सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 35 ए पर सुनवाई टली

Samachar Jagat | Friday, 10 Aug 2018 11:19:30 AM
Hearing on Article 35A in Supreme Court

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सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 35 ए में बदलाव की मांग से जुड़ी याचिका पर सुनवाई 27 अगस्त तक टाल दी है, कोर्ट ने कहा कि उसकी तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है और वह इस बात पर विचार करेगी कि क्या इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजना होगा। प्रधान एएम खानविलकर की एक बेंच ने कहा कि मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय एक पीठ को करनी है और इस पीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड मौजूद नहीं है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने 27 अगस्त को शुरू होने वाले सप्ताह में मामले की सुनवाई निर्धारित की है। 

संविधान के अनुच्छेद 35 ए को हटाने की मांग से जुड़ी याचिका पर जम्मू-कश्मीर सरकार की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मामले की सुनवाई टालने की मांग की। हालांकि याचिकाकर्ता ने सोमवार को ही सुनवाई करवाए जाने की मांग करते हुए कहा कि सरकार किसी न किसी वजह से यह मामला मुलतवी करवाना चाहती है। ऐसे में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि इस मामले पर तीन जजों को सुनवाई करनी थी। उनमें से एक जज आज नहीं आए हैं, इसलिए आज इस पर सुनवाई नहीं की जा सकती है।

 मुख्य न्यायाधिपति मिश्रा ने इस दौरान जिक्र किया कि क्या अनुच्छेद 35 ए संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ जाता है। साल 1954 मेें राष्ट्रपति के आदेश द्वारा संविधान में शामिल किया गया अनुच्छेद 35 ए जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेष दर्जा देता है। हालांकि यह मामला एक बार फिर टल गया है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के लिए यह बेहद संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। वहां यह एक भय सा फैल गया है कि वहीं इसे हटा न दिया जाए। राज्य के ज्यादातर राजनीतिक संगठन इसे हटाने का विरोध कर रहे हैं।

 जबकि देश में एक तबके की राय है कि इस अनुच्छेद के जरिए जम्मू-कश्मीर की स्थिति को कुछ ज्यादा ही विशिष्ट बना दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में इस अनुच्छेद के खिलाफ याचिका दायर करने वाले दिल्ली के एनजीओ ‘वी द सिटिजन’ का तर्क है कि इसमें मौजूद व्यवस्थाओं के जरिए जम्मू-कश्मीर में देश के बाकी नागरिकों के साथ भेदभाव किया जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि संविधान के इस अनुच्छेद के जरिए जम्मू-कश्मीर के स्थायी (मूल) निवासियों को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। राज्य के बाहर के लोग यहां अचल संपत्ति नहीं खरीद सकते, न ही उन्हें राज्य सरकार की योजनाओं का फायदा मिल सकता है। प्रदेश में बाहर से आए लोगों को सरकारी नौकरी भी नहीं मिल सकती। 

जैसा कि ऊपर बताया गया है 1954 में राष्ट्रपति के आदेश पर अनुच्छेद 370 के साथ अनुच्छेद 35 ए जोड़ा गया था। अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता है, जबकि अनुच्छेद 35 ए प्रदेश सरकार को यह निर्धारित करने की शक्ति देता है कि कौन यहां का मूल या स्थायी नागरिक है और उसे क्या अधिकार मिले हुए हैं। देशभर में व्यवस्थागत एक रुपता कायम करने की मांग तार्किक जरूर है पर इतिहास से विरासत में मिले इस तथ्य को समझने की जरूरत है कि देश में हर रियासत का विलय एक ही प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ है। खासकर जम्मू-कश्मीर और मणिपुर जैसी पूर्वाेत्तर की कुछ रियासते 15 अगस्त 1947 के बाद अपनी अपनी शर्तों के साथ देश में शामिल हुई। उनकी कुछ विशिष्टताओं के संरक्षण की बात इन शर्तों में शामिल है। भारतीय राष्ट्र राज्य ने उस समय उनकी शर्तों को अड़चन के रूप में नहीं देखा और उनकी अपेक्षाओं को भारतीय संविधान में समेट लिया गया। यह हमारे समावेशी और जनतांत्रिक स्वभाव के अनुकूल ही था। अनुच्छेद 35 ए को इसी संदर्भ में देखा जाता रहा है।

 तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला की बातचीत के बाद अनुच्छेद 370 और 35 ए को कश्मीर की विस्तृत विलय प्रक्रिया के क्रय में 1954 में देश के संविधान में शामिल किया गया था। मामले की जटिलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट इस पर कुछ कहने से पहले पर्याप्त समय लेना चाहता है। लेकिन जब तक फैसला नहीं आता, तब तक इसको लेकर ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए, जिससे जम्मू-कश्मीर की पहले से बिगड़ी हुई स्थिति और ज्यादा बिगड़ जाए।

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