कोर्ट ने खारिज की ईवीएम पर पुनर्विचार याचिका

Samachar Jagat | Friday, 10 May 2019 03:52:04 PM
Court rejects retrial of EVM

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सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम-वीवीपैट मुद्दे पर 21 राजनीतिक दलों द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। लगातार ईवीएम राग अलाप रहे विपक्षी दलों को एक तरह से यह झटका ही है। इस पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि अदालत अपने पुराने फैसले को बदलना नहीं चाहती। आखिर एक ही मामले को कितनी बार सुना जाए। इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश का यह भी कहना था कि कोर्ट इस मामले में दखल नहीं देना चाहती। दरअसल 8 अप्रैल को दिए अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने 21 दलों की मांग पर एक विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र पर वीवीपैट के जरिए मतदान करने को पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए एक विधानसभा क्षेत्र के पांच मतदान केंद्रों पर ईवीएम दर्ज वोटों का मिलान वीवीपैट से कराने की व्यवस्था का आदेश दिया था। अदालत ने स्वीकारा था कि 50 फीसदी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट के साथ मतदान करा पाना संभव नहीं है। 

इस बारे में चुनाव आयोग भी कह चुका था कि इसके अनुपालन में कई तरह की अड़चने है। व्यावहारिक दिक्कतों को कोर्ट ने महसूस किया था कि चुनाव प्रक्रिया में पहले ही कई तरह की बाधाएं हैं और नई व्यवस्था के क्रियान्वयन में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को लगाने की जरूरत होगी। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांगे गए जवाब के लिए तर्क दिया था कि मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त है और यदि 50 फीसदी वीवीपैट को पर्चियों के मिलान की मांग को पूर किया जाता है तो हर विधानसभा क्षेत्र में मतदान के बाद 50 फीसदी वीवीपैट पर्चियों के मिलान की वजह से परिणाम आने में 5 से 6 दिन का विलंब हो सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव प्रक्रिया विश्वसनीय और पारदर्शी होनी चाहिए। मगर महज विरोध के लिए बनी बनाई चुनाव प्रक्रिया के प्रति मतदाताओं के मन में अविश्वास पैदा करना अनुचित ही कहा जाएगा। इससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को भी आंच आती है। ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक दलों को ध्यान रखना चाहिए कि ईवीएम तकनीक के जरिए मतदान कराने से जहां समय की बड़ी बचत हुई है, वहीं मतपत्र लूटने के हिंसक दौर का अंत हुआ। जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोग हर आम चुनाव में मार दिए जाते थे। ऐसे ही बैलेट के जरिए मतदान की मांग औचित्यहीन ही नजर आती है।

यह कुछ ऐसा ही है जैसे कि किसी अत्याधुनिक वाहन में कोई खामी के चलते हम बैलगाड़ी से सफर करने की वकालत करने लगे। फिर आधे-अधूरे तथ्यों व अफवाहों के चलते ईवीएम की विश्वसनीयता को संदेह के कटघरे में खड़ा करना भी तार्किक नजर नहीं आता। बहुत संभव है कि ईवीएम को सही ढंग से न चला पाने और मौसमी दबाव के चलते कोई तकनीकी त्रुटि सामने आ जाए। लेकिन इसको लेकर पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। साथ ही इसे ईवीएम मशीन में छेड़छाड़ करार नहीं दिया जा सकता। वैसे भी जब चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को ईवीएम हैक करने की चुनौती दी थी तो कोई व्यक्ति ऐसा करने में सफल नहीं हो पाया था। पिछले दिनों लंदन से भी एक हैकर ने ईवीएम मशीन हैक करने का दावा किया था।

बाद में पता चला कि वह व्यक्ति अमेरिका में राजनीतिक शरण पाने के मकसद से खुद को पीडि़त बताने का प्रपंच रच रहा था। शीर्ष अदालत भी 50 फीसदी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट के जरिए मतदान कराने की व्यावहारिक दिक्कतों का उल्लेख कर चुकी है। ऐसे में अपनी सुविधा के लिए ईवीएम चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में खड़ा करना समझ से परे ही है। यदि भविष्य में लोकतंत्र की विश्वसनीयता के क्रियान्वयन के लिए जरूरत हो भी तो चुनाव आयोग को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। मगर अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार महज विरोध के लिए विरोध नहीं किया जाना चाहिए।

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