स्वास्थ्य सेवाओं को बजट मेें प्राथमिकता जरूरी

Samachar Jagat | Wednesday, 04 Jul 2018 11:24:49 AM
Health services need priority in budget

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आम लोगों को सस्ती और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की बात कहते रहे हैं, किन्तु देश भर में सरकारी अस्पतालों का बुरा हाल है ऐसे में निजी अस्पताल सर्वत्र देखने को मिल रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी कल्याणकारी योजनाएं कभी सरकारों की प्राथमिकताओं में आती थी, जो आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू किए जाने के बाद दोनों उद्योग और व्यवसाय बन गए हैं। निजी अस्पतालों में इलाज कराना इतना महंगा है कि मरीज को अपना घर, जमीन और खेत गिरवी रखने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कई बार तो इतना करने के बाद भी इलाज नहीं होता और मरीज के घरवालों को बैंक से कर्ज लेना पड़ता है।

 कभी स्वास्थ्य सेवाएं विकास का पैमाना होती थी किन्तु आज एक गरीब को अपने किसी परिजन का इलाज करवाने के लिए सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है। अपना सब कुछ गंवाने के बाद भी उसके प्राण न बच सके। ऐसे में उन लोगों पर क्या गुजरती होगी। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं की ऐसी लचर स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी और सुविधाओं का अभाव होने के कारण मरीजों को अंतिम विकल्प के तौर पर निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। देश में स्वास्थ्य जैसी अति महत्वपूर्ण सेवाएं बिना किसी दृष्टि और नीति के चल रही है। ऐसे हालात में गरीब के लिए इलाज कराना क्षमता से बाहर होता जा रहा है। 

आंकड़ों के मुताबिक सालाना विश्व भर में होने वाली मौतों में 18 फीसदी मौतें भारत में होती है। जनवरी 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट से जाहिर हो चुका है कि विश्व में असंक्रामक रोगों से मरने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। उसमें भारत की स्थिति बेहद नाजुक है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हर वर्ष 1.6 करोड़ लोग कैंसर, मधुमेह और हृदयाघात जैसे असंक्रामक रोगों की वजह से मर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में असंक्रामक रोगों से 30 से 70 साल के बीच मरने वालों लोगों की आशंका 26.1 फीसदी से बढक़र 26.2 फीसदी हो गई है। 

तुलनात्मक रूप से यह आंकड़ा दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों की तुलना में बेहद खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक तपेदिक (टीबी) दिल की बीमारी, पक्षाघात, कैंसर और किडनी की बीमारी से निपटने के मामले में भारत का प्रदर्शन बेहद खराब है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माना है कि असंक्रामक बीमारियों में कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और सांस लेने में परेशानी संबंधी प्रमुख चार बीमारियां है। इन रोगों की वजह से भारत ही नहीं विश्व की एक तिहाई आबादी मुश्किल में है। इसका कारण है कि असंक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए अभी तक कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। अच्छी बात है कि इस दिशा मेें पार्टनरशिप टू फाइट क्रॉनिक डिजीज (पीएसीडी) ने हाल ही में संकल्प दिशा स्वस्थ भारत नाम से एक राष्ट्रीय रूपरेखा तैयार की है। इसका उद्देश्य देश में 2025 तक स्वस्थ भारत का संकल्प हासिल करने में सहयोग देना है।

 चूंकि भारत में असंक्रामक रोगों से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है। इसलिए इससे राज्यों को स्वास्थ्य संबंधी मामलों को प्राथमिकता देने में मदद मिलेगी। अगर इसे जमीनी शक्ल दिया जाता है तो भारत में हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और मस्तिष्क आघात से मरने वालों की संख्या कम होगी। यहां यह बता दें कि भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का सबसे कम खर्च करने वाले देशों में शुमार है। आंकड़ों के मुताबिक भारत 1.3 फीसदी खर्च करता है, जबकि ब्राजील स्वास्थ्य सेवा पर लगभग 8.3 फीसदी, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 फीसदी खर्च करता है। दक्षेस देशों में अफगानिस्तान 8.2 फीसदी, मालदीव 13.7 फीसदी, नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है। भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है। 2015-16 और 2016-17 में स्वास्थ्य बजट में 13 प्रतिशत की वृद्धि की गई थी लेकिन मंत्रालय से जारी बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिस्से में गिरावट आई और यह मात्र 4.8 फीसदी रहा। परिवार नियोजन में 2013-14 और 2016-17 में स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट का 2 प्रतिशत रहा। इसी वजह से जननी सुरक्षा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाएं भी पर्याप्त आवंटन न मिलने का दंश झेलती रहती है।

 फिर भ्रष्टाचार और बदइंतजामी की मार ऊपर से है। जनसंख्या के हिसाब से भारत की ग्रामीण आबादी 83 करोड़ से अधिक है। इन लोगों के लिए मात्र 45 हजार 62 डॉक्टर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए पर भारत में 7 हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है। ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों के काम नहीं करने की समस्या अलग है। एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के महंगे खर्च के कारण भारत में प्रतिवर्ष 4 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते है। रिसर्च एजेंसी ‘अन्स्र्ट ऐडं यंग’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 फीसदी शहरी और करीब 90 फीसदी ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर देते हैं। इन हालात में भारत में सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत है।

 भारत को स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर में बढ़ोतरी करनी होगी। सरकार को नि:शुल्क दवाओं की भली प्रकार से व्यवस्था करने के लिए हर वक्त निगरानी टीम को तैनात करना होगा। इसके साथ ही एंबुलेंस के अभाव में किसी मरीज को अपनी जान न गंवानी पड़े, इसका पूरा ध्यान रखना होगा। किसी भी अस्पताल में मरीजों की तिमारदारी के लिए तैनात कर्मचारियों में पेशेवर कुशलता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है। वे अपनी ड्यूटी में जरा भी लापरवाही न बरते यह भी सुनिश्चित करना होगा। स्वास्थ्य सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में घोषित करना होगा और इस प्राथमिकता को बजट में भी सर्वोपरि स्थान देना होगा। स्वास्थ्य सेवाओं का आधार अब लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की शिक्षा देने पर होना चाहिए। भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए समन्वित रूप से असरकारक कार्यक्रम तैयार करना चाहिए।



 

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