मौतों की जवाबदेही

Samachar Jagat | Wednesday, 13 Feb 2019 04:44:13 PM
Death Accountability

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में जहरीली शराब से सौ से अधिक लोगों का बेमौत मरना सत्ताधीशों की आपराधिक लापरवाही का ही नतीजा है। इससे पुलिस प्रशासन की विफलता भी उजागर होती है। उत्तर प्रदेश के कुशी नगर में कुछ समय पहले जहरीली शराब से दस लोगों की मौत हुई थी, मगर शासन-प्रशासन ने घटना से सबक लेकर प्रदेश में जहरीली शराब पर अंकुश लगाने की ईमानदार कोशिश नहीं की गई। पिछले दो सालों में 5 बड़ी घटनाओं के बावजूद यदि शासन के स्तर पर कोई बड़ी पहल और निचले स्तर पर पुलिस व आबकारी विभाग की जवाबदेही तय नहीं हुई तो योगी सरकार की नाकामी ही नहीं जाएगी। कुछ पुलिसकर्मियों व आबकारी निरीक्षकों पर कार्रवाई करने से राज्य सरकार के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो सकती। सहारनपुर और इससे सटे उत्तराखंड के इलाके में यदि जहरीली शराब से इतनी बड़ी संख्या में मौतें हुई तो नहीं माना जा सकता कि पुलिस प्रशासन को अवैध शराब बनने और बिकने की भनक न हो।

 कच्ची शराब की भट्टियों की गंध काफी बड़े इलाके में महसूस की जा सकती है, तो फिर आबकारी विभाग पुलिस को भनक क्यों नहीं लगी? अवैध शराब की बिक्री से सरकारी राजस्व की भी हानि होती है। विडंबना यही है कि इन हादसों का शिकार गरीब तबका ही होता है। तभी देश व राज्य में मरने वाले लोगों के प्रति शासन-प्रशासन उतना गंभीर नजर नहीं आता, जितना कि अपेक्षित होता है। दरअसल एक पूरा माफिया तंत्र कच्ची शराब के निर्माण और वितरण में लगा होता है। इन मौतों के पीछे भी आशंका जताई जा रही है कि कहीं शराब माफिया की प्रतिस्पर्धा ही तो हादसे का कारण नहीं थी? विडंबना यह कि कई परिवारों में सभी कमाने वाले जहरीली शराब के शिकार हो गए हैं और अब उनका जीवन बेहद मुश्किल होगा। कई घरों में पिता-पुत्र और भाइयों की अर्थियां एक साथ उठी।


घटना का नकारात्मक पहल यह है कि विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को मुद्दे को लेकर घेरा जा रहा है। राज्य सरकार ने अवैध शराब से मौतें व स्थायी अपंगता होने पर शराब बनाने व बेचने वालों को दंडित करने के लिए आबकारी अधिनियम में कड़े प्रावधान के तहत 60 क को जोड़ा था। इसमें हादसे के बाद शराब बेचने वाले को मृत्युदंड और स्थायी अपंगता पर उम्रकैद की सजा व आर्थिक जुर्माने का प्रावधान है। सवाल यह है कि आबकारी अधिनियम 1910 में नई धारा 60 क जोड़े जाने के बावजूद अवैध शराब की बिक्री क्यों जारी है? कहीं न कहीं इस पर रोक लगाने के लिए आबकारी विभाग और पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। ऐसी घटनाओं में खाकी और खादी की संदिग्ध भूमिका के चलते ही मौत के सौदागर निर्भय होकर अपना कारोबार चला रहे हैं, जिसके चलते ही सैकड़ों परिवार बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं। बड़ी संख्या में महिलाएं असमय विधवा और बच्चे अनाथ हो गए हैं। कमाऊ मुखिया की मौत के चलते कई परिवार जीवन पर्यन्त गरीबी की दल-दल में फंस गए हैं। 

रामराज की दुहाई देने वाली योगी सरकार में क्या नीतिश कुमार की तरह शराबबंदी लागू करने का नैतिक साहस है? अब तक देखने में आया है कि जब भी इस तरह की घटनाएं होती है तो फौरी और रस्मी तौर पर कुछ अधिकारी-कर्मचारी निलंबित किए जाते हैं और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देकर पिंड छुड़ा लिया जाता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई किसी पर नहीं होती, जिससे कोई सबक ले सके। वहीं अब भी हुआ है। ऐसे बड़े हादसों के बाद भी सरकार की आंखें नहीं खुलती। पिछली घटनाओं से सबक नहीं लिया जाता। अगर सरकार ढान ले तो जहरीली शराब बेचने वालों का सफाया करना कोई कठिन काम नहीं है। एजेंसी



 

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