‘आशा’ सबसे करीबी दोस्त है, उसका हाथ कसकर पकड़िए

Samachar Jagat | Saturday, 04 Nov 2017 04:36:35 PM
hope is the closest friend, hold her hand tightly

‘सुखी’ को देखकर एक जन भी सुखी नहीं होता। लेकिन एक दुखी को देकर सौ दुखी हो जाते हैं। यही कारण है कि समाज में डिप्रेशन और तनाव हर दिन दोगुनी गति से भजदगी में शामिल हो रहा है। जितना हम तकनीक के नजदीक आते जा रहे हैं, भजदगी के असली अहसास से उतने ही दूर होते जा रहे हैं। इसे कुछ यूं समझिएकि पहले जब बेसिक फोन आया तो लोगों से तय करके मिलना आसान हो गया। हां, अचानक मिलने की खुशी कम हो गई। हम कुछ कदम चले ही थे कि फोन के अवतार अब धीरे-धीरे हमारे लिए मुश्किल बनते जा रहे हैं। क्योंकि अब हम उनके लिए जीने लगे हैं। हम प्रोडक्ट का उपयोग करने की जगह उसके हिसाब से भजदगी को जीने लगे हैं।

 जहां पहले लोगों से मिलना एक बुनियादी आदत थी, वहां अब बात करने की फुरसत नहीं। जहां पहले बात करना लगभग हर दिन का काम था, अब वहां सोशल मीडिया अपनों की ‘जिंदगी’ का स्टेटस देखने का माध्यम बन गया है। महानगर, नगर और मोहल्ले तक में अब हर कोई व्यस्त दिख रहा है। किस बात में व्यस्त है, यह अलग बात है। उसकी व्यस्तता का उसके जीवन, करियर से कितना सरोकार है।

 इसमें भी कोई सीधा संबंध नहीं रहा। सौ ‘सुखी’ को देखकर एक जन भी सुखी नहीं होता। लेकिन एक दुखी को देकर सौ दुखी हो जाते हैं। यही कारण है कि समाज में डिप्रेशन और तनाव हर दिन दोगुनी गति से जिंदगी में शामिल हो रहा है। स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि परिवार में आपसी संवाद निरंतर कम होता जा रहा है। स्मार्टफोन हमें स्मार्ट बनने की जगह दिमाग में तनाव, रिश्तों में दूरी घोल रहे हैं।

कोई ‘लाइक’ की भचता में घुला जा रहा है तो कोई ‘शेयर’ कम होने से तनाव में है। परिवार में एक साथ गपशप के दिन, खाने की मेज पर गप्पों के दिन लापता हो रहे हैं। हर कोई गैजेट्स के साथ गप्प करने में व्यस्त है।

समाज में नकारात्मकता, हमारी आशंका से कहीं अधिक तेजी से घर करती जा रही है। हम छोटी-छोटी बातों पर हार मानने वालेसमाज में बदलते जा रहे हैं। जबकि भारत की सबसे बड़ी शक्ति ऐसा समाज रहा है, जो हर मुश्किल का सामना बहादुरी से करता रहा है। हम कभी दुनिया में सबसे कम संसाधन पर सबसे अधिक खुश रहने वाले समाज के रूप में जाने जाते थे। आज संसाधन थोड़े से बढ़े लेकिन जीवन में दुख कहीं अधिक गहरे उतर रहा है। एक छोटी सी कहानी जो अक्सर मैं ‘जीवन- संवाद’ के सत्रों में मित्रों से साझा करता हूं। आपसे भी बांट रहा हूं। यह एक ऐसे घरकी कहानी है, जहां अंधेरे ने अपना कब्जा जमाया हुआ था। रात गहराई की ओर बढ़ती जा रही थी। रोशनी की जिम्मेदारी चार मोमबत्तियों के पास थी। घर में उस वक्त कोई और नहीं था। तो थोड़ा एकांत पाकर चारों बतियाने लगीं।

पहली ने कहा, ‘मैं दुनिया में शांति के मिशन पर आई थी। लेकिन अब मुझे लगता है कि इस दुनिया में भागमभाग बहुत ज्यादा हो गई है। हर ओर लूट मची हुई है। मैं यहां अब और नहीं रुक सकती।’ इतना कहने के कुछ देर बाद वह बुझ गई। कमरे में अंधेरे को पांव पसारने के लिए थोड़ी जगह और मिल गई।
दूसरी ने कहा, ‘मैं विश्वास के प्रचार के लिए आई थी, लेकिन देखती हूं कि दुनिया में फरेब इस कदर हो गया है कि मेरी तो यहां जरूरत नहीं लगती। मैं भी यहां नहीं रहना चाहती।’ इस तरह दूसरी भी चली गई। अंधेरा गहराने लगा। दोनों का असर तीसरी पर भी होना ही था। उसने अपनी बात शुरू कर दी, ‘मेरे पास चलने की शक्ति है, मैं प्रेम हूं। मैं सबके साथ रहना चाहती हूं। लेकिन देखती हूं कि किसी के पास मेरे लिए समय ही नहीं है। मैं बेहद उदास हूं। मैं भी यहां नहीं रहना चाहती।’ तीसरी मोमबत्ती के जाते ही कमरे में अंधेर का राज-सा कायम होने लगा। इस बीच एक बच्ची कमरे में दाखिल हुई।

उसने कहा, ‘अरे, तुम मोमबत्तियों को तो रातभर चलना था। तुम इस तरह मुझे अकेले अंधेरे में छोडक़र कैसे जा सकती हो।’ बच्ची की बात सुनकर चौथी मोमबत्ती ने मुस्कराते हुए कहा, ‘डरो नहीं, मेरा नाम आशा है। जब तक मैं जल रही हूं, तुम्हें कोई खतरा नहीं है। हम बाकी को भी जलाने की कोशिश करेंगे।’ यह सुनते ही उस बच्ची का डर दूर हो गया। उसने आशा के साथमिलकर शांति, विश्वास और प्रेम की रोशनी से घर में उजियारा कर लिया।’ एक समाज के रूप में हमें भी इस आशा (चौथी मोमबत्ती) की सबसे अधिक जरूरत है।

 इसके साथ हम देश, समाज और परिवार में किसी भी मुश्किल को हराने की क्षमता रखते हैं। अंधकार से संघर्ष की सबसे बड़ी हमसफर आशा ही है, हर हाल में उसका साथ पकड़े रखना है। डिप्रेशन और आत्महत्या के विरुद्ध आशा ही सबसे नजदीकी दोस्त है। इसलिए, इसका साथ कभी न छोड़ें। और अगर छूटने ही लगे तो उसका हाथ कसकर पकड़ लें, जिसने आशा का दामन थाम रखा हो।

(ये लेखक के निजी विचार है)



 

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