दक्षिणी राज्यों में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या में गिरावट

Samachar Jagat | Thursday, 07 Feb 2019 03:39:09 PM
Decrease in the number of women in southern states than men

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महापंजीयक कार्यालय की ओर से जारी 2016 की नागरिक पंजीकरण प्रणाली के मुताबिक पिछले कुछ सालों के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। देश में स्त्री-पुरुषों के अनुपात को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। अब तक इस मसले पर अमूमन हरियाणा जैसे उत्तर भारत के राज्यों को कठघरे में खड़ा पाया जाता रहा है। पर एक नए आंकड़े के अनुसार अब दक्षिण भारत के इन राज्यों में उभरी तस्वीर चिंताजनक है।


वैसे अब तक दक्षिण भारत के राज्यों में स्त्री-पुरुष अनुपात का आंकड़ा काफी अच्छी स्थिति में रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने देश में बढ़ रही इस असामनता पर गहरी चिंता जताई है। इस पर आधारित खबर का संज्ञान लेते हुए आयोग ने केंद्रीय महिला और बाल कल्याण विभाग के सचिव और सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आयोग का यह सवाल सही है कि अगर दक्षिण के विकसित राज्यों में भी स्त्रियों की तादाद में तेजी से कमी आ रही है तो फिर महिलाओं के कल्याण के लिए जारी योजनाओं पर अमल की क्या स्थिति है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हाल के वर्षों में केंद्र और राज्यों की सरकारों ने बालिकाओं के संरक्षण के लिए सामाजिक चेतना विकसित करने के लिए कई प्रयास किए हैं और इसके लिए अनेक योजनाएं लागू की गई है। ‘‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’’ जैसे अभियान का मुख्य उद्देश्य यही है। 

लेकिन इसके बावजूद अगर पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या में संतोषजनक संतुलन नहीं बन पा रहा है, तो इसकी जवाबदेही किसकी है? इस गहराती समस्या पर बात करते हुए उत्तर भारत के राज्यों को दक्षिण भारत के राज्यों को दक्षिण भारत के राज्यों से सीख लेने की बात कही जाती रही है, जहां स्त्री पुरुषों के अनुपात न केवल संतोषजनक रहे हैं, बल्कि कई हिस्सों में तो पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या कुछ ज्यादा भी दर्ज की गई थी। अब हालात यह है कि आंध्र प्रदेश में 2016 में प्रति एक हजार लडक़ों के मुकाबले महज 806 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया। यह आंकड़ा सबसे निम्न स्तर पर मौजूद राजस्थान के बराबर है। तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी तस्वीर बहुत बेहतर नहीं है।

प्रश्न यह पैदा होता है कि पिछले कुछ सालों के दौरान आखिर क्या और किस तरह का बदलाव आया है, जिसमें अकेले केरल को छोडक़र दक्षिण भारत के राज्यों में भी लड़कियों को जन्म देने और उनके संरक्षण के प्रति समाज का रुख इस कदर नकारात्मक हो गया? इस मसले पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि पिछले कुछ सालों के दौरान दक्षिण के राज्यों में भी जिस तरह गर्भावस्था में लिंग जांच कराने की प्रवृति है, वह चिंताजनक है। इसके लिए मुख्य रूप से इस तरह की जांच को आसान बनानो वाली आधुनिक मशीनों की उपलब्धता जिम्मेदार है। लेकिन आखिर क्या वजह है कि जो समाज बेटियों के जीवन और अस्तित्व को लेकर जागरूक रहा है, वह मशीनों की आसान उपलब्धता के बाद सोच के स्तर पर इतना प्रतिगामी हो रहा है।

क्या सरकार और प्रशासन का तंत्र इस कदर कमजोर है कि वह गर्भावस्था में लिंग जांच करने वाले क्लिनिकों व अस्पतालों पर लगाम लगाने में सक्षम नहीं है? जाहिर है, समाज में लैंगिक समानता की चेतना का विकास करने के साथ-साथ गर्म में भू्रण की जांच करने वालों के खिलाफ अगर तुरंत सख्ती नहीं की गई तो आने वाले समय में शायद तस्वीर और ज्यादा चिंताजनक हो जाए।

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