भारत की संस्कृति देती है सनातन संदेश

Samachar Jagat | Tuesday, 07 Nov 2017 02:48:39 PM
Culture of India gives Sanatan message

भारतीय संस्कृति ने समस्त मानव जाति को न केवल एक दिशा दी है बल्कि उसकी दशा को भी बदला है। क्योंकि भारतीय संस्कृति में सर्वकल्याण, सुख शान्ति, प्रेम और कर्म निष्ठा का अजर अमर भाव है। गीता के अध्याय 18 में शलेक 41 से 44 तक स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विनम्रता किये गये कर्म की व्याख्या है। इस सम्बन्ध में एककथानक है- प्राचीन काल में एक साधु पीपल के पेड के नीचे बैठे तपस्या कर रहे थे। काफी समय हो गई थी तपस्या करते करते और उसे भूख सताने लगी थी। तभी अचानक वृक्ष पर बैठे एक पक्षी ने उस पर बीट कर दी, साधु ने तुरन्त ऊपर देखा कि पक्षी तपस्या की प्राप्त ऊर्जा अग्रि से भष्म हो गया। ऐसा देखकर साधु को अपने तपोबल पर बडा अहंकार हो गया।

 वह भूखा साधु भिा हेतु एक घर में पर पहुंचा और भिक्षा देहिं कहा। भीतर से आवाज आई थोडा ठहरिये मैं अपने ईश्वर पति की सेवा अर्थात भोजन खिला रही हूॅ। थोडे समय बाद भी जब वह स्त्री भिक्षा देने नहीं आई तो साधु ने कहा कि तुम कैसी नारी हो तुम अपने पति को तो भोजन करवा रही हो और साधु भूखा द्वार पर खडा है। इस परनारी ने कहा कि हे साधु देवता क्रोधित होने की जरूरत नहीं है, मैं अपना कर्म कर रही हूॅ और यह ध्यान से सुन लो कि आपके क्रोध का मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पडेगा, क्योंकि मैं यह पक्षी नहीं हूॅ जो भष्म हो जाउंगी। ऐसा सुनकर साधु हक्का भक्का रह गया। तभी प्रतिव्रता बाहर आई और भिक्षा देकर बोली कि आपको उससे अधिक जानना है तो तुला नामक वणिक से इसका रहस्य जान लें। मन में हजारों प्रश्रों के साथ साधु तुला नाम के वणिक की दुकान पर पहुंचा।

जब साधु तुला की दुकान पर पहुंचा तो वह वणिक अपने ग्राहकों को उचित रेट पर ईमानदारी से चीजें देरहा था। उसकी दुकान पर भीड लगी हुई थी। साधु ने वणिक से कहा भिक्षां द्रेहिं इस पर वणिक ने कहा महाराज थोडा रूकें, क्योंकि मैं अपने कर्म में लीन हूॅ और आपको उस पतिव्रता स्त्री ने यहां भेजा है। और आगे कहा कि हमारा स्वाभाविक कर्म गौ सेवा, कृषि तथा व्यापार को ईमानदारी से श्रीप्रभु का आदेश मानकर संपन्न करना ही धर्म मानते हैं। इसी से हमें आपसे अधिक तपशक्ति दूरदृष्टि और आत्म ज्ञान प्राप्त हैं।

और आगे कहा कि जो मनुष्य गुणों से स्वभावजन्म कर्मी को ईमानदाीर से धर्म मानता हुआ परम संतोष का अनुभव करता हुआ बिना हेय और वृणास्पद विचारों के सम्पन्न करता है वहीं सबसे बडा साधक भक्त तपस्वी और दूरदर्शी होता है यही श्रीमद भगवद गीता का वेदों का दिव्य संदेश है। और भारतीय संस्कृति का दिव्य अनुदान है संपूर्ण मानव जाति को। इस प्रकार वणिक की बातों से उस साधु के अन्तर्चक्षु खुन गये और चल पडा कर्मयोगी बनने।

प्रेरणा बिन्दु:- 
भारतीय संस्कृति सनातन है पुरातन है नवीन है, क्लीन है ग्रिन है और यों कहें कि वह सारग्रीन है और यह हमारा गौरव है।



 

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