ऑनलाइन किराना बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

Samachar Jagat | Thursday, 17 May 2018 10:11:03 AM
Competition in online grocery market

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वालमार्ट ने भारत की नंबर वन ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट से हाथ मिलाने के बाद स्पष्ट किया है कि भारत का ऑनलाइन किराना बाजार उनकी प्राथमिकता है। इससे तेजी से बढ़ रहे ई-किराना बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज होगी। वालमार्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह फ्लिपकार्ट की भारत में ऑनलाइन बादशाहत को हथियार बनाते हुए भारत में खुदरा बाजार में धाक जमाने की कोशिश करेगी। वालमार्ट ने कहा है कि दोनों कंपनियां जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपना ब्रांड कायम रखने के साथ बाजार में आगे बढ़ेगी।

 फ्लिपकार्ट की ई-कॉमर्स में अमेजन को पीछे छोड़ने वाली रणनीति में हस्तक्षेप नहीं होगा। बल्कि खुदरा बाजार की बादशाह वालमार्ट कम दामों में उपभोक्ताओं को जोड़ने की अपनी रणनीति फ्लिपकार्ट के जरिए पूरी करेगी। दरअसल ऑनलाइन शॉपिंग पर ध्यान नहीं देने से अमेरिका और चीन में वह अमेजन से पिछड़ चुकी है। वालमार्ट ने दावा किया कि उसके 95 फीसदी उत्पाद आपूर्तिकर्ता भारत से ही होंगे। इसमें हजारों रोजगार के साथ किसानों व अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचेगा।

 वालमार्ट और फ्लिपकार्ट दोनों कंपनियों को आयकर विभाग ने आगाह किया है कि निवेशकों को हजारों करोड़ रुपए टैक्स भरना पड़ सकता है। माकपा ने फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण पर कहा है कि यह वालमार्ट को पिछले दरवाजे से एंट्री है। इससे खुदरा क्षेत्र में न सिर्फ विदेशी निवेश का रास्ता खुलेगा, बल्कि छोटे कारोबारी प्रभावित होंगे। माकपा पोलित ब्यूरो ने पिछले सप्ताह गुरुवार को एक बयान में कहा कि वालमार्ट बिक्री के लिए विभिन्न उत्पादों की खरीद अंतरराष्ट्रीय बाजार से करती है। 

अब यह उत्पाद भारत मेंं बेचे जाएंगे। इससे खुदरा क्षेत्र के छोटे और मझोले कारोबारियों पर बुरा असर पड़ेगा।। पार्टी ने फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण को देश हित के खिलाफ बताते हुए कहा कि सरकार को इस समझौते को इजाजत नहीं देना चाहिए। इसके विपरीत नीति आयोग ने कहा है कि इससे व्यापारियों के हितों को नुकसान नहीं होगा। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने स्पष्ट किया कि इस डील से देश में कोई संकट नहीं आएगा और व्यापारियों के हितों को कोई नुकसान नहीं होगा। 

उन्होंने कहा कि वालमार्ट ने भारत में हमारी शर्तों पर निवेश किया है। यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि डील से छोटे और मझोले व्यापारियों के हितों को नुकसान होगा और रोजगार घटेंगे। यह अच्छी बात है कि देश में बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है। वहीं स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक अश्विनी महाजन ने कहा है कि डील में नियमों को ताक में रखा गया है। केंद्र को इसकी समीक्षा करनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि फ्लिपकार्ट और वालमार्ट के हाथ मिलाने से केंद्र को 15 से 20 हजार करोड़ रुपए का कर मिल सकता है। इससे 20 से 40 फीसदी टैक्स अनिवासी भारतीयों पर लग सकता है। 20 से 30 फीसदी कर भारतीय निवेशकों पर लग सकता है। 

इसके अलावा प्रतिस्पर्धा तेज होने से ग्राहकों को सस्ता सामान मिलेगा। साथ ही ई-कॉमर्स कंपनियों के विस्तार की होड़ से रोजगार बढ़ेगे। रिलायंस फ्रेश जैसे रिटेल स्टोर भी नए प्रोत्साहन को मजबूर होंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि वालमार्ट ने फ्लिपकार्ट की सतहतर फीसदी हिस्सेदारी 16 अरब डालर में खरीदी है। यानी फ्लिपकार्ट की कुल कीमत 20.8 अरब डालर लगाई गई है। जबकि बस एक साल पहले फ्लिपकार्ट की कुल कीमत केवल साढ़े दस अरब डालर आंकी गई थी। फिर सवाल उठता है कि वालमार्ट कंपनी इतनी ज्यादा कीमत चुकाने को क्यों तैयार हो गई। इससे भारत में ई-कॉमर्स की संभावनाओं का दोहन करने की रणनीति जाहिर है।

 हालांकि अभी भारत में खुदरा ई-कॉमर्स कुल खुदरा कारोबार का 5 फीसदी ही है। पर इंटरनेट और स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों की तादाद तेजी से बढ़ी है और इसमें तेजी से वृद्धि जारी है। साथ ही ऑनलाइन खरीदारी में लगातार इजाफा हो रहा है। 

वालमार्ट को लगा होगा कि भारत के खुदरा कारोबार में सीधे प्रवेश की इजाजत पता नहीं कब मिलेगी, तब तक वाया अधिग्रहण क्यों न ई-कॉमर्स को ही हथियाया जाए। इससे भारत में घरेलू ब्रांड बनने की उसकी महत्वाकांक्षा जाहिर है। उसकी बढ़ती महत्वाकांक्षा का इससे भी पता चलता है कि वालमार्ट ने फ्लिपकार्ट की 70 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के बाद उसकी 85 फीसदी हिस्सेदारी करने की बात कही है। लेकिन वालमार्ट द्वारा फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण का एसोचैम जैसे कॉरपोरेट संघ ने स्वागत किया है, वहीं कई संगठनों ने विरोध भी जताया है। जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है स्वदेशी जागरण मंच ने इसका विरोध किया है और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि यह सौदा छोटे और मझोले कारोबारियों व दुकानदारों को खत्म करेगा और रोजगार सृजन के अवसर भी कम करेगा।

 इस सौदे को देश-हित के विरुद्ध करार देते हुए मंच ने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है। इसी तरह ‘कैट’ यानी कॉन फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने भी फ्लिपकार्ट-वालमार्ट सौदे को देश के ई-कॉमर्स क्षेत्र के लिए घातक बताया है। यहां यह बता दें कि फ्लिपकार्ट की शुरुआत ऑनलाइन किताबें बेचने वाले एक स्टार्टअप के रूप में हुई थी, लेकिन अगले 11 सालों में यह साल दर साल सफलता का पर्याय और नई पीढ़ी की सफल भारतीय कंपनियों की अगुवा बन गई। लेकिन तमाम कामयाबी के बावजूद उसने वालमार्ट के आगे आत्म समर्पण कर दिया है। ई-कॉमर्स की बाबत भारत में फिलहाल नियमन की कोई व्यवस्था नहीं है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि फ्लिपकार्ट पर वालमार्ट का कब्जा ऐसे वक्त हो रहा है, जब स्टार्ट अप और मेक इन इंडिया पर जोर दिया जा रहा है।

यहां यह बता दें कि कुछ साल पहले अपने देश में बहुत सारे लोग वालमार्ट का नाम पहली बार सुना था, जब खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने की पहल हुई थी। तब बड़े पैमाने पर आशंका जताई गई थी कि अगर यह पहल आगे बढ़ी तो भारत के खुदरा कारोबार पर वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों का कब्जा हो जाएगा और इससे करोड़ों छोटे दुकानदारों की आजीविका पर बुरा असर पड़ेगा। इस विरोध में भाजपा भी बड़े मुखर रूप से शामिल की और विरोध के फलस्वरूप आखिरकार मनमोहन सिंह सरकार को बहुब्रांड खुदरा व्यवसाय में एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) को मंजूरी देने का प्रस्ताव वापस लेना पड़ा था। लेकिन जिस वालमार्ट को सपं्रग सरकार के समय तीखे तेवर के कारण रूक जाना पड़ा था, अब उसने राजग सरकार के समक्ष भारत में प्रवेश के लिए अपने कदम बढ़ा दिए है। यों बहु-ब्रांड खुदरा कारोबार अब भी एफडीआई के लिए नहीं खुला है पर वालमार्ट ने ऑनलाइन रास्ता चुना है वह भी अधिग्रहण के जरिए। उसने फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली है।
 

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