विमुद्रीकरण प्रभावित अर्थव्यवस्था की भावी तस्वीर

Samachar Jagat | Thursday, 01 Dec 2016 05:27:46 PM
 विमुद्रीकरण प्रभावित अर्थव्यवस्था की भावी तस्वीर

‘विमुद्रीकरण’ हो गया, तर्क-वितर्क, समर्थन-विरोध, आशंकाएं-अपेक्षाएं, संसद में गतिरोध, दावे-प्रतिदावे सब हो गये। अब महत्वपूर्ण मुद्दा यह ही है कि भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। सरकारी पक्ष का तो स्वाभाविक दावा यह है कि इसका लाभ ‘दीर्घकाल’ में बहुत सकारात्मक होगा।

 जबकि पूर्व प्रधानमंत्री एवं विश्व में मान्यता प्राप्त अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने इसे संगठित लूट और सुनियोजित कानूनी दुरूपयोग बताते हुये दो प्रतिशत कमी आने की आशंका जीडीपी के लिये बता दी है। इसके लिये उन्होंने छोटे उद्योगों, खुदरा व्यापारियों, अधिकांश निर्यातकों, किसानों, कृषि उत्पादन, रोजगार के अवसरों, सहकारी क्षेत्र आदि पर बहुत अधिक विपरीत पडऩे को अवश्यम्भावी बताया है। ऐसा होता और लम्बे समय तक होते रहना लग भी रहा है। 

क्योंकि पूरे अर्थजगत में तरलता की भयंकर कमी है, इससे मांग बहुत अधिक गिर गई है, उत्पादक ईकाइयों, बड़े व छोटे होटलों, ठेलेवालों, पर्यटन स्थलों, शोरूम, माल्स, शराब की दुकानों, टैक्सी स्टेण्ड्स, रेस्टोरेंट्स, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों चाट पकोड़ी व फल सब्जी की दुकानों, ड्राई फ्रूट्स वालों, सिनेमाघरों, चोखी ढाणियों और गांवों, ब्यूटिपार्लर्स, ब्रांडेड रेडिमेड कपड़ों, नामी व सामान्य मिठाई व नमकीन की दुकानों, किटी पार्टी आयोजन स्थलों, जुआघरों, नाइट क्लबों, वेश्यालयों, डांस पार्लर्स, ब्यूटीक्रेस, ज्यूस सेंटर्स, मांस की दुकानों, विवाह स्थलों, बैंड बाजे वालों, कोचिंग सेन्टर्स, एक्यूजमेंट केन्द्रों, फिजाहट्स आदि पर तो पूरा सन्नाटा सा छाया हुआ है।

यहां का व्यापार 75 प्रतिशत तक गिर गया है।
फसल की बुवाई संकटदायक स्तर तक प्रभावित हुई है, आडतिये जो करीब 90 प्रतिशत लेन देन नकद में करते आये हैं, सोसी बताने के डर से आतंकित हैं, किसान को खाद्यान्न का न पूरा मूल्य मिल रहा है न बिक्री का पैसा, मंदिर में पुजारे चढ़ावे को तरस रहे हैं तथा पुराने नोटों के चढ़ावे के कारण ‘भगवान’ के दरबार में भी ‘मैनेजर्स’ ने हाथ जोडऩे के स्थान पर खड़े करना प्रारंभ कर दिया है, जो आमजन के मंदिर है वहां तो नियमित पूजा पाठ तक करवाना कठिन होता जा रहा है, छप्पन भोग के स्थान पर कुछ भोग की झांकियां बस ‘इज्जत’ बचाने के लिये की जा रही है, प्रसाद की मात्रा कम होती जा रही है, रही थी तो छोडिय़े सामान्य शोक याने बीड़ी, सिगरेट, पान, गुटका आदि के शौक भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं, बरातों में नोट लुटाना बंद हो गया है, ‘मेरे यार की शादी है’ गाने के भंगड़े पर भी जेब से नोट नहीं निकल रहे हैं, जन्मदिवस शादी की सालगिरह जो साल में दो-दो कई मनाते थे एक बार मनाने में पसीनों से भीग रहे हैं कीमती उपहार बेचने वाले तो हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, ‘गोठ घुघरी’ तो बंद ही हो गई है, गाड़ी में बैठे ही ऑर्डर देने वाले मौल भाव करने लगे हैं, सोशियल विजिट्स ‘सामान्य’ हो गई है। ऐसा अगर है तो बाजार में सन्नाटा छाया ही जाना है तो 

अर्थव्यवस्था आगे कैसे बढ़ेगी?
जीडीपी का मतलब है उत्पादन के अर्थशास्त्रीय भाषा में पांचों तत्वों-भूमि, श्रम, पूंजी, साहस और प्रबंध का उत्पादन और इसे मुद्रा के माध्यम से मापा जाता है तो उसे ही सकल राष्ट्रीय आय कहा जाता है। वर्तमान के हालात और भविष्य के आशंकाएं तो सिद्ध करती है कि जीडीपी में पचास से चालीस प्रतिशत गिरावट आना तो हर दृष्टि से तार्किक लगता है। भूमि व रीयल एस्टेट की कीमतों में तीस प्रतिशत की गिरावट तो तुरंत बाजार में देखी जा रही है और जब लोगों के पास डाउन पैमेंट ही करने का नहीं है तो वास्तविक सौदा कैसे हो सकता है? 

दूसरी गंभीर समरूा यह है कि बाजार में कीमतें कम और डीएलसी दरें बहुत ज्यादा है याने इससे रजिस्ट्री शुल्क तो अधिक लगेगा ही। साथ ही क्रेेता को वाइट की ज्यादा रकम का इंतजाम करना पड़ेगा और विक्रेता को उसे ‘पचाने’ की तकलीफ बिना कारण ही उठानी पड़ेगी। क्योंकि विक्रेता को तो लोंग टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स बिना किसी अतिरिक्त लाभ के ही देना होगा और उसके लिये हर वर्ष बिना आय के ही अधिक आयकर देना होगा। साथ ही बैंकों से अब वांच्छित ऋण मिलना भी संभव नहीं है। 

क्योंकि बैंकों को अपने स्तर पर सम्पत्ति का बाजार मूल्य जानकर ही देय ऋण राशि का निर्धारण करना होता है। स्पष्ट है वे डीएलसी दरों से नियंत्रित नहीं होते हैं। ऐसे में कोई सौदा हो ही नहीं सकता है। यह ही स्थिति जमीनों की है। अधिक आवासीय प्लाट्सय गृह निर्माण सहकारी समितियों से अति अल्प कीमत दिखा कर लिये हुये हैं। अब उनको डीएलसी दरों पर क्रय-विक्रय किया जा सकता है। जहां लॉग टर्म केपिटल गेंन सैकड़ों गुणा हो जाता है। ऐसे में यह क्षेत्र दीर्घकाल में भी ब्लॉक हुआ लगती है।

श्रमिक की हालत तो सबसे खराब है। खेतों में मंडियों में, घरों में, फैक्ट्रीज में, दुकानों में सब जगह श्रमिक काम छोड़ कर जा रहे हैं या उन्हें निकाला जा रहा है। हालात तो यह हो गये हैं कि सडक़ किनारे के ढाबे तक बंद हो रहे हैं। वर्तमान में तो अधिकांश मजदूर बैंकों के चक्कर में फंसे हुये हैं। दैनिक मजदूरी वालों के तो वास्तव में फाके ही पड़े हुये हैं। कुछ समय पहले मजदूर ‘दुर्लभ’ हो रहे थे अब सस्ते हो जाने पर भी उन्हें कोई भाव व दाम नहीं दे रहे हैं। तो समझा जा सकता है कि उत्पादन एवं सेवाओं की हालत कितनी पतली हो गई है। 

वाणिज्य के हर क्षेत्र में अनायास आई मंदी से सब कुछ उलटा हो गया है। भावी आशंकाओं को देखते हुये छोटी-बड़ी सभी उत्पादक ईकाइयां यथासंभव मजदूर एवं कर्मचारी कम करने की योजनाएं बनाने लगे हैं।

पूंजी की हालत तो अविश्वसनीय तरीके से खस्ताहाल हो गई है। लोग जब अपने शुद्ध धन को बैंकों से निकाल ही नहीं पा रहे हैं, बैंकें तो सामान्य काम कर ही नहीं पा रही है, लोगों का विश्वास बैंकों से उठ सा गया है, ऋण एवं ब्याज वापसी होना ही बंद हो गई है तो निकट भविष्य में बैंकों का एनपीए पच्चीस लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, सरकार की आय आधी रह सकती है, बैंकों में अभी जमा धन जमाकर्ता मौका मिलते ही वापस निकाल ही लेना है, ब्याज जमाओं पर कम होने के कारण स्थाई आय वर्ग वाले करीब पांच करोड़ वृद्धों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा होता जा रहा है, बैंकें अब रियलाईजेशन सख्ती से भी नहीं कर सकती है। 

जिस देश में करीब चौरासी प्रतिशत लेन देन नकद में होता हो, दो तिहाई जनता गरीब हो, एक तिहाई निपट निरक्षर हो, दस प्रतिशत लोगों ने ऑनलाइन क्रय करते हों, मुश्किल से 2.4 लाख पूरे देश में एटीएम हो, उनमें से अधिकांश जब तब ‘असमर्थ’ हो जाते हों, नये खुलवाये करीब चौदह करोड़ खाते प्रारंभ से ही निष्क्रिय पड़े हों, बैंक कर्मचारी काम के दबाव में नौकरी छोड़ रहे हों, विलासिता पर खर्चा अल्प हो गया हो, जरूरत जितनी मुद्रा के आधे साल में भी आने की संभावना न हो, आरबीआई एक तरह से अप्रासंगिक हो गई हो, साख नियंत्रण और मौद्रिक नीति के प्राय: सारे निर्णय सरकार कर या करवा रही हो, विमुद्रीकरण के विभिन्न फैसलों को पौने दो सौ बार तक बदलना पड़ा हो, हमारी बचत संस्कृति पर ग्रहण लग गया हो, रुपये की विनिमय दर के सत्तर रुपये प्रति डालर तक चले जाने की पुख्ता शंका हो, और सबसे महत्वपूर्ण सरकार के नीतिकार अनिर्णय की स्थिति में पहुंच गये हों तो संभावित मंदी को रोक पाना संभव दिखाई नहीं देता है।

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