‘हिन्दी दिवस’ की चुनौती

Samachar Jagat | Friday, 14 Sep 2018 04:17:41 PM
Challenge of 'Hindi Day'

भाषायी दासता से देश को यथाशीघ्र मुक्त कराना है!
‘‘एक संस्कृति अपहारक के रूप में अंग्रेजी को भी हमें उसी तरह निकाल फेंकना चाहिए जिस तरह हमने अंग्रेजों के शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका।’’

 महात्मा गांधी15 अगस्त 1947 को हम क्या सच्चे सही अर्थों में स्वाधीन हुए थे। सत्ता हस्तान्तरण मात्र ही तो बापू की कल्पना का स्वराज्य न था। दासताजन्य समस्त श्रृंखालाओं से वे देश तथा देशवासियों को पूरी तरह मुक्त देखना चाहते थे। असल में निकृष्टतम पराधीनता विदेशी भाषा की, सभ्यता की, सोच और जीवनशैली की होती है। ब्रिटिश शासनकाल में अंगे्रजी ने यही संस्कृति-अपहारक की घातक भूमिका अदा की थी और इस तरह से उसने लार्ड मैकाले के उस कुटिल स्वप्न को ही अप्रत्याशित सत्य में परिणित कर दिया था। सन् 1836 में अपने एक प्रतिवेदन में उसने लिखा था-‘‘कोई हिन्दू जिसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की है, कभी शुद्ध हृदय से अपने धर्म में अनुरक्त नहीं रह सकेगा।

 मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा पद्धति की योजना को कार्यान्वित किया गया तो अगले तीस वर्षों में बंगाल के भद्र समाज में कोई मूर्तिपूजक नहीं रह सकेगा और यह होगा बिना धर्म परिवर्तन के किसी प्रयत्न के, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में बिना किसी हस्तक्षेप के, केवल अंग्रेजी भाषा के ज्ञान तथा उसके प्रभाव की स्वाभाविक प्रक्रिया से हो।’’ अंग्रेजी शिक्षा प्रसूत रक्त, मांस से भारतीय किन्तु भाषा, भाव, विचार, वेषभूषा, से अंग्रेज जिस वर्ग की उसने डेढ़ सदी से भी पहले परिकल्पना की थी, यह देखकर परलोक में मैकाले की आत्मा को अवश्य शांति मिली होगी (साथ में हैरानी भी हुई होगी) कि अंग्रेजी शासन के देश से चले जाने की लगभग आधी सदी बीत जाने के बाद भी यहां उसके मानस पुत्रों का आतंक और दबदबा बरकरार बना हुआ है।

हम 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष ‘हिन्दी दिवस’ मनाते हैं। स्वतंत्रता से पूर्व जो भाषा कांग्रेस कार्य समिति के सर्वसम्मत प्रस्ताव से राष्ट्रभाषा के रूप में सम्पूर्ण देश को मान्य, सर्व स्वीकार्य थी, गांधीजी ने जिसके लिए निभ्र्रान्त शब्दों में घोषणा की थी- ‘‘हिन्दी का प्रश्न मेरे लिए स्वराज्य का प्रश्न है’’, राष्ट्रीय एकता की संवाहिका जिस हिन्दी भाषा को सीखने, बोलने, दैनन्दिन व्यवहार में लाने में हर प्रदेश और अंचल के वासियों को विशेष गौरव की अनुभूति होती थी, उसकी पुन: प्रतिष्ठा करने के लिए ये कैसी विषादमय विडम्बना है कि आज ‘हिन्दी दिवस’, ‘हिन्दी सप्ताह’ आयोजित किए जाते हैं। वहां उनमें संकल्प पारित किए जाते हैं, प्रतिबद्धता की शपथें खाई जाती हैं। कभी भारतवर्ष के अतिरिक्त सुना है किसी ने इंग्लैण्ड में ‘इंग्लिश डे’, फ्रांस में ‘फे्रंच डे’ अथवा जर्मनी में ‘जर्मन डे’ मनाते। किसी स्वतंत्र ेदेश का स्वाभिमानी नागरिक यह सोच भी नहीं सकता, न सहन कर सकता है कि उस देश में पराई भाषा का प्रभुत्व हो, निष्कंटक शासन हो। क्या आयरलैंड, इजरायल, चीन अथवा अन्य किसी नवस्वाधीन राष्ट्र ने स्वभाषा की अवहेलना और अवमानना कर अपने भूतपूर्व आकाओं की भाषा को राष्ट्रभाषा का गौरव प्रदान किया? फिर वह हमारी ही कौन-सी विवशता या हीनता ग्रंथि थी, जिसके वशीभूत हमने अपनी अस्मिता, अपनी मनीषा, उससे जुड़े समस्त जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक सरोकारों को दांव पर लगाकर अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति दुर्भावना और उपेक्षा का ऐसा अक्षम्य ऐतिहासिक अपराध किया। इस तथ्य से हम सभी सुविज्ञ हैं-रेखांकित करने की कतई आवश्यकता नहीं कि भाषा ही एकमात्र वह माध्यम है, सशक्त साधन है जो जन जन को जोड़ता है। भाषायी एकरूपता ही देश की एकता और अखण्डता को सुदृढ़ तथा स्थायी बना सकती है।

 अगर आरम्भ में ही शिक्षा, राजकाज, संचार माध्यम सब क्षेत्रों में लोक प्रतिष्ठित राष्ट्रभाषा का अबाध प्रयोग होने लगता, देश में वर्तमान में विकराल सिर उठाए अगाड़ी, पिछड़ी, दलित बनाम सवर्ण जैसे दुर्भाग्यपूर्ण मुद्दे कभी पनप नहीं सकते थे। पूरे राष्ट्र में एक ही वाणी गूंजती। समान राष्ट्रीय चिन्तनधारा में सम्पूर्ण देश की मनीषा एकलय हो जाती। तब विशिष्ट, सामान्य का भेद ही न रहता। हमारे इस विराट देश में साधारण जीवन व्यवहार में जहां लगभग चालीस-पचास करोड़ लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं (समझते तो प्राय: सभी हैं) यह सर्वथा अपेक्षित, सहत स्वाभाविक था कि यहां का वातावरण सर्वत्र हिन्दीमय होता। हिन्दी के सपूत अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी का अर्चन, वन्दन करते। पर हम इसे दैव दुर्विपाक कहें, देश के मेरूदण्डविहीन नेताओं की अक्षमता मानें अथवा स्वार्थ संकुल नौकरशाही की शातिराना चाल कि अंग्रेजी के मात्र दो प्रतिशत जानकार अंग्रेजी शासन की पराधीनता की इस दुर्भाग्यपूर्ण विरासत को जीवित रखे हुए हैं। यह अभिशिप्त देश इतनी महंगी कीमत चुका कर कब तक इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतता रहेगा।

 कोई इस धु्रव सत्य को नहीं नकार सकता कि किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति, परम्परा, विचार और विकास की प्रक्रिया से राष्ट्रभाषा का अटूट नाता होता है। भाषारूपी प्राणतन्तु काट दिए जाने पर व्यक्ति का देश, परिवेश, सामाजिक सरोकार सभी से संबंध टूट जाता है और कभी-कभी वह देश में ही अजूबा बन जाता है। हम क्या भारत में आज यही परिदृश्य नहीं देख रहे? स्पृहणीय आर्य संस्कृति के वंशधर, विश्व विश्रुत भारतीय मेधा और मनीषा के अभिरक्षकों को अपनी भारतीय पहचान बताने में गर्व गुमान होने के बजाए संकोच और हीनता का अनुभव क्यों होता है। डब्ल्यू.वी. ईट्स की टिप्पणी इस संदर्भ में कितनी सटीक है-‘‘भारत में अंग्रजी माध्यम की शिक्षा प्रणाली चलाकर ब्रिटेन ने भारत का सबसे बड़ा अहित किया। उसने भव्य लोगों की आत्माओं में हीनता का भाव भडक़ा कर कोरा नकलची बना दिया।

किन्तु इस अवसादजनक स्थिति का एक चिन्त्य पहलू और भी है-संविधान में हिन्दी को अंगीकार करने के लिए प्रदेशों को जो 15 वर्ष की छूट दी गई थी, तुष्टिकरण की नीति अपनाते हुए उसे निरवधि बढ़ा दिया गया। राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार न करने वाले किसी एक प्रदेश को भी ‘वीटो’ का निद्र्वन्द्व अधिकार मिल गया। जनतंत्र में यह प्रचण्ड बहुमत की कैसी अवहेलना, कैसा उपहास और अल्मत को खुला संरक्षण। आज की दूषित और निपट अवसरवादी वोट की राजनीति में आकण्ठमग्न तथा प्रदेश सरकारों की प्राथमिकता और चिन्ता सम्पूर्ण देश का सर्वांगीण नैतिक, सांस्कृतिक उत्थान हो भी कैसे सकता है? न आज की पंगु सरकारों में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के संदर्भ में सही समय पर सही निर्णय ले सकने की दृढ़ इच्छाशक्ति विद्यमान है। 

उन्हें तो सब तरह के झूठे, अपवित्र समझौतों और गठबंधनों के सहारे येन-केन प्रकारेण हर हालत में सत्तासीन रहना है- साध्य-साधन की शुचिता तो अब सिरफिरों की सोच मात्र रह गया है। गंभीर सार्वजनिक मुद्दों पर हमारे जनप्रतिनिधियों की उदासीनता भी विशेष क्षोभजनक है। संसद अथवा विधानसभाओं में आरंभ के कुछ समर्पित हिन्दी हितैषी नेताओं को छोडक़र आज तक राष्ट्रभाषा के समर्थकों की न कोई प्रभावशाली लॉबी है, न इस राष्ट्रीय समस्या के समुचित समाधान के लिए देशव्यापी किसी आंदोलन की प्रस्तावना। हिन्दी हित को आघात पहुंचाने वाला, सत्ता की ही राजनीति से जुड़ा एक कुचक्र इन दिनों कई प्रदेशों में और चल रहा है-घोषित हिन्दी भाषी प्रदेशों में स्थानीय बोली भाषाओं को राजभाषा के रूप में खड़ा करने का प्रयास। उसी अभियान के अंतर्गत वहां की जनता से जनगणना में हिन्दीतर बोली, भाषा को मातृभाषा के रूप में अंकित करने का भी आग्रह किया जाता है। भाषा के ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर वहां की जनता और जनप्रतिनिधियों की भावना को भी उभारा जाता है बिना उस सबके गंभीर परिणामों की चिन्ता किए।

विचारने की बात है-स्थानीय बोली-भाषाओं द्वारा हिन्दी भाषी प्रदेशों से अगर हिन्दी को अपदस्थ कर दिया जाता है- यथा राजस्थान में राजस्थानी, हरियाणा में हरियाणवी, हिमाचल प्रदेश में हिमाचली, बिहार में भोजपुरी, मैथिली, उत्तर प्रदेश में ब्रज, अवधी आदि मान्य हो जाती हैं तो हिन्दी कहां बचेगी। वह किस प्रदेश की भाषा कहलाएगी? अपने विशाल संख्या बल के आधार पर ही तो वह आम विश्व में तीसरी सबसे बड़ी भाषा की प्रतिष्ठा अर्जित कर रही है। पर क्षुद्र संकीर्ण स्वार्थों में लिप्त, विकृत वृत्ति के बौने नेताओं को राष्ट्र, राष्ट्रभाषा, राष्ट्रीय अस्मिता सब से क्या लेना-देना? जाति सम्प्रदाय की रक्तरंजित राजनीति का खतरनाक खेल खेलकर अपनी कुटिल कार्यवाहियों से देश का यथाशक्ति दोहन कर अपना उल्लू सीधा करना ही उनके जीवन का एकमेव लक्ष्य गन्तव्य है। स्वाधीनता, सर्वोत्थान और सर्वोदय को सर्वतोभावेन समर्पित हमारे महान जननायकों ने स्वातन्त्र्योत्तर भारत के कभी बड़ी भव्य मनोरम सपने देखे थे। 

भौतिकता के अतिरेक से सन्तप्त संसार को आध्यात्मिक मंत्र प्रदाता के गरिमाशाली शिखर पर भारत को पुन: अधिष्ठित करने की उनकी साध, समस्त अभावों, तकलीफों को मिटाकर हरेक गरीब देशवासी के आंसू पोंछने की उनकी पूत कामना, सामाजिक भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत सौहार्द, समता, सहअस्तित्व मूलक समाज की स्थापना का उदात्त आदर्श-विपथगामी उत्तराधिकारियों के सौजन्य से उनके सब सपने अधूरे रहे गए। राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा का सवाल भी अभागे उन्हीं अधूरे सपनों में है, जो अपने सम्मानपूर्ण समाधान के लिए उद्वेलित मुद्रा में खड़ा भारत, भारतीय और भारतीयता के विरल विदग्ध सपूत टण्डनजी और सेठ गोविन्ददास जी जैसे कृति व्रती, मनस्वी जन के अवतरण की बाट जोह रहा है। क्या राष्ट्रभाषा की समस्या राष्ट्र की अस्मिता और अस्तित्व से किसी कदर अविच्छिन्न है? प्रसाद और उदासीनता में यो ही आधी सदी चली गई। कोटि-कोटि हिन्दीभाषियों को अब मां भारती को उसका यथोचित स्थान दिलाने के लिए अगले ‘हिन्दी दिवस’ तक निहित स्वार्थों और प्रपंचों के कूटजाल से मुक्त कराने का अडिग, अविचल संकल्प ले लेना चाहिए, राष्ट्रभाषा हिन्दी के निष्ठावान सेवकों, आराधकों को तुमुलस्वर में उद्घोषणा कर समस्त राष्ट्र को चारों दिशाओं से हिल्लोलित कर देना चाहिए-

‘‘करते हैं तन मन से वन्दन,
जन गण की अभिलाषा का।
अभिनन्दन अपनी संस्कृति का,
आराधन अपनी भाषा का।’’
(ये लेखक के निजी विचार है) 



 

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