दागी माननीयों के मुकदमों का निपटारा

Samachar Jagat | Monday, 10 Dec 2018 04:34:50 PM
Disposal of Tainted Leaders

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दागी माननीयों के खिलाफ लंबित मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का स्वागत किया जाना चाहिए। देश की सर्वोच्च अदालत ने निर्देश दिया है कि बिहार और केरल के हर जिले में दागी माननीयों के विरुद्ध मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनाई जाए। यह भी कि उम्र कैद की सजा के प्रावधान वाले मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर हो। अपने इस निर्देश की पालना पर सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार और केरल के उच्च न्यायालयों से 14 दिसंबर तक रिपोर्ट भी मांगी है।


 विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजनीति को लगा अपराधीकरण का रोग कितना भयावह हो गया है। यह बीते सप्ताह मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय में न्याय मिल द्वारा दी गई जानकारी से समझा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के ही निर्देश पर राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक न्याय मित्र विजय हंसारिया ने बताया कि देश भर में मौजूदा एवं पूर्व सांसद-विधायकों के विरुद्ध 4122 आपराधिक मामले लंबित है। कानूनी छिद्रों का लाभ उठाकर न्याय प्रक्रिया को किस तरह सुस्त बना दिया जाता है। 

इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इनमें कुछ मामले तो तीन दशक से भी पुराने हैं। प्रचलित धारणा है कि विलंबित न्याय दरअसल न्याय से इनकार ही है। यहां यह बता दें कि शीर्ष अदालत ने वर्तमान और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का राज्यों और विभिन्न उच्च न्यायालयों से विवरण मांगा था ताकि ऐसे मुकदमों की सुनवाई के लिए पर्याप्त संख्या में विशेष अदालतें गठित की जा सके। शीर्ष अदालत ने कहा कि विशेष अदालतें जब सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की सुनवाई करेगी तो वे उम्र कैद की सजा वाले मामलों को प्राथमिकता के आधार पर लेंगी। कोर्ट ने कहा कि अन्य राज्यों में गठित विशेष अदालतें अगले आदेश तक नेताओं के मुकदमें निपटाने का अपना काम पूर्ववत करती रहेगी। अदालत अधिवक्ता एवं भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय को उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध नेताओं पर ताउम्र प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। 

दरअसल याचिका में मांग की गई कि नेताओं के मुकदमों के लिए हर जिले में विशेष अदालतें बने। कोर्ट ने कहा कि यह उचित नहीं है क्योंकि हो सकता है कि एक जिले में केस ज्यादा हो और दूसरे में कोई केस हो ही न। वहीं सभी मुकदमें सेशन जिले के सेशन कोर्ट में एकत्र करना ठीक नहीं है। हो सकता है कि मुकदमें मजिस्ट्रेट ट्रायल स्तर के हो। इसलिए बेहतर होगा कि यह मामला हाईकोर्ट पर छोड़ दिया जाए और वह स्थानीय जरूरत के हिसाब से जिलों में सेशन और मजिस्ट्रेट कोर्ट को विशेष अदालत चिन्हित करेंगे। कोर्ट ने इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पटना और केरल हाईकोर्ट को चुना और कहा कि इन हाईकोर्ट के नतीजे देखकर आगे यह इस पर विचार किया जाएगा। 

अब जरा माननीयों के मामलों को इस कसौटी पर कसें कि इनके मामले में न्याय में विलंब तो लाखों मतदाताओं के साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था से भी अन्याय है। इसके बावजूद हमारा राजनीतिक नेतृत्व इस गंभीर रोग के निदान के उपायों से हमेशा मुंह चुराता रहा है। चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक सभी राजनीति के अपराधिकरण पर चिंता जताते रहे हैं, लेकिन सरकारें एक कान से सुनकर दूसरे से निकालती रही। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने राजनेताओं के विरुद्ध आपराधिक मामलों के तय समय सीमा में निपटारे का वायदा किया था, लेकिन उस दिशा में पर्याप्त जरूरी कदम नहीं उठाए गए। नतीजन राजनीति के अपराधीकरण का रोग बढ़ते-बढ़ते नासूर बनता जा रहा है। 

निर्वाचित सदनों में दागी प्रतिनिधियों की बढ़ती संख्या के लिए मतदाताओं को दोषी ठहराने वाला राजनीतिक नेतृत्व दरअसल अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से मुंह चुरा रहा है। अपवाद स्वरूप भी शायद ही कोई राजनीतिक दल अपना दामन अपराधीकरण के दागों से मुक्त साबित कर पाए। इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि खुद को हर तरह की जिम्मेदारी जवाबदेही से मुक्त और सुख सुविधाओं से युक्त रखने के अलावा इस मुद्दे पर भी कमोवेश सभी राजनीतिक दल नेता एकमत नजर आते हैं। वैसे सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्देश उन राजनेताओं के भी हित में है, जिन्हें शिकायत रहती है कि उन्हें राजनीतिक दुर्भावनावश झूठे मामले में फंसाया गया है।

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