मैं तुम्हें मंजिल तक ले चलूंगा

Samachar Jagat | Thursday, 30 Aug 2018 11:28:46 AM
I'll take you to the floor

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आप सभी ने कछुए और खरगोश की कहानी अवश्य ही सुनी होगी कि दौड़ तय होने के बाद दोनों ने तुरंत दौड़ना शुरू दिया था। लेकिन उनके दौड़ने की गति में बहुत अंतर था, खरगोश ने बहुत तेज दौड़ना शुरू किया जबकि कछुए ने बहुत धीरे-धीरे। खरगोश बहुत तेजी से दौड़ता हुआ लक्ष्य से पहले एक  पेड़ के नीचे आराम करने लग जाता है और उसे नींद आ जाती है। जब तक उसकी आंखें खुलती है कछुआ लक्ष्य पर पहुंच कर दौड़ जीत चुका था। इस प्रकार खरगोश बिना योजना और बहुत अधिक अहंकार के कारण दाड़ में हार गया जबकि कछुआ लगातार चलते रहने के कारण दौड़ जीत गया। 

खरगोश इस हार से आत्म ग्लानि से भर गया। और अपने आप से कहने लगा मैं योग्य होते हुए भी अपनी लापरवाही और प्रमोद के कारण हार गया, मुझे जीतना चाहिए। उसने कछुए से फिर कहा- ‘हम दुबारा दौड़ प्रतियोगिता करेंगे इस दौड़ में जो जीतेगा उसे ही विजेता माना जाएगा। कछुए ने इसके लिए हां कर दिया। दोनों ने एक साथ दौड़ना शुरू किया। खरगोश को पिछली गलती का अच्छी तरह से ज्ञान था, इसलिए उसने अबकी बार कोई लापरवाही नहीं बरती और लगातार तेज गति से दौड़ कर दौड़ प्रतियोगिता को जीत लिया। इस हार से कछुए को बहुत निराशा हुई और मन में संकल्प लिया कि यह दौड़ फिर से होनी चाहिए।’

कछुए ने खरगोश से कहा- ‘इस दौड़ प्रतियोगिता का हमें फिर से आयोजित करनी चाहिए और इसके लिए एक शर्त रहेगी कि इस दौड़ प्रतियोगिता का मार्ग भी मैं ही तय करूंगा। खरगोश ने कछुए की शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया। निर्धारित स्थान से दौड़ प्रारंभ हुई। खरगोश को पूरा विश्वास था कि वह हर हाल में दौड़ जीतकर रहेगा। उसने पूरी क्षमता के साथ तेज दौड़ना शुरू किया और थोड़े ही समय में वह कछुए से बहुत आगे निकल गया, लेकिन आगे जाकर देखा तो एक चौड़े पाट वाली नदी बह रही थी। नदी को देखकर खरगोश बहुत विवश था, उसे कोई भी उपाय नहीं दिख रहा था, और वह मन ही मन बहुत दु:खी हो रहा था। तभी मंथर गति से दौड़ता हुआ कछुआ वहां पहुंचा। जब उसने खरगोश को लाचार और निराश बैठे हुए देखा तो उससे कहा- ‘मित्र! तुम्हें निराश होने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है, आओ! मेरी पीठ पर बैठों मैं तुम्हें उस पार ले चलूंगा। खरगोश यह सुनकर बहुत खुश हो गया और वे दोनों नदी को पार कर गए।’

अब खरगोश का मन कछुए के व्यवहार से इतना प्रभावित हुआ कि वह कछुए के प्रति बहुत आभार प्रकट करने लगा और दिल से कृतज्ञता व्यक्त की। और बहुत ही प्रेम और विन्रमता से कछुए से कहा- ‘हे मेरे प्रिय मित्र! अब तुम मेरी पीठ पर बैठोगे, मैं तुम्हें मंजिल तक ले चलूंगा।’ इस प्रकार वे दोनों मंजिल पर साथ-साथ पहुंच कर एक दूसरे से दिल से मिले। परस्पर एक दूसरे के सहयोग से कठिन से कठिन राह भी बहुत आसान हो जाती है।

प्रेरणा बिन्दु:- 
हाथ मिलते हैं गले मिलते हैं
और जब दिल मिल जाते हैं
बेशक संकट हजारों सामने
सब छूमंतर हो जाते हैं।

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