कार्यकर्ताओं से परहेज और अभिनेताओं का अभिनंदन

Samachar Jagat | Friday, 26 Apr 2019 04:31:45 PM
Congratulations to the actors, Abstinence for activists

देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों भाजपा हो या कांग्रेस में कार्यकर्ताओं की लगातार अनदेखी की जा रही है। वर्षों से नेताओं की हाजरी भरने वाले और सभाओं एवं समारोहों में दरिया बिछाने और समेटने का काम करने के बावजूद उन्हें पार्टी का उम्मीदवार बनाए जाने के बजाए फिल्मी सितारों, खिलाडि़यों को तवज्जोह दी जा रही है।

मशहूर फिल्म अभिनेता सनी देओल ने मंगलवार को भाजपा की सदस्यता ली और उसके तत्काल बाद उन्हें पंजाब में गुरुदासपुर से लोकसभा के लिए उम्मीदवार बना दिया गया। भाजपा ने दिल्ली की एकमात्र सुरक्षित सीट उत्तर पश्चिम दिल्ली से मौजूदा सांसद उदित राज का टिकट काटकर सांसद गायक हंसराज हंस को पार्टी उम्मीदवार घोषित कर दिया। यहां यह बता दें कि सनी देओल की सौतेली मां हेमा मालिनी को भाजपा ने पहले ही मथुरा से अपना उम्मीदवार बना दिया और वहां मतदान भी हो चुका है। भाजपा हालांकि वंशवाद का विरोध करती रही है, किंतु उसे अपने यहां वंशवाद से कोई गुरेज नहीं है। भाजपा नेताओं के कई रिश्तेदार चुनाव मैदान में है। 

भाजपा ने फिल्म अभिनेता सनी देओल को जहां गुरुदासपुर से टिकट दिया, वहीं पूर्वी दिल्ली सीट से क्रिकेटर गौतम गंभीर को चुनावी मैदान में उतारा है। सपा छोडक़र भाजपा में शामिल हुई फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा को सदस्यता देने के साथ ही भाजपा ने उत्तर प्रदेश से अपना उम्मीदवार बना दिया। फिल्म अभिनेता शत्रुध्न सिन्हा ने भाजपा छोड़ कांग्रेस की सदस्यता ली और उन्हें कांग्रेस ने बिहार से अपना उम्मीदवार बना दिया। फिल्म जगत की मशहूर नायिका उर्मिला मातोंडकर कांग्रेस में शामिल हुई और उन्हें मुंबई में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। वैसे कांग्रेस में राज बब्बर पहले से ही शामिल है। इस प्रकार भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने जिन्होंने फिल्मी दुनिया से अपनी पहचान बनाई है या फिर खेल मैदान से उन्हें अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाया है। 

लेकिन ये सभी और इनके जैसे अन्य मशहूर सितारे अब न सिर्फ राजनीतिक तौर पर भी जाने जाएंगे, बल्कि इनमें से जो जीत हासिल करते हैं, तो लोकसभा में भी पहुंचेंगे। यानी जिस लोकसभा चुनाव में महज टिकट हासिल करने के लिए किसी स्थानीय या राष्ट्रीय नेता की जमीनी गतिविधियों के जरिए जनता के बीच अपने प्रति समर्थन पैदा करने से लेकर अपनी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व तक को संतुष्ट करना पड़ता है, उसके लिए किसी फिल्मी कलाकार का सिर्फ सिनेमा के पर्दे पर मशहूर होना काफी मान लिया जाता है। सवाल है कि इनके पीछे राजनीतिक दलों की कौन सी मजबूरी काम करती है जिस वजह से उन्हें जनता को आकर्षित करने के लिए फिल्मी या खेल की दुनिया के सितारों का सहारा लेना पड़ता है। यहां यह बता दें कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने इस लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी से कुल 41 फीसदी महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है। उनमें से कई फिल्मी तारिकाएं हैं। 

हालांकि भारत चूंकि एक लोकतांत्रिक मुल्क है, इसलिए किसी की भी राजनीतिक गतिविधियों या चुनावों में हिस्सा लेने का अधिकार है। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह है कि फिल्मी दुनिया के सितारे अचानक जिस इलाके की जनता की नुमाइंदगी करने के लिए चुनावी मैदान में उतर जाते हैं क्या उससे उनका संवाद होता है और क्या वे स्थानीय जरूरतों और समस्याओं को लेकर पर्याप्त संवेदनशील होते हैं? चुनाव प्रचार के दौरान जनता की ओर से विभिन्न फिल्मों के डॉयलॉग सुनाने की फरमाइश की जाती है तो अभिनेता भी बिना किसी हिचक के डॉयलॉग सुनाने लगते हैं। चुनावी सभाओं में गजब का नजारा देखने को मिलता है। राजनीतिक दलों को भी इसमें मजा आता है, क्योंकि उन्हें कोई जवाबदेही नहीं निभानी पड़ती और जनता को बेवफूक बनाकर वोट इस प्रकार हासिल कर लेती है, जैसे किसी महफिल में नोटों की बरसा की जाती है। राजनीतिक दल चाहें तो इन अभिनेताओं के जरिए इन चुनावी सभाओं में चुनावी चंदा भी बटोर सकती है। 

यह अभिनेता चुनाव के बाद कहीं नजर नहीं आते और जनता ठगी सी महसूस करती है। वैसे जनता की समस्याओं की अनदेखी का आरोप राजनीतिक दलों से जुड़े कुछ नेताओं पर भी लगाए जा सकते हैं। लेकिन सच यह भी है कि चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर नेताओं की अपने इलाके की जनता के बीच पैठ होती है और वे अपने इलाके की संरचना और उसकी जरूरतों की समझ रखते हैं। हालांकि चुनावों में फिल्मी हस्तियों को उतारना कोई नया चलन नहीं है और 1980 के दशक से ही उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखना शुरू कर दिया था और अब उसकी एक लंबी श्रृंखला है। दरअसल राजनीतिक दलों को यह इसलिए सुविधा का मामला लगा कि सिनेमा के पर्दे से लोकप्रिय सितारों के जीतने की संभावना ज्यादा थी और जनता के एक बड़े हिस्से को इनके ग्लैमर की ओर खींचा जा सकता था।

इससे एक सवाल यह भी उभरता है कि आखिर हमारी पार्टियों ने आम लोगों के बीच राजनीतिक सशक्तिकरण के मसले पर किस तरह काम किया है कि वे किसी नेता के सरोकार, ईमानदारी, जमीनी पकड़ आदि का आकलन करने के बजाए फिल्मों या खेल की दुनिया के सितारों की चकाचौंध से आकर्षित होकर वोट देते हैं? एक अहम पहलू यह भी है कि ग्लैमर के बूते जीत हासिल करने के बाद सदन में उपस्थिति के लिए वक्त नहीं निकालने से लेकर जनता के जरूरी मुद्दों को उठाने और बहस करने के मामले में इन सितारों का रिकार्ड संतोषजनक नहीं रहा है।

 ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जनता की नुमाइंदगी के लिए फिल्मी सितारों के आकर्षण की जरूरत है या फिर जमीनी हकीकतों, लोकतांत्रिक परंपराओं, संविधान आदि की समझ रखने वाले और जनता की जरूरतों के मुताबिक कारगर नतीजे देने वाले किसी ईमानदार नेता की? यह कैसी विचित्र स्थिति है कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, जिसके 11 करोड़ सदस्य होने का दावा किया जा रहा है। जिसके पास स्वयंसेवकों की बड़ी फौज है, उस भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा के लिए 545 उम्मीदवार खोजने में दिक्कत आ रही है, वहीं कांग्रेस जो कि देश की सबसे पुरानी पार्टी है, उसे भी लोकसभा के लिए मात्र 543 उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर फिल्म अभिनेताओं, नायिकाओं और खिलाडि़यों को सदस्यता ग्रहण करने साथ ही टिकट का तोहफा दिया जा रहा है।



 

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