोर अभाव पाया। स्कूलों के नाम पर गली-गली में शिक्षा की दुकानें आसानी से देखी जा सकती है। हालांकि स्कूलों को मान्यता देने में देरी के पीछे बड़ी और व्यावहारिक वजह यह हो सकती है कि ज्यादातर स्कूल बोर्ड के पैमाने पर खरे नहीं उतर पाते। स्कूलों को मान्यता देने की प्रक्रिया लंबी होती है। लेकिन इस समस्या का समाधान तो बोर्ड को ही निकालना होगा।
 



 

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