जलवायु परिवर्तन से किसान व किसानी पर संकट

Samachar Jagat | Tuesday, 31 Jul 2018 09:08:03 AM
Crisis on Farmers and Farmers by Climate Change

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एक खास अध्ययन के हवाले से सरकार ने स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कुछ फसलों पर पड़ सकता है। साथ ही वनों की संरचना और कृषि उत्पादन सहित प्राथमिक उत्पादकता में बदलाव के रूप में देखने को मिल सकता है।

 केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. हर्षवधन ने जलवायु परिवर्तन के साल 2030 तक पड़ने वाले प्रभावों पर सरकार की ओर से कराए गए अध्ययन का हवाला देते हुए राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन और भारत आकलन 2030 के लिए क्षेत्रीय और आंचलिक विश्लेषण, शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कृषि, जल, प्राकृतिक पर्यावरण व जैव विविधता पर जलवायु परिवर्तन का अगले एक दशक तक मिश्रित प्रभाव पड़ने की बात कही गई है। 

पर्यावरण मंत्री ने बताया कि इसके मद्देनजर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने भी क्रॉय सिमुलेशन मॉडल पर उपयोग कर फसलों की पैदावार पर जलवायु परितर्वन के प्रभाव का विश्लेषण किया है। इसमें सिंचित मक्का, गेहूं और वर्षा जल से पोषित धान की फसलों की पैदावार में कमी का अनुमान व्यक्त किया गया है। इतना ही नहीं इन क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश, हिमालयी क्षेत्रों में जल उत्पादन में इजाफा और तीन अन्य क्षेत्रों में इसकी मात्रा में बदलाव का अनुमान जताया गया है। 

स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बारे में रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने बताया कि नए क्षेत्रों में मलेरिया फैलने की आशंका के कारण इसके संक्रमण में वृद्धि हो सकती है। दुनिया इस वक्त जलवायु संकट के जिस दौर से गुजर रही है, वह आने वाले वक्त के बड़े खतरे का संकेत है। यह खतरा पूरी धरती के लिए है। जीवन, वनस्पति, खेती, जंगल, पहाड़, समुद्र सब इसकी चपेट में है। लेकिन यह संकट कोई एक दिन या कुछ सालों में नहीं उपजा है। यह प्राकृतिक चक्र का अभिन्न हिस्सा है। धरती की उत्पत्ति से लेकर आज तक परिवर्तन का यह चक्र अनवरत चल रहा है। लेकिन यह मामला तब ज्यादा गंभीर हुआ, जब धरती पर विकास की गाड़ी दौड़ने लगी और इसकी अंधी दौड़ में प्रकृति के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। अब देश जलवायु संकट से जूझ रहे हैं। 

इससे बचने के हर संभावित रास्ते तलाश रहे हैं। दुनिया के बड़े और विकसित देश होने का दावा करने वाले विकासशील देशों पर हवा-पानी खराब करने की तोहमत मढ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया की तमाम बड़ी एजेंसियां, संस्थान, विश्वविद्यालय, पर्यावरणविद सब इस समस्या से जूझ रहे हैं कि जलवायु संकट से कैसे निपटा जाए। वरना खेती और जल संसाधनों पर जिस तरह असर पड़ रहा है, उससे लोगों के भूखों मरने की नौबत आने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। जैसा कि पूर्व में बताया है कि केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने राज्यसभा में इस खतरे के बारे में संकेत दिया है और सरकार ने माना है कि जलवायु में जिस तरह के बदलाव हो रहे हैं, उसका सीधा असर खेती पर पड़ सकता है। जंगल और जैव विविधता भी इससे अछूते नहीं रह पाएंगे। 

जो कुछ भी हो, हमारी पहली चिंता खाने को लेकर है। अगर खेती का चक्र बिगड़ गया और पैदावार प्रभावित होने लगी तो खाद्य संकट खड़ा हो सकता है। हमारे देश में खेती की हालत खराब होने का न केवल फसलों पर असर पड़ेगा, बल्कि मानव जीवन पर भी भारी प्रभावी पड़ने की आशंका है। सरकारी आंकड़ों के बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 58.2 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। हालांकि यह स्थिति कृषि के महत्व को ही प्रतिपादित करती है। कृषि क्षेत्र पर इतनी बड़ी जनसंख्या की निर्भरता के बावजूद यह क्षेत्र इतना उपेक्षित है कि किसानों के पास कृषि से पर्याप्त आय अर्जित करने जैसी स्थितियां ही नहीं है। 

यह आय इतनी कम है कि रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना तो दूर, किसान जिन्हें अन्नदाता कहा जाता है, उनके सामने दो वक्त की रोटी तक जुटाना मुश्किल है। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीति लागू किए जाने के बाद पिछले ढ़ाई दशक किसान और किसानी के लिए घोर संकट के रहे हैं। किसान और किसानी पर छाए इस संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ ही वर्षांे में देश में तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सरकारी उपेक्षा और किसान व किसानी विरोधी सरकारी नीतियां किसानों की बदहाली के मुख्य कारण है। सरकार न तो कृषि क्षेत्र को इस स्तर का बना पाई कि कृषि पर लागत को कम किया जा सके और न ही कृषि उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था की तरफ ही सरकारी तंत्र का ध्यान गया।

 इसका नतीजा यह निकला कि जहां कृषि पर लागत बढ़ने से कृषि क्षेत्र घाटे का सौदा हो गया, वहीं कृषि उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था न होने से बिक्री का सारा लाभ बिचौलियों के हवाले कर दिया। अगर किसान व किसानी को बचाने के लिए अभी भी गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो देश में खाद्य संकट जैसी स्थिति आ सकती है। जलवायु परिवर्तन से कृषि पर संभावित खतरे का अध्ययन सरकार ने कराया है। इसलिए इसकी महता और बढ़ जाती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी फसलों पर जलवायु के प्रभाव का जो विश्लेषण किया है, उसमें सामने आया है कि मक्का, गेहूं और धान की पैदावार में कमी आ सकती है। 

यह वैज्ञानिक विधियों से किया गया तथ्यों पर आधारित अध्ययन है, इसलिए इसकी चेतावनी को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि भविष्य के इस तरह के संकटों से निपटने के लिए हम कितने तैयार है। अगर आज यह संकेत मिल रहे हैं कि अगले दशक में हमारी खेती पर संकट आने वाला है। खास तौर से गेहूं और धान जैसी फसलों की पैदावार कम होने लगेगी, तो जाहिर है कि एक गंभीर खाद्य संकट दस्तक दे रहा है। इसलिए ऐसी दूरगामी हितों वाली नीतियां और कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए जो कृषि क्षेत्र की इन समस्याओं से निपट सके। फसलों की ऐसी किस्में विकसित की जाए, जिन पर जलवायु संकट का प्रभाव न्यूनतम हो और पैदावार भी ज्यादा मिल सके।
 

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