वायुसेना के आधुनिकीकरण से ही थमेंगे हादसे

Samachar Jagat | Tuesday, 18 Jun 2019 03:22:43 PM
Due to the modernization of the IAF

भारतीय वायुसेना की आधिकारिक घोषणा में लापता एएन-32 में सवार 13 बहादुर सैन्यकर्मियों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा गया है कि उनमें से कोई भी हमारे बीच नहीं रहा। अंतत: किसी के जीवित न बचने की घोषणा के साथ ही वे उम्मीदें दफन हो गई जो इन जांबाजों के परिजन लगा रहे थे। यहां यह बता दें कि तीन जून को यह विमान एएन-32 असम के जोरहाट बेस से अरुणाचल प्रदेश के शियोमी जिले स्थित मेचुका के लिए रवाना हुआ था, मगर बारह हजार फुट ऊंचे पहाड़ी इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह इलाका चीन की सीमा के निकट अरुणाचल के दूरस्थ इलाके में से एक है। बिना आबादी वाला यह इलाका संचार की दृष्टि से अत्यंत जटिल क्षेत्र है, जिसके चलते लंबे समय तक दुर्घटनाग्रस्त जहाज का पता नहीं चल सका। उस इलाके में घने जंगल है।

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अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विमान की टोह लेने में एक हफ्ते से ज्यादा वक्त लग गया। बताया जा रहा है कि अरुणाचल के इन जंगली इलाकों में दशकों से कई विमान लापता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह ऐसा इलाका है जहां से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लापता हुए विमान के मलबे अब तक मिल रहे हैं। इस साल फरवरी में ईस्ट अरुणाचल प्रदेश के रोइंग जिले में 75 साल से लापता एक हवाई जहाज का मलबा मिला था। यह अमेरिकी वायुसेना का विमान था। विमान दूसरे विश्व युद्ध के दौरान चीन में जापानियों के खिलाफ लड़ाई में मदद करने के असम के दिनजान एयरफील्ड से उड़ा था। विमान में बड़ी संख्या मेें गोलियों के अलावा एक चम्मच, कैमरों के लेंस के अलावा ऊनी दस्ताना भी सुरक्षित मिला था। प्रश्न यह है कि इस इलाके में विमान क्यों दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं? इस बारे में अलग-अलग शोध से पता चला है कि इस इलाके के आसमान में बहुत ज्यादा टर्बुलेंस है। 

100 मील प्रतिघंटे की रफ्तार से चलने वाली हवा से उड़ान बहुत ज्यादा मुश्किल हो जाती है। घाटियां और घने जंगलों से घिरे हुए किसी विमान के मलबे को तलाशना कठिन है। यही कारण है कि भारतीय वायुसेना, नेवी तथा दूसरों के व्यापक अभियान के बावजूद काफी समय तक इस निर्जन इलाके में जहाज का कोई सुराग नहीं मिल पाया। भौगोलिक जटिलता के चलते बचाव व राहत का कार्य समय रहते संभव नहीं हो पाया। यूं तो यह देश की अपूरणीय क्षति है। मगर हरियाणा के लिए एक दुख यह भी है कि इस दुर्भाग्यशाली विमान में एयर ट्रेफिक सर्विस में तैनात सोनीपत के पंकज सांगवान, फरीदाबाद के फ्लाइट लेफ्टिनेट राजेश थापा व पलवल के पायलट, आशीष तंवर भी शामिल थे। अब वायुसेना ने अधिकारिक तौर पर जवानों के परिजनों को उनकी शहादत की सूचना पहुंचा दी है। दरअसल 11 जून को सियांग के जंगलों में विमान का मलबा तलाश लिया गया था। 

फिर 12 जून को राहत व बचाव के मकसद से 15 जवानों और पर्वतारोहियों की टीम उतारी गई। बीते गुरुवार को टीम ने आठ कू्र सदस्यों समेत 13 लोगों में से किसी के न बचने की घोषणा कर दी। विमान का ब्लैक बॉक्स हासिल कर लिया गया है। कालांतर में इसके जरिए दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाया जा सकेगा। नि:संदेह साल दर साल लगातार होने वाली सैन्य विमान दुर्घटनाएं हमारी बड़ी चिंता होनी चाहिए। इससे जहां हमें अपने जांबाजों को खोना पड़ता है, वहीं हमारी आर्थिक व सुरक्षा तैयारियों को भारी नुकसान होता है। इस साल वायुसेना के कई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए। 28 जनवरी को वायुसेना का जगुआर विमान उत्तर प्रदेश के कुशीनगर मेें दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इसमें पायलट बच गया। एक फरवरी को मिराज 2000 विमान बैंगलुरु के हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड एयरपोर्ट से उड़ान भरने के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसमें दो पायलट शहीद हुए।

 इसके बाद 12 फरवरी को मिग-27 पोखरण फायरिंग रेंज में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे में पायलट सुरक्षित बच निकले। 20 फरवरी को दो सूर्य किरण एयरक्राफ्ट हवा में आपस में ही टकरा गए। हादसे में एक पायलट की मौत हो गई। फरवरी में ही 27 तारीख को बालाकोट एयरस्ट्राइक के एक दिन बाद ही कश्मीर के बड़गाम में एमआई-17 दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें 6 जवान शहीद हुए। 8 मार्च को पक्षी से टकरा जाने की वजह से मिग-21 बाइसन राजस्थान के बीकानेर में क्रैश हुआ। 31 मार्च को मिग 27 यूपीजी राजस्थान के सिरोही में क्रैश हुआ। 3 जून को वायुसेना का एएन-32 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें लोग सवार थे। इस प्रकार वायुसेना ने इस साल वायुसेना ने एक मिराज, एक जगुआर, एक हेलीकॉप्टर, दो हॉक विमान और दो मिग परिवार के विमानों को खोया है। यह देश की बड़ी क्षति है। यह हादसे हमें वायुसेना के बेड़े की गहन पड़ताल की जरूरत बताते हैं। 

साथ ही विमानों के आधुनिकीकरण में इस देश की राजनीतिक अनिश्चितता बाधा बनी है। हालांकि भारत ने अमेरिका में बने उन्नत किस्म के चिनूक हेलीकॉप्टर को वायुसेना में शामिल किया है और बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान राफेल को खरीदने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। मगर इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज करने के लिए अधिक की जरूरत है। अन्यथा दुर्घटनाओं का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बदलते वक्त के साथ युद्ध भूमि में हवाई लड़ाई की भूमिका निर्णायक होती है।

ऐसे में किसी तरह की भी ढिलाई युद्धकाल में घातक साबित हो सकती है। इस मायने में यह जरूरी हो जाता है कि हमारी सीमाओं को दो तरफ से गाहे-बगाहे चुनौती मिल सकती है। नि:संदेह सामरिक हितों के संरक्षण में वायुसेना की भूमिका निर्णायक होती है। हाल ही में बालाकोट में किए गए हवाई हमले ने क्षेत्र के सामरिक समीकरणों की नए सिरे से व्याख्या की है और सीमा पार से चलाए जा रहे आतंकवाद की कमर तोड़ी है। वहीं दूसरी ओर वायुसेना पैदल सेना का मनोबल बढ़ाने में निर्णायक भूमिका भी निभाती है। हमें वायुसेना के आधुनिकीकरण की दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए।
 



 

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