शिक्षा अभिमान करना नहीं, सम्मान करना सिखाती है

Samachar Jagat | Monday, 08 Jul 2019 03:28:25 PM
Education does not boast, teaches respect

शिक्षा पाकर यदि कोई अभिमानी हो जाए तो फिर शिक्षा का महत्व ही खत्म हो जाता है। इसी तथ्य को उजागर करती एक कहानी है महाकवि कालिदास के बारे में। महाकवि कालिदास बहुत विद्वान थे, उनकी विद्वता के चर्चे पूरी दुनिया में होते थे। कालिदास अपनी प्रशंसा सुनकर बहुत खुश होते थे, धीरे-धीरे इस प्रकार की प्रशंसा से उनके मन में घमण्ड आ गया। एक बार वे शास्त्रार्थ हेतु पड़ौसी राज्य के निमंत्रण पर जंगल से गुजर रहे थे। गर्मी के दिन थे, उन्हें प्यास सताने लगी। तभी कालिदास को एक झौंपड़ी व कुआं दिखाई दिया। वे वहां गए जहां पर एक बालिका मटका लेकर झौंपड़ी की तरफ जा रही थी। कालिदास ने कहा- बालिके! मुझे बहुत प्यास लगी है, पानी पिलाने की कृपा करें।

Rawat Public School

बालिका ने कहा- आप कौन हैं, परिचय दीजिए। इस पर कालिदास को आश्चर्य हुआ कि ये बालिका मुझे नहीं जानती है घमण्ड से बोले जाओ किसी बड़े व्यक्ति को भेजो, वह मुझे जानता होगा क्योंकि मैं तो ठहरा दुनिया का सबसे बड़ा विद्वान, बलवान और महान। बालिका कालिदास की बातों से अप्रभावित रही और पूछा कि दुनिया में तो बलवान दो ही हैं बताइए वे कौन है? कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, आप ही बता दें मगर पानी पिला दें। बालिका ने कहा कि अन्न और जल, जिनकी कमी से आपकी यह हालत हो रही है कालिदास निरुत्तर थे। बालिका ने फिर कहा कि आप कौन हैं सच बताएं- वे बोले मैं ‘बटोही हूं।’ बालिका ने कहा कि आप गलत कह रहे हैं- बटोही तो अपने चलने के स्थान से गन्तव्य तक न थकता है न रूकता है और न बिकता है। अबकी बार भी कालिदास निरुत्तर हो गए। बटोही तो दो ही है- सूर्य और चन्द्रमा।

इसके बाद बालिके ने मटका उठाया और झौंपड़ी में चली गई। थोड़ी देर बाद एक वृद्ध स्त्री आई मटका लेकर, कालिदास ने कहा कि प्यास से मर जाऊंगा, कृपया पानी पिला दीजिए। वृद्धा बोली पानी तो पिला दूंगी पर पहले अपना परिचय दें। वे बोले- मैं तो मेहमान हूं, वृद्धा ने कहा आप गलत कह रहे हैं- मेहमान तो धन और यौवन हैं, इन्हें जाते देर नहीं लगती, सच बताओ, तुम कौन हो? इस पर कालिदास बोले मैं सहनशील हूं। वृद्धा बोली आप गलत कह रहे हैं, सहनशील तो धरती और पेड़ हैं जो सब कुछ देकर, खोकर भी कुछ नहीं कहते हैं।

 सच बताओ आप कौन हैं- अब तो कालिदास की स्थिति गिरने जैसी हो गई, वे बोले- मैं हठी हूं। आप गलत कह रहे हैं- हठी तो नख और केश हैं- जो बार-बार काटने पर भी बढ़ना नहीं छोड़ते हैं। सच बताओ आप कौन हूं- वे धीरे से बोले- मैं मूर्ख हूं। आप गलत कह रहे हैं- मूर्ख तो एक अयोग्य शासक व उसका दरबारी जो उसकी हमेशा प्रशंसा करता रहता है। अब कालिदास उस वृद्धा के चरणों में गिर पड़ा। वृद्धा के रूप में मां सरस्वती ने उसे गले लगा लिया और कहा कि मैंने आपका अहंकार खत्म करने के लिए ये सब किया है। अब कालिदास का सिर झुक गया और जिसका अहंकार झुक गया वह इंसान हो गया।

प्रेरणा बिन्दु:- 
चढ़ने में वर्षो लग जाते
गिरने में कुछ पल लगते है
अहंकार छल द्वेष क्रोध तो
धू-धू करके जल जाते हैं।



 

यहां क्लिक करें : हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें, समाचार जगत मोबाइल एप। हिन्दी चटपटी एवं रोचक खबरों से जुड़े और अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें!

Copyright @ 2019 Samachar Jagat, Jaipur. All Right Reserved.