खुद के कदमों से मंजिल तय करें

Samachar Jagat | Monday, 06 Nov 2017 04:07:24 PM
Decide the floor with your own steps

एक बड़े पेड़ की मजबूत टहनी पर एक घोंसला था। दिन भर की उड़ान थकान से शाम को पक्षी अपने घोंसले में लौट आते। देखते ही देखते कुछ दिनों के बाद अण्डे में से शिशु का जन्म हुआ। शिशु आराम से अकेला पड़ा रहता था। उसे अकेला छोडकर उसके माता पिता चुग्गो पानी की तलाश में उड़ जाते। जब वे लौटकर आते तो उनका शिशु बेसब्री से इंतजार कर रहा होता और मां बाप की व्यग्र और प्रेम से भरे होते। धीरे धीरे शिशु बड़ा होने लगा, वह घोंसले में ही अपने छोटे छोटे कदमों से चलने लगा टहलने लगा। वह घौंसले को सबसे सुरक्षित समझता था आराम दायक और उपयुक्त समझता था।

 उसे घोंसला बेहद अच्छा लगता था। वह अपनी दुनिया में मस्त था खुश था और बेपरवाह था। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि यह घौंसला हमेशा उसके लिए नहीं बना था चौबीसों घण्टों के लिए नहीं बना था। वह तो कुछ समय के लिए था। थोडा विश्राम करने के लिए था थकान मिटाने के लिए था थोडा सुस्ताने के लिए था। वह घोंसले के भीतर को प्रकाश समझने लगा और घोंसले की जिंदगी को वास्तविक जिंदगी समझने लगा।

लेकिन उसके माता पिता ऐसा नहीं चाहते थे। वे समय से पहले ही उसको पंखों की कीमत समझाना चाहते थे उसको वास्तविक पथ पर ले जाना चाहते थे खुल आकाश में उडाना चाहते। उडने के आनन्द को बताना चाहते थे। स्वतंत्र जिंदगी कितनी कारगर और महान होती है यह उसे बताया चाहते थे लेकिन उस शिशु को यह मालूम ही नहीं था कि उसके पंख भी है क्या। माता पिता अपनी चौंच से पैरों से और पंखों से उसे समझा रहे थे और कह रहे थे कि मेरे बच्चे तू उड़ उड़ना तेरी फिरकी है उड़ना तेरी सार्थकता है और उड़ना ही तेरा लक्ष्य हैं।

 वे धीरे धीरे उसे खिसकाने लगे बाहर की ओर लेकिन शिशु ने कड़ा विरोध किया उसका वह अपने माता पिता पर चोट से प्रहार करने लगा। चींची यूं चूं तेज आवाज में करने गा। वह डर रहा था खुले आसमान में उड़ने से उसको गिर जाने का भय था उसे मर जाने का भय था। लेकिन उसके माता पिता उसे पंगु नहीं बनाना चाहते थे घुट घुटकर मारना नहीं चाहते थे। और उन्हें यह अच्छे से मालूम था कि बाहर तो यह मुक्त आकाश में आनन्द के साथ उड़ेगा, लेकिन घोंसले के अंदर यह घुट घुट कर मर जायेगा। 

अब वह समय आ गया कि माता पिता ने उसो जबरदस्ती धक्का दे दिया बाहर मुक्त आकाश में। वह एकदम लड़खड़ाया गिरते गिरते संभला और पंखों को फडफ़ड़ा कर वापस घोंसले में लौट आया। उसने माता पिता उलाटना दिया। लेकिन अगले ही क्षण उसने अपने पंखों को फडफ़ड़ाने लगा और अपने पंखों को जाना और उन पर भरोसा किया। अगली सुबह वह शिशु अपने माता पिता के पीछे आनन्द के साथ उड़ रहा था अपनी मंजिल की ओर।

प्रेरणा बिन्दु:- 
मंजिल कभी कदमों के पास नहीं आती है, बेकाक वह बहुत नजदीक हाो, कदमों को ही चलना पड़ता है, बेबाक चलने में कितनी ही तकलीफ और जोखिम क्यों न हो।



 

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