नोटबंदी पर बार-बार फैसले बदलने से बढ़ी बीमारी

Samachar Jagat | Thursday, 24 Nov 2016 05:53:24 PM
नोटबंदी पर बार-बार फैसले बदलने से बढ़ी बीमारी

पांच सौ और एक हजार के नोटों के विमुद्रीकरण के फैसले के एक पखवाड़े बाद भी जहां अफरातफरी मची हुई है, वहीं लोग रोज नए नियम जारी होने से हैरान और परेशान है। इससे लोगों की इस धारणा को और बल मिल रहा है कि सरकार ने इतना बड़ा फैसला बिना किसी पूर्व तैयारी के कर लिया। सरकार की फैसला लेने की आधी-अधूरी तैयारी के कारण एक तरफ बैंकों व एटीएम के बाहर कतारे खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। वहीं दूसरी ओर घर-घर से लेकर पूरे देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है। 

प्रधानमंत्री ने आठ नवंबर को पांच सौ और हजार के नोटों के विमुद्रीकरण की घोषणा की थी। तब से सरकार एक पखवाड़े में दो दर्जन से अधिक फैसले कर चुकी है। आए दिन नए फैसलों के अलावा पुराने फैसलों में संशोधन भी किए जा रहे है। मसलन पहले पुराने नोटों को बदलने की सीमा साढ़े चार हजार रुपए थी, उसे बाद में घटाकर दो हजार रुपए कर दी गई। इसी प्रकार शादी के लिए एक बार ढ़ाई लाख रुपए तक निकालने की इजाजत दी गई, बाद में उसे वापस ले लिया गया और एक दिन बाद उसे फिर बहाल कर दिया गया, किन्तु साथ ही कई शर्ते भी जोड़ दी गई। 

लडक़ी और लडक़े का पहचान-पत्र, टेंट और हलवाई को एडवांस दिए जाने की रसीद, बाजार से शादी का सामान खरीदने की रसीद, मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर आदि की शर्तों से लोग परेशान है। लाइन में दुल्हे और दुल्हन को लगना पड़ रहा है। मां-बाप शादी की तैयारी करें या लाइनों में लगे इस प्रकार लोगों को अनेक परेशानी उठानी पड़ रही है। नोटों की अदला-बदली की लाइन में लगे लोगों की उंगुली में स्याही लगाने का फरमान सरकार ने जारी किया। इसके चौबीस घंटे भी नहीं बीते कि वित्त सचिव ने एक ही बार में पांच नई घोषणाएं कर दी। 

बैंकों के सामने भी बड़ी परेशानी है, वह यह कि कभी वित्त सचिव तो कभी वित्तमंत्री और कभी रिजर्व बैंक की ओर से घोषणाएं है। वह इनमें से किस के आदेश माने? वैसे नियमानुसार बैंकों को रिजर्व बैंक के आदेश ही मानना पड़ता है। वित्त सचिव से बैंक सीधे संचालित नहीं होते हैं। आम लोगों को रोज जो परेशानियां भुगतनी पड़ रही है, वे तो अंतहीन है ही, नए-नए नियम घोषित होने से बहुत सारे लोग गफलत में पड़ते जा रहे हैं कि ताजा तरीन नियम-कायदा क्या है? नियम भी कितने सोच समझकर घोषित किए जा रहे हैं, यह उंगली पर स्याही लगाने संबंधी फैसले से पता चलता है। 

घोषणा के दूसरे ही दिन साफ हो गया कि अमिट स्याही का इंतजाम नहीं है। इस फैसले से सरकार की बुरी तरह किरकिरी हुई जब चुनाव आयोग ने एतराज कर दिया। क्योंकि दो दिन पहले ही देश के कुछ राज्यों में लोकसभा और विधानसभाओं के उपचुनाव होने थे। इसके अलावा पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और उंगलियों पर अमिट स्याही लगा देने से दिक्कत खड़ी हो सकती है। 

सरकार के फैसलों जैसा ही हाल उसके आश्वासनों का भी है। लोगों की नाराजगी दूर करने के लिए वित्तमंत्री अरुण जेटली रोज कुछ न कुछ आश्वासन देते हैं। वे कभी यह कहते हैं कि नकदी की किल्लत जल्दी ही दूर हो जाएगी। कभी कहते हैं कि सारे एटीएम शीघ्र ही नए नोटों के अनुरूप बना दिए जाएंगे। लेकिन ज्यादातर एटीएम अब भी सूखे ही मिलते हैं और नगदी की तंगी जस की तस है। 

जिन घरों में बच्चियां शादी लायक हो गई है, उनके मां-बाप शादी की तैयारी में लगे हुए थे। चार माह तक देव सोने के कारण शादी का कोई मुहुर्त नहीं था। देवउठनी ग्यारस जो कि 11 नवंबर को थी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उससे तीन दिन पूर्व 8 नवंबर को 500 और एक हजार के नोट बंद करने की घोषणा कर दी। गांवों में तीन साल सूखे के बाद इस बार मानसून में अच्छी वर्षा होने के कारण पहले सावे में अपनी बच्चियों की शादी करना चाहते थे, अचानक उनकी व्यवस्थाओं पर पानी फिर गया। 

किसी सेठ साहूकार से ब्याज पर रुपए लेकर आए थे, पांच सौ और हजार के नोट बंद होने से वे सकते में आ गए। औचक फैसले से वे भौचक रह गए। ब्याज पर लिए रुपए सेठ को वापस देकर बदलवाए नहीं जा सकते थे। उन रुपयों को बैंक में बदलवाने गए तो वहां लंबी कतारें लगी हुई थी। गांवों में किसानों और गरीबों ने कैसे अपनी बच्ची की शादी की होगी, यह बात या तो बच्ची के मां-बाप को पता है या ऊपर वाले को।

 किसके सामने रोना रोएं। शादियों का सीजन शुरू हुआ है तो शादियां होगी ही। बैंकों में नोट बदलवाने के लिए खाता होने की नई शर्त आने से जिन लोगों के बैंक में खाते नहीं है, उनके सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। एक ओर जहां शादी वाले लोगों की परेशानी है, वहीं खुले पैसों को लेकर भी लोगों को बड़ी दिक्कत है। नोट बदलवाने गए तो दो हजार का नया नोट बैंक से मिला एक। 

वह बाजार में दो हजार का नोट लिए सब्जी वाले, परचूनी की दुकान वाले के जाता है तो खुले नहीं होने के कारण न तो सब्जी वाला खुले दे पाता है, न परचूनी वाला। ऐसे में वह दो हजार के नोट का क्या करें? जब चारों ओर से खुले पैसे की शिकायतें आने लगी तो भरोसा दिलाया गया कि पांच सौ और हजार का नोट भी आएगा। अलबता पांच सौ का नया नोट आ गया है और वे कहीं-कहीं मिलने भी शुरू हो गए हैं। 

इसके बाद वित्तमंत्री जेटली ने साफ कह दिया कि अब हजार के नोट नहीं आएंगे। नित नए फैसलों और घोषित निर्णयों में जल्दी-जल्दी फेरबदल के चलते बैंकों में भी कहा जाने लगा है कि हमारे पास आदेश नहीं आए हैं। लोग इन हालातों में सोचने-विचारने के बजाए जो भी चर्चा होती है, उस पर भरोसा कर सही मान लेते हैं। सरकार की भावी योजनाओं को लेकर शंकाओं से घिरे रहते हैं। 

सरकार कोई भी फैसला सोच समझकर करे और उसको दृढ़ता से लागू करे। लोगों में अफरातफरी मचे ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए। यह सही है कि बदली हुई परिस्थितियों में जनता की दिक्कतों के मद्देनजर नए फैसले भी लेने पड़ सकते हैं। किन्तु वे प्रत्येक पहलू पर अच्छी तरह से सोच-विचार के बाद ही लिए जाने चाहिए।

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