अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई पाटने को ‘न्याय’ वक्त का तकाजा

Samachar Jagat | Saturday, 30 Mar 2019 04:46:51 PM
Emergency-poverty ties to bridge the gap

देश में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई से अराजकता की आशंका के मद्देनजर राहुल गांधी की न्यूनतम आय योजना (न्याय) वक्त का तकाजा है। अमीर और गरीब के बीच खाई पाटने की कोशिशों के बीच हाल में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पिछले दो साल में ऐसे लोगों की तादाद दोगुनी से ज्यादा हुई है, जिनकी संपत्ति एक हजार करोड़ रुपए या इससे अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में ऐसे लोगों की संख्या 339 थी, जो 2018 में बढक़र 831 हो गई। इन 831 अमीरों की कुल संपत्ति 719 अरब डालर है। जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के चौथाई हिस्से के बराबर है। 

विश्व संपदा की पिछले साल जो रिपोर्ट आई थी उसमें बताया गया था कि भारत में करोड़पतियों की संख्या में 22.2 फीसदी का इजाफा हुआ है। पिछले साल ही अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने भी कहा कि भारत में पिछले डेढ़ दशक में अरबपतियों की संख्या में 12 गुनी बढ़ोतरी हुई है। साल 2015 में चीनी पत्रिका ‘हुरुन’ ने दुनिया के अमीरों की सूची जारी की थी, जिसमें बताया गया था दुनिया भर के 2089 अरबपतियों में 97 भारत के है। पिछले साल अमेरिका के पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट से भी यह सामने आया कि भारत में अरबपतियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। 

इसमें कहा गया था कि भारत दुनिया के 3.4 फीसदी अरबपतियों का ठिकाना बन चुका है। देश में करोड़पतियों और अरबपतियों की तादाद बढ़ना अच्छी बात है। ये आंकड़े अर्थव्यवस्था मजबूती और समृद्धि के साथ देश की बदलती तस्वीर की परिचायक है। लेकिन इसका दूसरा पहलू बेहद स्याह है कि आखिर अमीरों के अनुपात में गरीबों की आर्थिक सेहत क्यों नहीं सुधर रही है? क्या कारण है कि सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने में सफलता नहीं मिल रही है? 

आय में असमानता की गहराती खाई न केवल चिंताजनक है, बल्कि सच कहें तो यह लोकतांत्रिक देश के माथे पर कलंक है और शर्मसार करने वाली बात भी। सरकार की ओर से गरीबों के कल्याण व उत्थान के लिए ढेरों कल्याणकारी योजनाएं चलाए जाने का ढिढ़ोरा पीटा जा रहा है। बावजूद इसके करोड़ों लोग अगर गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन को मजबूर है तो अमीरों की बढ़ती तादाद पर सवाल तो उठेगा ही। ऐसा इसलिए कि असंतुलित आर्थिक विकास से अमीरों को जितना फायदा होता है, उससे कई गुना गरीबों का नुकसान होता और उनमें आक्रोश उत्पन्न होता है जो कभी भी अराजकता की ओर रुख कर सकता है। 

आय में बढ़ती असमानता का ही नतीजा है कि भारत में गरीबी, भुखमरी और कुपोषण की समस्याएं लगातार गहराती जा रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो आज देश में 30 करोड़ लोग ऐसे हैं जो भयावह गरीबी का सामना कर रहे हैं। भारत में बुनियादी सुविधाओं से वंचित 68 करोड़ लोग ऐसे हैं जो गरीबी का दंश झेल रहे हैं। भारत सरकार के आंकड़े भी बताते हैं कि देश की कुल 22 फीसदी आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। देश के 27 फीसदी आबादी वाले 126 जिले सबसे गरीब और सुविधाओं से वंचित है। इनमें अधिकतर जिले उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड राज्य के हैं। इनमें से दो राज्य उत्तरप्रदेश और झारखंड भाजपा शासित है और बिहार में भाजपा के सहयोगी दल का शासन है। इसी तरह 14 फीसदी आबादी वाले 151 जिले गुजरात, तमिलनाडु, पंजाब और महाराष्ट्र में है।

 इनमें भी गुजरात और महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार है। पंजाब में कांग्रेस और तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक की सरकार है। वैश्विक एजेंसियों ने अपनी रिपोर्टों में आय में बढ़ती असमानता को पाटने और ‘गरीब मुक्त भारत’ के लिए कुछ अहम सुझाव दिए हैं। मसलन साढ़े ग्यारह करोड़ लोगों को गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार दिए जाने, खाद्य उत्पादकता मौजूदा 2.3 टन प्रति हेक्टिर से बढ़ाकर चार टन किए जाने। इसके अलावा सामाजिक सेवाओं के सुधार पर वर्ष 2022 तक 10 लाख 88 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाने के सुझाव दिए हैं। अगर सरकार इन सुझावों पर अमल करती है तो आय असमानता पाटने में मदद मिलेगी। गैर सरकारी संगठन ‘आक्सफेम’ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में आर्थिक असमानता बीते तीन दशकों यानी आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू करने के बाद तेजी से बढ़ी है। हालात यह है कि देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 15 फीसदी हिस्सा भारतीय अरबपतियों के खाते में है।

 रिपोर्ट में इस हालत के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा गया है कि भारत में अमीरों ने देश मेें सृजित संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ‘सांठगांठ वाले पूंजीवाद’ या बपौती में हासिल किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में सिर्फ एक फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसके उलट अरबपतियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले दिनों ‘वल्र्ड इनइक्विलिटी लैब’ के अध्ययन से भी यह तथ्य सामने आया था कि 1980 के दशक से ही भारत में आय असमानता लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान समय में शीर्ष 0.1 फीसदी सबसे अमीर लोगों की कुल संपदा बढक़र निचले 50 फीसदी लोगों की कुल संपदा से कई गुना अधिक हो गई है। इस रिपोर्ट में पाया गया कि आय असमानता में बढ़ोतरी 1947 में देश की आजादी के तीस साल की तुलना में उलट है। उस समय आय असमानता काफी घटी थी और निचले 50 फीसदी लोगों की संपत्ति राष्ट्रीय औसत की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ी थी।

 जबकि मौजूदा दौर में आम लोगों की आय के बनिस्पत कुछ लोगों की आय में बढ़ोतरी हैरान करने वाली है। ‘वैश्विक असमानता रिपोर्ट 2018’ को विश्व के जाने माने अर्थशास्त्री फाकंडो एल्वारेडी, लुकास चांसल थॉमस पिकेटी, डमयुआल साइज और गैब्रियल जकमैन ने तैयार किया है। इसलिए इसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। इस रिपोर्ट पर गौर करें तो साल 2016 में देश की कुल दौलत का 55 फीसदी हिस्सा शीर्ष के 10 फीसदी अमीरों के पास था। इसी तरह 2014 में देश के शीर्ष एक फीसदी आय वाले लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 22 फीसदी हिस्सा था और शीर्ष 10 फीसदी के पास 56 फीसदी था। 

इन सब परिस्थितियों के मद्देनजर अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई को पाटने और गरीब मुक्त भारत के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की न्यूनतम आय योजना (न्याय) वास्तव में गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक की एक उपयोगी योजना है। हालांकि केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने न्यूनतम आय गारंटी को धोखा बताया है। भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इसे ‘शेखचिली की बात’ कही है। जबकि राहुल गांधी ने ‘न्याय’ को ‘गरीबी पर अंतिम प्रहार’ कहा है। लोग इस बात को भूले नहीं है कि यूपीए-2 (संप्रग-2)  के कार्यकाल में राहुल गांधी के आग्रह पर शुरू की गई ‘नरेगा’ की योजना से 14 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए थे। 

हालांकि पिछले 5 साल में इस योजना के लिए केंद्र द्वारा समय पर धन आवंटित नहीं किए जाने से मजदूरी के भुगतान के लिए (श्रमिक) भटकते रहें। अब भी लोगों की मजदूरी का भुगतान बाकी है। लेकिन पांच साल पहले इस योजना को लागू किए जाने के बाद गांवों और शहरों में दिहाड़ी पर काम करने वाले श्रमिकों की मजदूरी में भारी बढ़ोतरी हो गई थी। शहरों में चेजे पर काम करने वाले मजदूरों और गांवों में भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की दिहाड़ी में भारी बढ़ोतरी हुई थी। यही नहीं गांवों और शहरों में सस्ती मजदूरी करने वालों का टोटा पड़ गया था। लेकिन पिछले पांच साल में केंद्र की नरेगा के प्रति बेरुखी से मजदूरों की हालत खराब हो गई है। जहां तक ‘न्याय’ के लिए धन की कमी बताई जा रही है, इसके लिए ‘वल्र्ड इनइक्वैलिटी लैब’ ने कहा है कि अमीरों पर 2 फीसदी संपत्ति कर (वेल्थ टैक्स) लगाकर धन का इंतजाम किया जाना मुमकिन है।
 



 

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