कांग्रेस के ‘पंजे’ के पांच बड़े वादे

Samachar Jagat | Friday, 05 Apr 2019 04:34:16 PM
Five big promises of 'Paws' of Congress

कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को चुनाव चिन्ह ‘पंजे’ की थीम पर 5 बड़े वादों के साथ चुनाव घोषणा पत्र जारी किया। 54 पृष्ठ के इस चुनाव घोषणा पत्र में 47 अन्य वादों के साथ यह भी कहा है ‘हम निभायेंगे’ का संकल्प लिया है। घोषणा पत्र को ‘जन आवाज’ का नाम दिया है। घोषणा पत्र में किसानों, गरीबों, बेरोजगारों, महिलाओं और युवाओं के लिए कई वादे किए हैं। घोषणा पत्र में 5 बड़े वादों में रेल बजट की तरह आम बजट से अलग हटकर किसान बजट होगा। यह बजट आम बजट से दो दिन पहले पेश किया जाएगा। इस बजट में किसानों के लिए की जाने वाली रकम का पूरा ब्योरा दिया जाएगा। जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य से लेकर कृषि क्षेत्र के लिए किए जाने वाले खर्च के बारे में विस्तार से बताया जाएगा।

इसके साथ ही कर्ज लेने वाले किसानों पर वसूली के लिए क्रिमिनल लॉ खत्म करने वायदा किया गया। इसके स्थान पर सिविल लॉ के तहत मामला चलेगा। घोषणा पत्र में एक साल यानी मार्च 2020 तक में 22 लाख बेरोजगारों को नौकरी देने की बात कही है। यह वह नौकरी होगी जो मौजूदा समय में सरकारी विभागों में खाली है। यही नहीं कांग्रेस ने यह भी वादा किया है कि 10 लाख युवाओं को ग्राम पंचायतों में नौकरी दी जाएगी। साथ ही तीन साल तक युवाओं को रोजगार करने के लिए परमिशन लेने का प्रावधान खत्म करने का भी वायदा किया गया है। घोषणा पत्र में मनरेगा के माध्यम से कम से कम 100 दिन के रोजगार की गारंटी को बढ़ाकर 150 दिन किए जाने का वायदा किया गया है।

इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र जो जो वर्तमान में उद्योग बन गया है। यह दोनों क्षेत्र जो उदारीकरण की नीति लागू किए जाने के बाद सामाजिक सेवाओं के रूप में किए जाने वाले कार्यों को भूला दिया गया उसे फिर सामाजिक सेवा में शुमार करने के लिए शिक्षा पर जीडीपी का 6 फीसदी व स्वास्थ्य सेवा पर खर्च बढ़ाकर 2 फीसदी करने का वादा किया गया है। स्वास्थ्य सेवा जो वर्तमान में बीमा क्षेत्र के जिम्मे है उसकी जगह सरकारी अस्पतालों को मजबूत किए जाने की बात कही गई है। घोषणा पत्र में सबसे बड़ा वादा 5 करोड़ गरीब परिवारों के खातों हर साल 72 हजार रुपए डालने का वायदा किया गया है। 

यह राशि घर की महिला के खाते में सीधे ट्रांसफर की जाएगी। राजनैतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्र राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करने के दस्तावेज होते हैं जिनमें प्रत्येक भारतीय के लिए जगह होनी चाहिए। इसलिए सबसे अंतिम पायदान पर खड़े 20 करोड़ लोगों को यदि कांग्रेस पार्टी प्रत्येक महीने 6 हजार रुपए उनके खातों में डलवाने का वादा करती है तो इसे गरीबों के सशक्तिकरण का ऐसा जरिया माना जाएगा जिसे वर्तमान बाजार मूलक अर्थव्यवस्था लगातार अनदेखा करती रही है। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र जिससे सरकार अपना पल्ला झाडक़र निजी क्षेत्र को सौंप चुकी है। शिक्षा और स्वास्थ्य को पिछले ढ़ाई दशक के दौरान बाजार में बिकने वाली सामग्री बना दिया गया है। 

उससे औसत भारतीय की अपने बच्चों को स्तरीय और उच्च शिक्षा दिलाने की क्षमता टूट चुकी है। जिसे धन्ना सेठों ने नया उद्योग बना दिया है और जिसमें शानदार मुनाफा होता है। अपने जीडीपी का 6 फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करते हैं तो मोटे अनुमान से यह 10 लाख करोड़ बनता है। इतनी धन राशि से देश में शिक्षा क्रांति लाई जा सकती है। इससे गरीब का बच्चा सेठों के बच्चों की बराबरी कर सकेगा। यही हालत स्वास्थ्य क्षेत्र की है। इसका भी बाजार इस तरह फला-फूला है कि बीमा कंपनियों एवं निजी अस्पतालों के अपवित्र गठजोड़ गरीब बीमार मरीज के शरीर के अंगों का ही बड़ा बाजार विकसित कर रहा है।

लोकतंत्र में सभी नागरिकों की शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा देना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है, जिसे वह निजी क्षेत्र के जिम्मे नहीं छोड़ सकती। क्योंकि निजी क्षेत्र का जो भी विकास होता है वह सकल राष्ट्रीय संपत्ति स्त्रोतो के जरिए होता है और उन पर सबसे गरीब और सबसे अमीर आदमी का बराबर का हक होता है। यदि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को भी निजी क्षेत्रों के जिम्मे छोड़ दिया जाता है तो फिर सरकार की क्या जरूरत है? जब अमीर के बराबर गरीब को भी अपनी सरकार बनाने का हक संविधान ने अपने वोट के जरिए दिया है तो उसे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने का हक भी दोनों को बराबर है। निजी क्षेत्र नहीं इन सेवाओं को सरकार को उपलब्ध कराना ही होगा। देश की 60 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है तो कृषि मूलक भारत में कृषि बजट भी अलग बनाना जरूरी है।



 

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