सपनों और आदतों में बनाएं संतुलन

Samachar Jagat | Wednesday, 16 Nov 2016 02:58:22 PM
 सपनों और आदतों में बनाएं संतुलन

सपनों और आदतों के बीच संतुलन का अभाव काफी महीन किस्म का होता है। जलन, अवसाद, बीमारी या बेचैनी जैसे लक्षण इन्हें व्यक्त नहीं करते, बल्कि इनका अनुभव तब होता है, जब किसी अनचाहे साथी की तरह यह एहसास हमेशा आपके साथ होता है और रह-रह कर आपको कान में फुसफुसाता रहता है कि आप किसी चीज की अनदेखी कर रहे हैं। 

कई बार कुछ ऐसे अनजाने काम या अनुभव होते हैं, जिन्हें आप मानते हैं कि वे आपके अस्तित्व का हिस्सा हैं। ये अस्पष्ट महसूस होते हैं, लेकिन इनको लेकर आपके मन में हमेशा छटपटाहट बनी रहती है। आप महसूस करते हैं कि यह जीवन का उच्चतम लक्ष्य है, लेकिन आपके जीवन का तरीका और जीने का कारण दोनों में असंतुलन बना रहता है।

ऐसी तराजू के बारे में सोचिये, जहां एक पलड़ा ऊपर है और एक नीचे, जिसमें एक तरफ मोटा बच्चा बैठा है और दूसरी तरफ कमजोर बच्चा। यहां इस तराजू को असंतुलित करने वाला मोटा बच्चा आपकी रोज की दिनचर्या है, यानी जो आप काम करते हैं, जहां आप रहते हैं, जिनसे आप मिलते हैं, जो आप पढ़ते हैं, जो सिनेमा आप देखते हैं और जो बातें आप करते हैं। ऐसा नहीं है कि ये सब जो काम आप करते हैं वे बुरे की श्रेणी में आते हैं।

 असंतुलन बना रहता है, क्योंकि वे आपके जीवन के लिए स्वास्थ्यकर नहीं हैं। संक्षेप में कहा जाए तो वे काम बिल्कुल वैसे नहीं हैं, जैसे आप खुद को करते हुए देखना चाहते हैं।

असंतोष का यह बोझ सदा आपके कंधे पर लदा रहता है। जब नींद आती है तो ये असंतोष हमें हमारे अधूरेपन की याद दिलाता है, लेकिन जब हमारी आंख खुलती है तो फिर हम उसी भागदौड़ में शामिल हो जाते हैं, जो हमारी सुविधाजनक दिनचर्या है। एक समय ऐसा आता है, जब आप अपने इस अभाव के भाव का इलाज करने के लिए खुद पर सख्ती करना शुरू कर देते हैं। 

गुस्सा और मूड बिगडऩा आपके स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। ठंड लगना, सिरदर्द और नींद न आना जैसे रोग आए दिन घेरे रहते हैं और बढ़ते असंतुलन से जीवन का उत्साह खत्म होने लगता है। इसका असर परिवार के प्रति आपके व्यवहार में झलकने लगता है। बिना बात भडक़ना, दूसरों के दोष निकालना आम बात हो जाती है। ध्यान देकर सोचेंगे तो पता चलेगा कि असंतुलन आपके उस सपने के पूरा न हो पाने से निकला है, जो आपने देखा था, जो धीरे-धीरे आपके हाथ से फिसलता जा रहा है। 

जो चाहते हैं वही सोचें
बेहतर और उदात्त जीवन जीने की इच्छा आपकी आध्यात्मिक ऊ$र्जा का एक पहलू है। इस क्षेत्र में संतुलन बनाने के लिए आपको अपनी सोच की ऊ$र्जा को नियंत्रित करना होगा। आपकी मानसिक ऊ$र्जा उसी चीज को आकॢषत करती है, जो आप सोचते हैं। 

नकारात्मक सोच का मतलब है आप नकारात्मक घटनाओं को जीवन में न्योता दे रहे हैं। याद रखें, इस असंतुलन के लिए जहां आप जिम्मेदार हैं तो इससे निकलने के लिए आप ही काबिल हो सकते हैं। जब आप ऐसा करते हैं तो आप पाते हैं कि वास्तविक संसार की सीमाएं हैं, लेकिन आपकी कल्पनाओं का संसार सीमातीत है। इन्हीं सीमातीत कल्पनाओं से निकलता है वास्तविकता का बीज, जिसे आपको संतुलित वातावरण में रोपना है।

संतुलन की ओर लौटना 
इस सिद्धांत के मूल में है, सपनों और आदतों में संतुलन बैठाना। इसकी सहज शुरुआत करने के लिए अपनी आदतों को पहचानना होगा और अपने सपनों के साथ उनका तालमेल बनाने के बारे में सोच को परिवॢतत करना होगा। तो फिर खुद पहचानिये आपके सपने क्या हैं? ऐसा क्या है आपके अंदर, जो कभी दूर गया ही नहीं? क्या है, जो रात भर आपके अंदर टिमटिमाता रहता है, आपकी सोच और सपनों के अंदर? दूसरों को ये चाहे वाहियात लगें, लेकिन यदि आप अपनी 

आदतों और सपनों में संतुलन हासिल करना चाहते हैं तो आपको अपनी ऊ$र्जा को अपने सपनों को साकार करने की दिशा में मोडऩा होगा।
यदि आप संतुलन में नहीं हैं तो इसकी मुख्य वजह यह है कि आपने अपनी ऊ$र्जा से अपनी आदतों को इस बात की इजाजत दे रखी है कि वे आपके जीवन की दिशा को निधारित करें। इन आदतों और उनके परिणामों के लिए आपकी ऊ$र्जा ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। 

संतुलन फिर से हासिल करने की दिशा में शुरुआती कदम के रूप में इस जागरूकता की ओर अपना ध्यान केंद्रित करें कि आपको वही मिलता है, जो आप सोचते हैं। उसी सोच के लिए समॢपत रहें, जो आप चाहते हैं, चाहे वह कितना भी असंभव या मुश्किल क्यों न हो। अपने व्यक्तिगत सपनों को एक खास महत्व, एक खास स्थान दें, ताकि तराजू पर तौलते समय वे आपकी कल्पनाओं में आपको दिखाई देते रहें और आप अपनी ऊ$र्जा को उनके पाने के प्रति लगाए रखें।
सोच मानसिक धनराशि है

सोच मानसिक ऊ$र्जा है। यह उस मुद्रा या धनराशि की तरह है, जिससे आप अपनी इच्छाओं को हासिल करते हैं। आपको सीखना होगा कि आप इस धनराशि को ऐसी सोच पर खर्च न करें, जो आप नहीं चाहते। जब आप इस तरीके से सोचना शुरू करेंगे तो प्रकृति आपके पक्ष में काम करना शुरू कर देगी और आप वही हासिल करेंगे, जो आप चाहते हैं। सोच का यह बदलाव आपको संतुलन की ओर ले जाएगा।

तीन नियम
*अपनी तारीफ करना सही नहीं समझा जाता। लोग घमंडी, मूर्ख व स्वार्थी भी कहते हैं। लेकिन यह तभी तक होता है, जब आप केवल खुद की बात करते हैं। अपनी विकास यात्रा में जब आप ज्यादा से ज्यादा लोगों को फायदा पहुंचाते हैं तो सब आपके मुरीद हो जाते हैं। कहा जाता है कि अगर आप खुद की कम कीमत लगाते हैं, तो तय मानिए कि यह दुनिया भी आपकी कीमत नहीं बढ़ाएगी।

*बहुत से लोगों के बीच होने पर भी कई बार अकेलापन महसूस होता है। सगे-संबंधी और मित्र पास होने के बावजूद भीतर की रिक्तता को नहीं भर पाते। अलग-थलग होने का एहसास हमें डराने लगता है। महान दार्शनिक लाओत्से कहते हैं, ‘साधारण लोग एकांत से डरते हैं, पर ज्ञानी इसे बखूबी जानते हैं। वे अपने अकेलेपन को गले लगाते हैं और खुद को संपूर्ण बह्मांड के साथ एक महसूस करते हैं।’

*जब चीजें सोचे हुए के अनुसार नहीं होतीं तो हम झुंझलाने लगते हैं। पर शुरुआत में कोई भी योजना पर$फेक्ट नहीं होती। हम नहीं जानते कि अगले कदम पर कौन सी चुनौती सामने आएगी। इन बाधाओं से घबराना आगे बढऩे के अवसरों को रोक देता है। लेखिका लोरी डेशेन कहती हैं, ‘नई यात्रा पर बढ़ाया गया हर कदम एक क्लास रूम है। याद रखें, लोग अच्छी शिक्षा पाने के लिए अधिक कीमत देते हैं।’ 

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