शिक्षक अर्थात् शिक्षित, क्षमावान और कर्तव्य परायण

Samachar Jagat | Wednesday, 10 Jul 2019 03:30:28 PM
Educator, educated, forgiving and dutiful

शिक्षक एक शब्द नहीं है, इसमें पूरा समाज समाया है, देश और दुनिया समायी है। एक शिक्षक ही ऐसी शख्सियत है जिसके शब्दों की गूंज घर-घर में गूंजती है और एक विद्यार्थी अपने माता-पिता की बात पर विश्वास नहीं करता, उसके लिए शिक्षक खास भी होता है। देश के महान शिक्षक रहे सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णनन् को यदि कोई अपनी शब्दांजलि या फिर जीवनांजलि देना चाहता है तो फिर उसको सबसे पहले स्वयं को शिक्षित होना होगा। आज अक्सर यह देखने को मिल रहा है कि शिक्षण संस्थाओं से ज्ञान विमुख होता जा रहा है, यह बहुत खतरनाक है। शिक्षक का अपना प्रधान धर्म है कि वह पढ़ाने से पहले स्वयं पढ़े, स्वयं उस विषय की गहराई में उतरे, विषय के समस्त रहस्यों को जाने और उसके बाद अपने विद्यार्थियों को उस विषय के बारे में बतलाए।

शिक्षक शब्द में दूसरा अक्षर आता है ‘क्ष’ अर्थात् क्षमा। एक शिक्षक ही ऐसा होता है जिसके आसपास नन्हे-मुन्ने रहते हैं, वे सच में भगवान के रूप होते हैं, उनसे छोटी-छोटी भूलें होना स्वाभाविक है, ऐसे में उन्हें क्षमा करना एक शिक्षक का प्रथम गुण है। शिक्षक में तीसरा अक्षर है ‘क’ जिसका अर्थ है ‘कर्तव्य’ अर्थात् आज की इस आपाधापी वाली दुनिया में शिक्षक का कर्तव्य बेहद पवित्र और सम्मान जनक है और जो भी कोई इस कर्तव्य को दिल से निभाता है, स्वार्थ से परे होकर निभाता है, उसे शिक्षक कहा जाता है।

अंग्रेजी में शिक्षक को टीचर कहते हैं। टीचर शब्द में भी सात अक्षर आते हैं और इन सातों अक्षरों का अपना अलग महत्व होता है जैसे टी-यानि ट्रयफुल, ई यानी इमोशन फुल, ए यानि अकाउंटेबल, सी- चाइल्डहुड, एच- ओनेस्ट हार्डवर्कर, ई- एनकरेजर और आर यानि रीडर। अर्थात् एक टीचर की एक शाब्दिक व्याख्या भी की जाए तो एक बहुत सार्थक अर्थ निकल कर आता है। एक टीचर में सच्चाई कूट-कूटकर भरी होना बेहद जरूरी है क्योंकि उसके हर शब्द समाज के आखिर छोर तक पहुंचते हैं। दूसरी बात एक शिक्षक में इमोशनस् होना भी बेहद जरूरी हैं, क्योंकि इमोशन्स संस्कृति और संस्कारों के आधार है।

 तीसरा अक्षर ए अर्थात् एक शिक्षक अपने घर परिवार तक ही सीमित नहीं है, उसकी जिम्मेदारी केवल घर तक सीमित नहीं है, वह समाज के लिए भी जिम्मदार है, सबसे महत्वपूर्ण बात कि वह हमेशा एक बच्चा बना रहे क्योंकि बच्चों को एक बच्चा बनकर ही सीखा सकते हैं, वह अपने काम में ईमानदार और मेहनती भी रहे, एनकरेज करने वाला और अच्छा पाठक हो तभी वह अपना शिक्षक का दायित्व निभा सकता है। शिक्षक का पद मात्र रोजी रोटी का नहीं है बल्कि यह रोजगार-संस्कार और प्यार का आधार है या यौं कहें कि यह संसार का सार है। आइए, इसे अपने कर्म से व्यवहार से सम्मानित करें।

प्रेरणा बिन्दु:- 
शिक्षक संस्कार का दाता
उसका पावनता से नाता
उसके नाम का महत्व देखो
ब्रह्म नाम से पहले आता।



 

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