विश्वास, सम्बन्ध, दिल और प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए नहीं होते

Samachar Jagat | Thursday, 23 Aug 2018 01:25:33 PM
Faith, relation, heart and commitment are not to break

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खड़ा न हो जाए आंगन की
छाती पर कारवां दीवारों का
आंगन में महकते फूलों
को खिलाकर रखो

इस भौतिक संसार में व्यक्ति सूरत संभलाने के साथ ही जोड़ना शुरू कर देता है, उसका भौतिक चीजों के साथ इतना प्रेम होता है कि उनके संग्रह में वह पागल सा हो जाता है, जितनी अधिक चीजों को वह जोड़ा चला जाता हे, उसकी जोड़ने की प्रवृति उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। फिर चाहे वे रुपए हों, कपड़े हो, घर की वस्तुएं हों या शौक और खाने की चीजें हों। लेकिन यह विडम्बना ही कही जाएगी कि वह कुछ ही मिनटों में आपसी विश्वास को, गहरे-पुराने सम्बन्धों को, अपने प्रिय जनों के दिलों को और समाज देश और खुद के वादों को तोड़ रहा है, मरोड़ रहा है और स्वार्थ में पागल हो छोड़ भी रहा है। 

बात जब विश्वास की आती है तो इसमें यह कतई संदेश  नहीं कि यह दुनिया विश्वास पर टिकी है, अस्तित्व में है, गति और प्रगति में है। विश्वास एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा घर-समाज और देश चलता है, आपसी रिश्ते मजबूत होते हैं, प्रेम और भाईचारा बढ़ता है, एकता और समझ बढ़ती है और यहां तक की व्यापार सर्विस और लेन-देन सुव्यवस्थित-निर्बाध गति से संचालित होते हैं। बेशक साहस छोड़ दें, आस छोड़ दें, लेकिन किसी भी सूरत में विश्वास को नहीं छोड़ें, क्योंकि ऐसा करने से जीवन का मूल सिद्धान्त खण्ड-खण्ड होता है जो मानवीय प्रकृति के विपरीत है।

जब बात सम्बन्ध की आती है तो इसका सीधा सा अर्थ यही निकल कर आता है कि सम्बन्ध नजदीक लाता है, अपनापन लाता है, आत्मियता भरता है, मधुरता और शीतलता लाता है, संकटों को परास्त करने की शक्ति देता है, गमों को झेलने की-सहने की शक्ति प्रदान करता है और खुशियों को बांटने की भावना लाता है। जब सम्बन्ध इतना सब करता है अर्थात् मिलने को मजबूर करता है, साथ चलने को दबाव बनता है और मिलकर बोझ उठाने का हौसला देता है तो इसको तोड़ने से केवल दर्द, टीस और खण्ड-खण्ड होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलने वाला।

 सम्बन्ध भी मजबूत करने के लिए होते हैं, बढ़ाने के लिए होते हैं और प्रागढ़ बनाने के लिए होते हैं। और जब बात दिल की चलती है तो सभी का यह कथन होता है कि यह तो बहुत ही नाजुक होता है, संवेदनाओं को भरने के लिए होता है, भावनाओं का उद्गम स्थल होता है और दिल से निकली बात कहते हैं बहुत सच्ची, सार्थक और सरल होती है, इसलिए अपनी वाणी के प्रहार से किसी दिल को टुकड़ों-टुकड़ों न करें, क्योंकि ऐसा करने पर दिल कभी जुड नहीं पाता है। और रही बात प्रतिज्ञा की वह तो हमेशा यह कहती है कि जीवन में गति-प्रगति का नाम ही प्रतिज्ञा है।  जब खुद के वादों से ही विमुख हो जाए तो इससे हल्की कोई और बात नहीं हो सकती है। ये चारों टूटने पर आवाज नहीं करते हैं लेकिन दर्द बहुत देते हैं।

प्रेरणा बिन्दु:- 
छिपाने से नहीं छिपती, दिल की बात जबां आती
दिल के तार बड़े नाजुक, मारो ना इनको चाबुक
गर दिल टूट गया तो क्या फिर से यह जुड़ पाता है
टुकड़ों में टूटा शीशा, टुकड़ों में रह जाता है।
 

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